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संस्थागत विदेश नीति के बिना मोदी की विदेश यात्राएं बेमायने हैं

विवेक काटजू | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को मुखर रूप से सामने आकर काम करना होगा. विदेश सचिव को मंत्रालय के बाकी सचिवों के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिेए.  
  • भारतीय प्रधानमंत्री संस्थान की बजाय निजी प्रयासों पर भरोसा करते नजर आते हैं. लेकिन ठोस और टिकाऊ विदेश नीति के लिए इस नजरिए को बदलना होगा.

साल 2015 में भी नरेंद्र मोदी साल 2014 ही की तरह अपनी विदेश नीति को लेकर काफी सक्रिय रहे. लेकिन उन्होंने इस दौरान विदेश नीति की संस्थागत मजबूती को बढ़ाने की दिशा में बहुत कम काम किया जिससे उनकी कोशिशें ठोस आखार नहीं ले सकी हैं.

कुछेक नेताओं के व्यक्तिगत प्रयासों और उनके कुछ सलाहकारों की राय पर बनी विदेश नीति बहुत कारगर नहीं हो सकती. दिन-ब-दिन जटिल होती जा रही दुनिया में इसके लिए स्थायी, पेशेवर रूप से कुशल और भविष्योन्मुखी संस्थागत ढांचे की जरूरत होती है. इसके बिना सार्थक प्रबंधन और राय-मशविरा संभव नहीं. इस स्थिति में लिए गए फैसलों और नीतियों को जमीन पर उतारना मुश्किल होगा.

किसी व्यक्ति की पेशेवर कुशलता किसी संस्था में चार चांद लगा सकती है लेकिन अकेले वो किसी काम की नहीं होगी

विदेश मंत्रालय भारत की विदेश नीति निर्माण करने वाले संस्थागत ढांचे का दिल है. इस साल इसने अपनी पूर्ण क्षमता और कुशलता से काम नहीं किया. इसकी बेहतरी के लिए पर्याप्त सुधार नहीं किए गये. नतीजन इस संस्था में आयी गिरावट जगजाहिर हुई.

शीर्ष स्तर पर इस पेशेवर रवैए के अभाव के कारण एक तरह का असंतोष भी है. पारंपरिक रूप से विदेश नीति निर्माण के ढांचे में विदेश मंत्री शीर्ष पर आता है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एक अनुभवी और वरिष्ठ नेता हैं. वो अपने पद के लिए सर्वथा योग्य हैं. हाल ही में पाकिस्तान की यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी क्षमता को प्रदर्शित भी किया था. विदेश नीति निर्धारण की बारीकियों के साथ ही देश की नब्ज पर भी उनकी पकड़ है.
 
क्या वो देश की विदेश नीति निर्धारण में या उसे दुनिया के सामने पेश करने में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं? या क्या ऐसा लग रहा है कि विदेश मंत्री के रूप में वो पूरे अधिकार के साथ अपना कामकाज कर रही हैं? ये कहना कि वो सुर्खियों से दूर रहकर काम करना चाहती हैं, संदेह पैदा करता है.

sushma swaraj

इस साल स्वराज ने आप्रवासी और विदेश में रहने वाले भारतीयों पर विशेष ध्यान दिया. उन्होंने यमन में फंसे भारतीयों को निकालने में आगे बढ़कर नेतृत्व किया.

ये अच्छी बात है कि वो भारत से बाहर रहने वाले भारतीयों के अधिकारों के प्रति सजग हैं लेकिन विदेश मंत्री के तौर पर ये उनकी प्राथमिक चिंता नहीं होनी चाहिए. विदेश नीति पर भारत की नीतियों और परिकल्पना इत्यादि के मुद्दे पर उन्हें ज्यादा मुखर होकर सामने आना चाहिए. ये उनका राजनीतिक दायित्व है. भारतीय राजनयिकों का काम उनकी राजनीतिक दृष्टि का विस्तृत ब्योरा पेश करना होना चाहिए. ऐसा नहीं होना चाहिए कि राजनयिक ही भारत की विदेश नीति की पहल करें.

जनवरी में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए सुजाता सिंह को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटाकर उनकी जगह एस जयशंकर को विदेश सचिव बना दिया. जयशंकर प्रतिष्ठित और जानेमाने राजनयिक हैं. जाहिर है वो प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र भी हैं.

विदेश मंत्रालय के सचिवों के कार्यभार में मनमाने तरीके से बदलाव से गलत संदेश जाता है. मोदी को इससे बचना चाहिए

उस समय उम्मीद जतायी गयी थी कि वो अपने नेतृत्व में विदेश मंत्रालय के शीर्ष पेशेवर नेतृत्व को एकजुट करके उसमें नई ऊर्जा का संचार करेंगे. लेकिन अब तक वो उम्मीद, उम्मीद ही है.

ज्यों ज्यों भारत के कूटनीतिक हित का विस्तार हो रहा है उसकी विदेश नीति ज्यादा जटिल होती जा रही है. कोई एक राजनयिक वो चाहे जितना भी काबिल क्यों न हो वो राजनीतिक नेतृत्व को अंतिम सलाह नहीं दे सकता. यही वजह है कि एक ऐसे संस्थागत ढांचे की जरूरत है जो नियमित और ठोस तरीके से ऐसी सलाह दे सके.

विदेश मंत्रालय के चारों सचिव स्वतंत्र रूप से अलग-अलग मामलों का कामकाज देखते हैं. विदेश सचिव महज एक समान लोगों में पहला व्यक्ति होता है. इस साल कई बार बाक़ी सचिवों का काम बाधित होता दिखा. विदेश सचिव जब तक बाक़ी तीनों सचिवों के कामकाज का अतिक्रमण करते दिखे. इससे बाकी सचिवों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है. राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा के बावजूद ऐसे हस्तक्षेप से बचना चाहिए.

विदेश मंत्री का पोर्टफोलियो तो स्थायी रहा लेकिन बाकी तीनों सचिवों के पोर्टफोलियो में काफी फेरबदल देखने को मिला. इस मनमाने तरीके का देश-विदेश में काफी गलत संदेश गया. अगर ऐसा करना ही था तो इसे विधिवत तरीके से करना चाहिए था ताकि फिर इसमें आसानी से बदलाव न किया जा सके.

हालांकि बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में कुछ लचीलापन जरूरी है. लेकिन इसके लिए जरूरी बदलाव इतने आनन-फानन में नहीं करने चाहिए जैसे हाल में किए गये.

एक राजनयिक चाहे जितना भी काबिल हो वो एक संस्थागत ढांचे की जगह नहीं ले सकता

जरूरत इस बात की है कि नियमित सचिवालय के साथ सचिवों की औपचारिक कमेटी बनायी जाए. इससे विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग विषयों के जानकार सचिव अपनी राय दे सकेंगे. राजनीतिक नेतृत्व को उनके अनुभव और ज्ञान से सीधा लाभ मिलेगा. मौजूदा ढांचे में विदेश सचिव जब चाहे तब ऐसी बैठक बुला लेते हैं. ये बैठकें अक्सर ज्यादा देर नहीं चलतीं. इनसे बस अपने अपने खोल में बंद होकर काम करने की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है.

विदेश मंत्रालय और देश की सुरक्षा एजेंसियों के बीच भी ज्यादा मजबूत संबंध बनाने की जरूरत है. इसके लिए एक मजबूत तंत्र विकसित करना चाहिए. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से इसका संबंध काफी अस्पष्ट है. अगर दोनों की भूमिकाएं स्पष्ट रहें तो बेहतर होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी संस्था के बजाय व्यक्तिगत सलाह पर ज्यादा भरोसा करते नजर आते हैं लेकिन ठोस और टिकाऊ विदेश नीति के लिए उन्हें अपने नजरिए पर फिर से सोचना चाहिए.

First published: 26 December 2015, 8:31 IST
 
विवेक काटजू @catchhindi

पूर्व राजनयिक और स्वतंत्र टिप्पणीकार

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