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नोटबंदी के बाद भी चौंकाएंगे मोदी पर देश का मूड कैसा है?

विवेक काटजू | Updated on: 1 December 2016, 7:53 IST
(अनिंदो मुखर्जी/गेटी इमेजेज़)
QUICK PILL
  • नोटबंदी पर आमलोगों से बात करके यही कहा जा सकता है कि ज़्यातार मोदी सरकार के इस फ़ैसले को सही मानते हैं. 
  • मोदी अब बेनामी संपत्ति वालों के ख़िलाफ भी कार्रवाई करके देश में नया धमाका कर सकते हैं.
  • उनकी कोशिश देश के उन नागरिकों को टैक्स के दायरे में लाने की है जिनपर वाक़ई में यह लागू होता है. 
  • मगर इन तमाम क़वायद से नरेंद्र मोदी को 2019 के आम चुनाव में जीत हासिल होगी या नहीं? यह बड़ा सवाल है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर को जिस नोटबंदी का ऐलान किया था, उसपर लोगों का लगातार समर्थन मिलना जारी है. गांव से लेकर शहर तक आम जनता मोदी के पक्ष में दिखाई दे रही है. इस दौरान मैंने जिससे भी बात की, वह नोटबंदी के बारे में अच्छी बातें ही करता नजर आया. हालांकि इन सबने यह भी माना कि नोटबंदी से उन्हें थोड़ी बहुत परेशानी और नुकसान तो हुआ ही है.

तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं

नोटबंदी की घोषणा के तीन दिन बाद मैं एक लाइन में खड़ा था. यह तो अच्छा रहा कि गुड़गांव में मेरे बैंक से पैसे निकालने के लिए मुझे केवल कुछ घंटे ही लाइन में खड़ा रहना पड़ा. मेरे पीछे एक नौजवान खड़ा था, जो नोटबंदी का खुला समर्थन कर रहा था. उसने बड़े सुकून के साथ कहा, ‘आज हम सब बराबर हो गए.’ उसकी इस छोटी-सी बात ने नोटबंदी के तुरंत बाद देश में बने माहौल को साफ कर दिया. नोटबंदी के प्रभाव से कोई अछूता नहीं रहा.

एक हफ्ते बाद निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर मिले राजस्थान के एक कुली ने कहा, उसको मिलने वाली मजदूरी आधी ही रह गई है. या तो मुसाफ़िर उन्हें पुराने 500 रूपए के नोट देते हैं या फिर छुट्टे के अभाव में उसे पूरी मजदूरी नहीं दे पाते. इसके बावजूद वह नोटबंदी के पक्ष में कहता है कि इससे कालाबाजारी रुकेगी. 

मैंने उससे पूछा कि गांव में उनका परिवार कैश की कमी से किस तरह निपट रहा है? इस पर उन्होंने कहा, गांव वाले घर में मौजूद राशन से काम चला लेंगे. हालांकि, साथ ही वह यह कहने से नहीं चूके कि भूमिहीन मजदूरों को तो परेशानी होगी.

दिल्ली के एक कॉलेज के छात्र ने कहा नोटबंदी से हालांकि हम सभी प्रभावित हुए हैं लेकिन मेरे साथियों की इस पर बहुत कड़ी प्रतिक्रिया नहीं है. यह एक तरह से मिली-जुली प्रतिक्रिया है. उन्होंने खुलासा किया कि उनके कुछ टीचर छात्रों के पास अपना पैसा रखवा रहे है. मैंने पूछा कि क्या उनके साथी ऐसा कर रहे हैं तो उसने जवाब दिया नहीं. उन्होंने कहा ये छात्र ऐसे कैसे अचानक अपने अकाउंट में पैसे की बढ़ोत्तरी दिखा सकते हैं.

आगरा में एक ड्राइवर ने कहा, 'कमीशनखोरी ने गरीबों का शोषण किया है. इनमें से कई तो इस झमेले में पड़े ही नहीं क्योंकि उन्हें मुसीबत में फंसने की चिंता थी. उन्होंने भी नोटबंदी का समर्थन किया और उम्मीद जताई कि मोदी काला धन जमा करने वालों को पकड़ ही लेंगे. तब हम यह सारी परेशानी भूल जाएंगे.'

विरोधी भी हैं

ऐसा भी नहीं है कि सारे ही लोग नोटबंदी के समर्थक हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक टैक्सी चालक नोटबंदी से नाखुश नजर आए. मुझे गुड़गांव से दिल्ली तक ले जाते हुए उन्होंने कहा, ‘उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में मोदी को इसकी कीमत चुकानी होगी.’ काफी लंबी चली बातचीत के बाद उन्होंने माना कि नोटबंदी उनकी जिंदगी भी बेहतर बना सकती है. 

उन्हें अपना गाजियाबाद का 55 गज का प्लॉट बेचना था, जो उन्होंने 2007 में खरीदा था. उन्हें एक खरीददार मिल भी गया. वह उनके प्लॉट को 55 लाख रूपए में खरीदने को तैयार था. वह 10 लाख रुपए व्हाइट में और बाकी के रुपए ब्लैक में देने पर सहमत था. उन्होंने एडवांस के तौर पर एक लाख रूपए दिए थे लेकिन अब खरीददार केवल सर्किल रेट पर ही पूरा भुगतान करना चाहते हैं.

यह ड्राइवर मोदी से खासे नाराज़ थे क्योंकि उनके भाई के ‘बॉस’ जैसा बड़ा आदमी जो कि उत्तर प्रदेश में राजनेता हैं और जिनके कई पेट्रोल पंप और शिक्षण संस्थान हैं, वह बड़ी आसानी से अपने काले धन को सफेद बना रहे हैं. इस टैक्सी चालक ने बताया कि वह दिल्ली की जिस टैक्सी कम्पनी के लिए काम करते हैं, उसने अपने 500 के करीब ड्राइवरों को कह दिया है कि सबका दिसम्बर का वेतन पुराने 500 या हजार रुपए के नोटों में मिलेगा, अगर कोई नहीं लेना चाहे तो वह नौकरी छोड़ सकता है.

प्लानिंग की कमी

कुछ और लोगों से भी मैंने इस बारे में बात की. ऑटो चालकों, मेट्रो में सवारी करने वालों, सुरक्षा गार्डों सभी ने नोटबंदी के इस फैसले का स्वागत किया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह बेहतर प्लानिंग के साथ किया जाना चाहिए था. जाहिर है मोदी को उम्मीद थी कि काला धन सामने आएगा और पूरा तंत्र साफ हो जाएगा. क्या जनता बैंक में आ रहे रुपयों और नई जन कल्याण योजनाओं से संतुष्ट हो जाएगी. 

इस सारी कवायद में जो लोग परेशान हो रहे हैं और जिसे बीजेपी थोड़ी-सी असुविधा का नाम दे रही है, उन्हें अब इस बात का इंतजार है कि अमीर और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ वाकई कार्रवाई होनी चाहिए. निश्चित रूप से मोदी काला धन उजागर करने और ज्यादा लोगों को कर दायरे में लाने के लिए और भी कार्रवाई करने वाले हैं.

आगे भी धमाके?

वे शायद इसके लिए इस बात की भी परवाह नहीं कर रहे कि अर्थव्यवस्था को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जो कि वाकई अर्थशास्त्री हैं, वे ऐसा करने के लिए तैयार नहीं थे. डॉ. मनमोहन सिंह का फोकस बाहरी अर्थव्यवस्था पर रहा और इस बात पर कि अर्थ जगत में कैश फ्लो बना रहे. मोदी उन लोगों को कैसे संतुष्ट कर पाएंगे, जिन्हें वे शायद गतिमान रख पाते? लेकिन नहीं रख सके.

मोदी ने इस काले धन सफाई अभियान के अगले चरणों के बारे में पहले ही संकेत दे दिए हैं. अब वे बेनामी संपत्ति के मालिकों पर कार्रवाई करेंगे. चूंकि सम्पत्तियां रजिस्टर्ड होती हैं. इसलिए इस कवायद में कईयों को काफी तकनीकी मुश्किलें पेश आने वाली हैं. क्या वे इसके बाद बेहिसाब सोने और गहनों का खुलासा करने जैसा कदम उठाएंगे?

सभी पर टैक्स का हंटर

क्या वे 2019 के लिए यह कदम उठाएंगे और पूरे तंत्र को साफ करने के लिए जनता से दूसरे कार्यकाल की मांग करेंगे और अगर ऐसा है तो वे राजनीतिक दलों की फंडिंग पर फोकस करेंगे और अगर ऐसा हुआ तो इस सारी कवायद का मतलब क्या? मोदी जिस बात के खिलाफ हैं, वह यह है कि कई लोगों की अवधारणा यह है कि नागरिकों के लिए टैक्स देना अनिवार्य नहीं है. 

एक छोटी-सी फोटो कॉपी की दुकान के मालिक एक कुरियर एजेंट ने कहा, 'अब लोग पेटीएम और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भुगतान की बात करते हैं लेकिन हमनें तो हमेशा ही कैश में सौदा किया है. अगर पूरी तरह कैशलेस बिजनेस चलाना है तो पूरा हिसाब-किताब रखना होगा, जबकि हमारी इतनी आमदनी ही नहीं है.' उनके चेहरे से साफ झलक रहा था कि वह किस परेशानी से गुजर रहे हैं. मोदी को लगता है कि इन छोटे दुकानदारों से देश की तस्वीर बदल जाएगी, मगर देखते हैं कि ऐसा होता है क्या?

First published: 1 December 2016, 7:53 IST
 
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