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राफेल डील: SC में केंद्र का तर्क- PMO निगरानी को समानांतर वार्ता नहीं कहा जा सकता

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 May 2019, 17:21 IST

सुप्रीम कोर्ट में एक नया हलफनामा प्रस्तुत करते हुए केंद्र सरकार ने कहा है कि राफेल डील की प्रगति पर पीएमओ की निगरानी को समानांतर वार्ता (पैरेलल नेगोटिएशन्स ) नहीं कहा जा सकता है. शीर्ष अदालत को सौंपे गए हलफनामे में सरकार ने कहा, "इस सरकारी प्रक्रिया से पीएमओ द्वारा प्रगति की निगरानी को हस्तक्षेप या समानांतर वार्ता के रूप में नहीं देखा जा सकता है."

हलफनामे में कहा गया है "जैसा कि तत्कालीन रक्षा मंत्री ने फाइल पर दर्ज किया था ''ऐसा प्रतीत होता है कि पीएमओ और फ्रांसीसी राष्ट्रपति का कार्यालय उन मुद्दों की प्रगति की निगरानी कर रहा है जो शिखर बैठक का एक में शामिल थे. केंद्र ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 14 दिसंबर 2018 को राफेल विमान पर दिए फैसले सही ठहराया है. राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए 14 दिसम्बर के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की गई थी.

 

इस याचिका में कहा गया था कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम के सामने कई तथ्यों को छिपाया था. इससे पहले अख़बार द हिंदू की रिपोर्ट की रिपोर्ट में कहा गया था कि पीएमओ डसॉल्ट एविएशन द्वारा निर्मित 36 राफेल जेट की ऑफ-द-शेल्फ खरीद के लिए समानांतर वार्ता कर रहा था, यहां तक कि भारतीय वार्ता टीम ने अपने फ्रांसीसी समकक्ष के साथ विस्तृत बातचीत की थी.

समीक्षा याचिका पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण द्वारा दायर की गई थी. हलफनामे में कहा गया है, “सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के फैसले, रक्षा मामलों पर सरकार में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था और रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) द्वारा भी, रक्षा मंत्रालय में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है.

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First published: 4 May 2019, 15:56 IST
 
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