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देश के 10 सबसे गंदे शहरों में शामिल है मोदीजी का बनारस

आवेश तिवारी | Updated on: 17 February 2016, 8:01 IST

बनारस के जगतगंज चौराहे पर सब्जी की दूकान लगाने वाले 'अवधूत' से जब हम खरीददारी करने के बाद पॉलीथिन मांगते हैं तो वो पूरी सब्जी वापस पलट देता है, और झल्लाते हुए कहता है, "सब्जियां लेना हो तो झोला लेकर आया करिए, हमने पॉलीथिन रखना बंद कर दिया है." यह झल्लाहट केवल अवधूत में ही नहीं समूचे बनारस में है. आखिर हो भी क्यों नहीं? गंदगी का अपार ढेर बनारस से उसकी बनारसियत को छीन रहा है.

गंगा के साथ-साथ गलियां और चौराहे गंदगी से बजबजा रहे हैं. शहर की बजबजाती हाल तब है जब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां से सांसद हैं. प्रधानमंत्री का बहुप्रचारित प्रोजेक्ट स्वच्छता भारत अभियान पूरे शबाब पर है. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद बनारस की हालत जस की तस बनी हुई है.

सोमवार को केंद्रीय शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू ने देश के 73 प्रमुख शहरों की स्वच्छता सूची जारी की. इसमें सबसे गंदे दस शहरों में बनारस भी शामिल है. उत्तर भारत के ज्यादातर शहर निचली पायदान पर हैं. शीर्ष 10 शहरों में उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा का एक भी शहर नहीं है. यह भी दिलचस्प है कि उत्तर प्रदेश और बिहार से अकेले भाजपा के 104 सांसद हैं और यहां के ज्यादातर शहरों की दशा सोचनीय है.

पीएम मोदी का बहुप्रचारित प्रोजेक्ट स्वच्छता भारत अभियान पूरे शबाब पर है लेकिन बनारस की हालत बुरी बनी हुई है.

यह सर्वेक्षण भारतीय गुणवत्ता परिषद ने किया है. इसमें 10 लाख से अधिक आबादी वाले 73 शहरों को शामिल किया गया था.

इस गंदगी का असर आम बनारसी पर तो पड़ ही रहा है, पर्यटन उद्योग भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो लगा कि अब शहर फिर से अपने उस पुराने गौरव को हासिल कर सकेगा, जिसके बारे में अंग्रेज विद्वान आर्किटेक्ट जेम्स प्रिंसेप ने कहा था कि यह ख़्वाबों का शहर है. मगर फिलहाल ख़्वाबों का यह शहर देश का पीएम देने के बावजूद गंदगी का शिकार है. मोदी का स्वच्छता अभियान सिर्फ घाटों पर ही नजर आया, न तो यहां गंगा साफ हुई, न ही बनारस शहर.

आखिर क्या करे काशी ?

आम बनारसियों में एक वक्त "तीन लोक से न्यारी काशी" कहावत कही-सुनी जाती थी. 1824 में जल मार्ग से बनारस की यात्रा पर आये बिशप हिबर ने लिखा है कि बनारस देखने लायक शहर है और आज तक मैंने जितने शहर देखें हैं उन सबमें यही शहर पूरी तरह से पश्चिमी ढंग का है.

cow varanasi

लेकिन आज जब पूर्वी भारत को बनारस से जोड़ने वाले राजघाट पुल से शहर में प्रवेश करते हैं तो घुसते ही गंदगी के अपार साम्राज्य से आपका सामना होता है. आजादी के बाद से ही राजघाट पुल से सटे शहर के प्रवेश द्वार पर ही शहर का समूचा कूड़ा डंप किया जाता है, न तो इसकी रिसाइकिलिंग की कोई व्यवस्था है न ही इसके निस्तारण के लिए और इंतजाम है.

मोदी का स्वच्छता अभियान सिर्फ घाटों पर ही नजर आया, न तो यहां गंगा साफ हुई, न ही बनारस शहर

नतीजा, शहर में प्रवेश करते ही भीषण दुर्गन्ध से लोगों का सामना होता है. राजघाट पुल से महज 500 मीटर दूर जीटी रोड पर ही शहर का बूचड़खाना है जो 40 साल पहले भी यहीं था. नगर निगम हर बार इस इलाके से गंदगी दूर करने  का दावा  करता है मगर होता कुछ नहीं है. काशी हिंदू विश्वविद्यालय का बाहरी इलाका हो चाहे कैंट स्टेशन या फिर शहर की गलियां, हर जगह, हर तरफ कूड़े का ढेर और बजबजाती नालियां दिख जाती हैं.

दोहरी पहचान में दरक रहा शहर

आखिर हुआ क्या है इस शहर को? इसका जवाब हमें खांटी बनारसी और मशहूर पेंटर धीरेन्द्र मोहन से मिलता है. धीरेन्द्र कहते हैं, "सबसे बड़ी वजह यह है कि बनारस जो पहले देश का सांस्कृतिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक केंद्र हुआ करता था वो अब आस-पास के प्रदेशों बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के साथ-साथ यूपी के तमाम शहरों जिनमें आजमगढ़, गोरखपुर, देवरिया आदि शामिल है, का व्यावसायिक केंद्र हो गया. यह जो व्यावसायिक और सांस्कृतिक पहचान का अंतर है, उसे यह शहर संभाल नहीं पा रहा है.

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उनके मुताबिक बनारस शहर के कूड़े का प्रबंधन आप दिल्ली-मुंबई की तर्ज पर नहीं कर सकते. इस शहर का बहुत बड़ा हिस्सा गलियों में बसा है, कूड़े का प्रबंधन मोहल्ले के स्तर पर ही करना होगा और उसकी योजना बनानी होगी. जो लोग बाहर से आ रहे हैं उनको शहर के प्रति जिम्मेदारी समझनी होगी. धीरेन्द्र का कहना है कि यह शहर स्मार्ट सिटी और हाईटेक शहर हो इसे पहले जरुरी है बनारस, बनारस हो. नरेंद्र मोदी को भी बनारस की मासूमियत को समझना होगा.

घाट बदले, न बदली गंगा, न बदला बनारस

पीएम नरेंद्र मोदी के सांसद होने का कोई फायदा अगर अगर बनारस को मिला तो वो घाटों की सफाई के तौर पर मिला. प्रधानमंत्री द्वारा चलाई गई स्वच्छता मुहिम की वजह से  पिछले चार दशकों से सिल्ट और कचड़े से पटी अस्सी, दशाश्वमेघ और हरिश्चन्द्र इत्यादि घाटों की सीढ़ियां अब साफ़ दिखने लगी है, घाटों का विस्तार ऐसा पहले कभी नहीं था.
पीएम नरेंद्र मोदी के विरोधी भी इस बात को मानते हैं कि मोदी के सांसद बनने से हमारे घाट खूबसूरत हो गए हैं. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि गंगा और बनारस आज भी बेहद प्रदूषित हैं. 

बनारस शहर का बहुत बड़ा हिस्सा गलियों में बसा है, कूड़े का प्रबंधन मोहल्ले के स्तर पर ही करना होगा

19 लाख की आबादी वाले शहर में हर रोज़ कूड़े की निकासी 600 मीट्रिक टन होती है. नगर निगम का दावा है कि वह 500 मीट्रिक टन कूड़ा हर दिन उठाता है. इसका अर्थ यह है कि बाकी बचा 100 मीट्रिक टन कूड़ा शहर में जहां-तहां बिखरा रहता है. इसके निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है. साहित्यकार व्योमेश शुक्ल कहते हैं कि बनारस को सर्वाधिक प्रदूषित बनारस में आस्था रखने वालों ने किया है. उनका कहना है कि "बनारस को प्रदूषण मुक्त करने के लिए खुद लोगों को संकल्प लेना होगा सिर्फ जापान के भरोसे शहर को प्रदूषण मुक्त नहीं कराया जा सकता.

अतिक्रमण और आबादी का दबाव

शहर में चहुंओर फैली गंदगी की बड़ी वजह अतिक्रमण भी है. जिला प्रशासन ने शहर की चुनिंदा  सड़कों के चौड़ीकरण और दशकों पुराने अतिक्रमण को हटाकर शहर को गंदगी से निजात दिलाने की बहुत कोशिश की मगर नतीजा अब तक सिफर रहा है.

पढ़ें: किसका स्वच्छता ऐप बेहतर है, केजरीवाल का या नरेंद्र मोदी का?

यूपी के मुख्य सचिव आलोक रंजन मानते हैं कि शहर में अतिक्रमण की वजह से हालात बदतर होते जा रहे हैं, शहर को गंदगी से निजात दिलाने के लिए यह जरुरी है कि बनारस में रहने वाले लोग भी अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी को समझें. एक दूसरी वजह शहर की निरंतर बढती आबादी है. मोदीजी के जीतने के बाद से आस-पास के गावों और कस्बों से बनारस की ओर पलायन तेजी से बढ़ा है, निस्संदेह उसी अनुपात में गंदगी भी बढ़ी है.

बनारस से उब रहे बनारसी

"काशी का अस्सी" में काशीनाथ सिंह लिखते हैं कि यह शहर अपने में बदलाव नहीं चाहता. अगर आप काशी की गलियों में लोगों को समझाने की कोशिश करेंगे कि उनकी की हुई गंदगी से गंगा मैली हो रही है, तो जवाब मिलेगा, ‘अरे हम क्या गंगा मइया को गंदा-साफ करेंगे, वो खुद ही खुद को साफ कर लेंगी.’ लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है, अब गंदगी की ही वजह से गंगा में नहाने वाले बनारसियों की तादात कम होती जा रही है.

एक ऐसा वर्ग भी है जो इस शहर की भीड़, यहां की गंदगी से ऊबकर पलायन कर रहा है, जबकि बनारसियों के बारे में कहा जाता रहा है कि वे अपना शहर छोड़कर कहीं नहीं जाते. महाराष्ट्र से बनारस में आकर बसी प्रतिभा गोटिवाले कहती हैं, "ईश्वर आबाद रखे मोदीजी और देश के मन्त्रियों को जो गाहे-बगाहे उद्घाटन, शादी-ब्याह, मूड़न के सिलसिले में बनारस चले आते हैं. इससे कुछ सफाई हो जाती है, नालियों में पानी और चूने का छिड़काव हो जाता है, नहीं तो अब बनारस पूरी तरह भोलेनाथ के भरोसे है."

First published: 17 February 2016, 8:01 IST
 
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