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बीजेपीः मार्गदर्शक मंडल अब सचमुच मार्गदर्शन करेगा

पाणिनि आनंद | Updated on: 29 April 2016, 22:27 IST
QUICK PILL
  • 2014  में लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त बहुमत मिलने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को \'मार्गदर्शक मंडल\' में डालकर कर दिया था किनारे.
  • संसद की कार्यवाही समेत तमाम मामलों में आ रहे गतिरोध के चलते अब पार्टी को वरिष्ठों का महत्व याद आ रहा है. एलके आडवाणी, एमएम जोशी और शांता कुमार को नई भूमिका देकर पार्टी ने उस गलती को सुधारा है.

मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने युवा और ऊर्जा से भरपूर मंत्रिमंडल बनाया. एक अघोषित नियम ये था कि 75 साल से अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति कैबिनेट में नहीं होगा.

इस अघोषित नियम के कारण लोकसभा चुुनाव जीत कर संसद में पहुंचने वाले कई वरिष्ठ बीजेपी नेता किनारे लग गए. ऐसे नेताओं के लिए पार्टी ने 'मार्गदर्शक मंडल' बनाया. जिसका काम पार्टी और सरकार का समय-समय पर मार्गदर्शन करना बताया गया. इस मंडल में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और शांता कुमार जैसे बुजुर्ग नेताओं का रखा गया.

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इन बुजुर्ग नेताओं की बीजेपी के कार्यक्रमों में मौजूदगी होने या न होने को कोई ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती थी. कई बार ये नेता खुद ऐसे कार्यक्रमों में शिरकत करने से बचते नजर आते थे. सरकार बनने के बाद ये मार्गदर्शक मंडल जब भी चर्चा में आया तो बुजुर्ग नेताओं के बगावती लगने वाले तेवरों को लेकर आया.

बीजेपी ने आडवाणी, जोशी और शांता कुमार को तीन संसदीय समितियों में दी जगह

हालांकि सरकार के दो साल पूरे होने के बाद बीजेपी ने इन वरिष्ठ नेताओं को अगली कतार में दोबारा लाने का फैसला किया है. इसकी पीछे शायद संसद के दोनों सदनों में पार्टी को विपक्ष के संग तालमेल बिठाने में लगातार आ रही दिक्कत का हाथ हो.

तीन नई गठित संसदीय समितियों में आडवाणी, जोशी और शांता कुमार को सदस्य के तौर पर नई भूमिका दी गई है. आडवाणी और कुमार को कमेटी ऑन पब्लिक अंडरटेकिंग का सदस्य बनाया गया है. वहीं जोशी को कमेटी ऑन एस्टीमेट्स का सदस्य बनाया गया है. ये दोनों कमेटियां एक मई से काम करना शुरू करेंगी.

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बीजेपी में संसदीय समितियों और रोजमर्रा की कार्यवाही की जानकारी रखने वाले नेताओं की कमी है. इन वरिष्ठ नेताओं को सरकारी कमेटियों और पैनलों का काफी लंबा अनुभव है. कम से कम बीजेपी के सदन में मौजूद ज्यादातर नेताओं से ज्यादा.

बीजेपी के एक सांसद कहते हैं, "उनका अनुभव हम सबसे ज्यादा है. जब से सरकार बनी है हम उनका मार्गदर्शन दे रहे हैं. अब समितियों में उनकी मौजूदगी से सांसदों को ज्यादा सीखने को मिलेगा."

सांसद कहते हैं, "इन नेताओं को पता है कि समितियों में उठने वाल मुद्दों से कैसे निपटा जाए. उन्होंने अपने लंबे संसदीय पारी में ये काम बखूबी किया है. सबसे बड़ी बात उन्हें विपक्षी दलों के साथ संवाद स्थापित करना आता है."

सरकार बनने के दो साल बाद समझ आया बीजेपी को वरिष्ठ नेताओं का महत्व

ऐसे में ये भी सवाल उठता है कि आखिर सरकार ने ये फैसला करने में दो साल का वक्त क्यों लिया? आखिर उसे पहले से ही पता था कि ये नेता काफी अनुभवी हैं.

बीजेपी के एक अन्य नेता कहते हैं कि ये कहना गलत है कि इन नेताओं को संसदीय कामकाज से पूरी तरह से दूर कर दिया गया था. नेता कहते हैं, "आडवाणी जी पर्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी फॉर इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के सदस्य हैं. अब वो एक और जिम्मेदारी संभालेंगे. उनका और अन्य वरिष्ठ नेताओं का हमेशा मार्गदर्शन मिलता रहा है. इसमें नया कुछ नहीं है."

मुरली मनोहर जोशी, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री थे. यूपीए-2 मेें वो जो जेपीसी के सदस्य थे. 2-जी घोटाले पर सदन में उन्होंने अहम भूमिका निभायी थी. उनके अनुभवी नेता की सरकार ने अब जाकर सुध ली है.

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ये सच है कि आईटी कमेटी के आडवाणी सदस्य थे लेकिन इसका प्रमुख उनसे बहुत जूनियर नेता अनुराग ठाकुर को बनाया गया था. आडवाणी समय से पहले कमेटी की हर बैठक में पहुंच जाते थे लेकिन कमेटी प्रमुख समेत कई नेता अक्सर देर से ही आते थे.

बीजेपी के कई सांसद इन कमेटियों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते. इनकी बैठकों में उनकी उपस्थिति में उनका रवैया साफ झलकता है. नतीजतन, बीजेपी ने अपने ही करीब एक दर्जन सांसदों को विभिन्न समितियों से बाहर कर दिया. ऐसे सांसदों में विनोद खन्ना, एसएस अहलुवालिया, रमेश पोखरियाल, वरुण गांधी, दुष्यंत सिंह, ओम बिरला और पंकज चौधरी के नाम शामिल थे.

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विभिन्न समितियों में इन सांसदों का कार्यकाल 30 अप्रैल को पूरा होना था लेकिन सरकार ने उन्हें इसके पहले ही विदा कर दिया और वरिष्ठ नेताओं की आगमन की राह प्रशस्त कर दी.

बुजुर्गों के बगावती तेवर से पार्टी और सरकार की लगातार किरकिरी से शायद अब सबक सीख लिया गया है. वैसे भी सरकार को अनुभवी लोगों की सख्त जरूरत है. ऐसे में 'मार्गदर्शक मंडल' से बेहतर राह कौन दिखा सकता है.

First published: 29 April 2016, 22:27 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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