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भारत की पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति पर विमर्श कर रहे हैं मोदी

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 28 January 2016, 19:43 IST

हाल के वर्षों में शायद पहली बार हो रहा है जब भारत के 'राष्ट्रीय चरित्र' और 'राष्ट्रीय हित' पर गंभीर चर्चा की शुरुआत हो रही है.

यूपीए सरकार के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने हाल ही में एक प्रमुख अखबार से कहा कि भारत को एक 'लोकतांत्रिक, समाजवादी राष्ट्र" होना चाहिए. 

भारतीय कूटनीति के एक और महत्वपूर्ण शख्स ने भारत की व्याख्या एक "बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समतावादी समाज" के रूप में किया.

दोनों राजनयिकों ने कहा कि उनके लिए "राष्ट्रीय आम सहमति" सबसे बड़ी चीज और इसे तय करने का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज भारत का संविधान है, जो इसका आधार है.

राष्ट्रीय सुरक्षा नीति

लगता है राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी) के पूर्व अध्यक्ष श्याम सरन द्वारा जनवरी 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार को सौंपी गई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के मसौदे का यही आधार है.

बेहद नजदीकी सूत्रों के मुताबिक पिछली एनएसएबी चाहती थी कि इस दस्तावेज़ पर सार्वजनिक बहस हो लेकिन तब प्रधानमंत्री की सोच कुछ और ही थी.

राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का मसौदा एक बहुत आवश्यक दस्तावेज है जो बाहरी और आंतरिक सुरक्षा से संबंधित विभिन्न सिद्धांतों को तय करने में मदद करेगा. यदि इसे आधिकारिक तौर पर अपनाया गया तो यह देश के शीर्ष रक्षा प्रबंधन में व्याप्त एक बड़ी खामी को दूर करने में सफल सिद्ध होगा. हाल में जब पठानकोट में आतंकी हमला हुआ तब इस खामी के चलते कई दिक्कतें पेश आईं.

इस प्रकरण ने हमारी उस खामी को सतह पर ला दिया. ऐसे संकट के समय जब आंतरिक सुरक्षा को खतरा था और उसके तार विदेशों से जुड़े थे तब शीर्ष रक्षा प्रबंधन की स्थिति उहापोह की रही.

तो इस मसौदा नीति की मुख्य विशेषताएं क्या हैं? एक महत्वपूर्ण सूत्र के मुताबिक यह एक पारंपरिक राष्ट्रीय सुरक्षा दस्तावेज़ न होकर एक व्यापक अवधारणा का प्रपत्र हैं. जो 5 महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डालता है.

5 प्रमुख क्षेत्र

  • घरेलू सुरक्षा
  • बाहरी सुरक्षा
  • सैन्य तैयारियां
  • आर्थिक सुरक्षा
  • पारिस्थितिक सुरक्षा

दस्तावेज के मसौदे में व्यापक महत्व का अंतिम मुद्दा 'रणनीतिक संचार" है.

2015 का एनएसएबी दस्तावेज़ के मुताबिक इन 5 सुरक्षा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकार को अपने देश के लोगों का व्यापक समर्थन और उसके उपयोग की आवश्यकता होगी.

राष्ट्रीय सुरक्षा का यह मसौदा यह भी कहता है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकार अकेले कोई निर्णय नहीं ले सकती. उसे सभी संबंधित पक्षो को इसमें सामिल करना होगा. सबकी सलाह और मशविरे से फैसला लेना होगा.

एक सूत्र ने बताया, "पठानकोट का ही मामला लेते हैं. इसमें आर्थिक पहलू भी जुड़ा हुआ था और इसकी वजह से आतंरिक सुरक्षा को खतरा पैदा हुआ था. साथ ही इसके तार विदेशों से जुड़े थे. इसलिए इस तरह की चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिकारियों को समग्र तरीके से सभी पहलुओं पर विचार करने की जरूरत होगी."

यह देखने की जरूरत है कि क्या भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इस दस्तावेज को आगे बढ़ा पाती है या नहीं

पारिस्थितकी सुरक्षा का मामला आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है. मसलन पानी का मामला. पानी का प्रदूषित होना या फिर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र स्तर में होने वाली वृद्धि देश के आर्थिक हितों को प्रभावित करती है. तटीय इलाकों में तो यह आजीविका से जुड़ा मामला भी बन जाता है.

मसौदे में एक "नेशनल पावर" का जिक्र किया गया है और इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक गुप्त सेवा की भी बात है. सरकार की योजना भारतीय नौसेना को मिलने वाले मौजूदा आवंटन को 10 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी करने की है.

केवल राष्ट्रीय सुरक्षा ही नहीं

सूत्रों के मुताबिक यह नीति राष्ट्रीय सुरक्षा से कहीं ज्यादा बड़ी है. यह संवैधानिक अधिकारों के दायरे तक जाती है. हालांकि सूत्र ने कहा कि थोड़े वक्त के लिए व्यक्तिगत अधिकारों को एक समुदाय के अधिकारों से जोड़कर देखा जाएगा. ऐसे में यह देखने की जरूरत है कि क्या भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इस दस्तावेज को आगे बढ़ा पाती है या नहीं.

First published: 28 January 2016, 19:43 IST
 
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