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मथुराकांड: सियासत और प्रशासन के गंदे गठजोड़ में गई पुलिस अधिकारियों की जान?

अभिषेक पराशर | Updated on: 4 June 2016, 14:38 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के जवाहर बाग में अतिक्रमण हटाने गए सिटी एसपी मुकुल द्विवेदी और दारोगा संतोष यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. 
  • राज्य में तीन सालों के भीतर यह दूसरा मामला है जिसमें भीड़ पुलिस पर भारी पड़ी है. इससे पहले प्रतापगढ़ के कुंडा में डिप्टी एसपी जियाउल हक की करीब से गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. 
  • मुख्य आरोपी रामवृक्ष यादव ने दो सालों से जवाहर बाग पर कब्जा कर रखा था. ऐसा लगता है कि राज्य सरकार में कुछ महत्वपूर्ण नेताओं से मिल रहे संरक्षण की वजह से प्रशासन यादव और अन्य अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई से बचता रहा.

कैच न्यूज की छानबीन में इस बात के संकेत मिले हैं कि मथुरा में घटी घटना की वजह वहां मौजूद अपराधियों को लंबे समय से मिल रहे राजनीतिक संरक्षण का भी परिणाम रही. जवाहर बाग में अतिक्रमण हटाने गई पुलिस के सिटी एसपी मुकुल द्विवेदी और एसओ संतोष यादव की इस घटना में मौत हो गई.

राज्य में तीन सालों के भीतर यह दूसरा मामला है जिसमें भीड़ पुलिस पर भारी पड़ी है. इससे पहले प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में डिप्टी एसपी जियाउल हक की करीब से गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. 

मथुरा हत्याकांड के मुख्य आरोपी रामवृक्ष यादव ने खुद को सत्याग्रही घोषित कर रखा था. धरने की आड़ में यादव ने जवाहरबाग की लगभग 250 एकड़ जमीन पर कब्जा कर रखा था.

करीब दो सालों तक प्रशासन की नाक के नीचे यह अतिक्रमण होता रहा. कहा जा रहा है कि आतिक्रमणकारियों को समाजवादी पार्टी की सरकार से संरक्षण मिल रहा था जिसकी वजह से प्रशासन यादव के खिलाफ सीधे कोई कार्रवाई करने की बजाय अदालत के आदेश का इंतजार करता रहा.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रशासन को जवाहर बाग की जमीन खाली कराने का आदेश दिया था. इसी आदेश की तामील कराने के लिए पुलिस का अमला बाग में मुआयना करने गया था. पुलिस वहां कार्रवाई के मकसद से नहीं गई थी.

पुलिस की कार्रवाई अगले दिन शुक्रवार की सुबह में होनी थी. लेकिन यादव के समर्थकों ने मुआयना करने गए एसपी और थानेदार पर कथित तौर पर योजनाबद्ध तरीके से हमला कर दिया. इस हमले में सिटी एसपी और दारोगा की जान चली गई.

पिछली बार की तरह ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुआवजे की घोषणा में देर नहीं की. कानून और व्यवस्था को बनाए रखने की सरकार की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए अखिलेश यादव ने इस हत्याकांड के लिए पुलिस की निष्क्रियता को ही जिम्मेदार ठहरा दिया. उन्होंने कहा, 'मौके पर इतने हथियारों से सामना होगा, यह अंदाजा पुलिस नहीं लगा पाई.'

मथुरा पुलिस के एक अधिकारी बताते हैं कि सरकार इस तरह का बयान देकर अपनी जवाबदेही से बचना चाहती है. उन्होंने कहा, 'सरकार में बैठे बड़े मंत्री की शह पर रामवृक्ष यादव ने जवाहर बाग पर अवैध कब्जा किया. यह मथुरा शहर का सबसे बड़ा बाग है जिसकी सीमा कलेक्ट्रेट से लगती है. कोई सामान्य गुंडा या अपराधी भी ऐसी जगह पर कब्जा करने के बारे में नहीं सोच सकता. यादव ने राजनीतिक संरक्षण की मदद से पूरी योजना के साथ बाग पर कब्जा किया.'

रामवृक्ष यादव ने दो सालों के भीतर जवाहर बाग पर कब्जा किया और इस दौरान उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी, इंस्पेक्टर जनरल (रुल्स एंड मैन्युअल्स) अमिताभ ठाकुर बताते हैं, 'मथुरा हत्याकांड को केवल पुलिस की विफलता नहीं बताया जा सकता है. यह राजनीतिक संरक्षण का मामला है. बगैर राजनीतिक संरक्षण के रामवृक्ष यादव जवाहर बाग पर कब्जा नहीं कर सकता था.' 

रामवृक्ष यादव के खिलाफ हत्या के प्रयास, अवैध कब्जे और मारपीट के कई आपराधिक मामले दर्ज हैं

रामवृक्ष यादव के बारे में फिलहाल कोई सूचना नहीं है. यादव के खिलाफ हत्या के प्रयास, अवैध कब्जे और मारपीट के कई आपराधिक मामले भी दर्ज है. 

मारे गए पुलिस अधिकारियों के परिजनों को डीएसपी जियाउल हक के परिवार की तरह 50 लाख रुपये मुआवजा और सरकारी नौकरी दिए जाने की मांग करते हुए ठाकुर ने कहा कि यह पूरा मामला राजनीतिक संरक्षण में पले-बढ़े अपराध का है. पुलिस पर हुआ हमला यह बताने के लिए काफी है, अपराधियों को किस तरह का मजबूत राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ था. 

उन्होंने कहा, 'सार्वजनिक पार्क पर कब्जा करने के मामले में आरोपी अपराधी संगठन को प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन देने के मामले में शिवपाल सिंह यादव की भूमिका की जांच होनी चाहिए.' चर्चा है कि आरोपी रामवृक्ष यादव की शिवपाल यादव से नजदीकी थी.

राजनीतिक संरक्षण के आगे बेबस पुलिस

उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जहां पुलिस को बेहद राजनीतिक दबाव में काम करना पड़ता है. 

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2014 के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जहां पुलिस को गिरफ्तारी तामील कराने के लिए सबसे ज्यादा जोर लगाना पड़ता है.

देश भर में 2014 में पुलिस को कोर्ट से मिले गिरफ्तारी ऑर्डर को तामील कराने के लिए 176 मौकों पर गोली चलानी पड़ी जो अन्य मौकों, आत्मरक्षा और दंगा नियंत्रण जैसे मामलों में पुलिस की तरफ से चलाई गई गोली के मामलों का करीब 38.1 फीसदी है. इनमें सिर्फ उत्तर प्रदेश के आंकड़ों की बात करें तो पुलिस को 62 मौकों पर गिरफ्तारी तामील कराने के लिए गोलीबारी का सहारा लेना पड़ा.

यह आंकड़ा बहुत कुछ कहता है. राज्य में अपराधियों को पुलिस का कोई भय नहीं है. राजनीतिक संरक्षण में अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ गया है कि ज्यादातर मामलों में उनकी गिरफ्तारी से पहले पुलिस को गोलीबारी का सहारा लेना पड़ता है. यह आंकड़ा आत्मरक्षा, दंगे और दूसरे मामलों से कही ज्यादा है. दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र्र आता है जहां पुलिस ने 36 मौकों पर गोली चलाई. यानी उत्तर प्रदेश का लगभग आधा.

2013 में प्रतापगढ़ के कुंडा में मारे गए डिप्टी एसपी जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद बताती है कि जब तक आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहेगा, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी.

आजाद ने कहा कि कोई बड़ा अपराधी भी पुलिस के मामूली अधिकारी को छूने की हिम्मत नहीं कर सकता. एसपी औैर डिप्टी एसपी की हत्या करना तो दूर की बात है. उन्होंने कहा, 'राजनीतिक संरक्षण के बिना यह संभव नहीं है.'

अपराधियों को मिले राजनीतिक संरक्षण का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकताा है कि 2014  में उत्तर प्रदेश पुलिस को दंगों को रोकने के मामले में महज 2 बार गोली चलानी पड़ी जबकि  अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए उसे सबसे ज्यादा 56 मौकों पर गोली चलानी पड़ी जिसमें 24 पुलिस वाले घायल हुए.

उत्तर प्रदेश पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में पुलिस को दंगा नियंत्रित करने के मामले में 2 बार, आत्मरक्षा में 1 बार जबकि अन्य मामलों में 3 बार गोली चलानी पड़ी. 

उत्तर प्रदेश पुलिस को अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए सबसे ज्यादा 56 मौकों पर गोली चलानी पड़ी

वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल बताते हैं, 'यह आंकड़ा राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधियों पर हाथ नहीं डाल पाने की पुलिस की बेबसी को बयां करता है. 

गिरफ्तारी के राजनीतिक नतीजों का आकलन करने के बाद ही उत्तर प्रदेश पुलिस किसी अपराधी के खिलाफ कार्रवाई कर पाती है. ज्यादातर मामलों में वह अदालती आदेश के बाद ही गिरफ्तारी का फैसला लेते हैं.'

मथुरा उद्यान विभाग के एक कर्मचारी ने बताया कि जब रामवृक्ष यादव सरकारी संरक्षण के तहत जवाहर बाग को हथियाने की कोशिश कर रहा था तब प्रशासन ने कई शिकायतों के बाद भी यादव के खिलाफ कार्रवाई नहीं की.

अधिकारी ने बताया कि सरकार बाग के 280 एकड़ की जमीन को 99 साल के लिए रामवृक्ष यादव को पट्टे पर दिए जाने की तैयारी कर ली थी. लेकिन ऐसा होने के पहले ही स्थानीय वकील विजयपाल सिंह तोमर ने बाग से अतिक्रमण हटाने के लिए जनहित याचिका दायर कर दी. 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका की सुनवाई करते हुए बाग को खाली कराने का आदेश दिया. जिसके बाद पुलिस के सामने असहज स्थिति पैदा हो गई.

क्या यह पुलिस की लापरवाही थी?

मारे गए मथुरा के सिटी एसपी मुकुल दि्वेदी पनी पत्नी और बच्चों के साथ (फाइल फोटो)

लाल बताते हैं कि मथुरा के डीएम और एसएसपी सरकार के करीबी अधिकारियों में शुमार किए जाते हैं. दोनों अधिकारी रामवृक्ष यादव के खिलाफ कार्रवाई कर सरकार को नाराज करना नहीं चाहते थे. पूरे मामले में मथुरा के डीएम और एसएसपी की भूमिका की भी जांंच होनी चाहिए.

लाल ने कहा, 'अदालती आदेश और मामले की गंभीरता के बावजूद दोनों बड़े अधिकारियों ने दो जूनियर अधिकारियोें को सामने कर दिया. ताकि मामले में कार्रवाई भी दिखा दी जाए और साथ ही सरकार में बैठे अपने आकाओं की नाराजगी भी न उठानी पड़े.'

यानी मथुरा के डीएम और एसएसपी कानून और व्यवस्था की स्थिति को बनाए रखने से ज्यादा सरकार में बैठे अपने आकाओं को खुश करने के लिए काम कर रहे थे.

मुआवजा मुख्यमंत्री

अखिलेश यादव की पकड़ सूबे की कानून व्यवस्था पर हो न हो लेकिन हालात बिगड़ने के बाद उनकी छवि एक अच्छा मुआवजा देने वाले मुख्यमंत्री की जरूर बन गई है. मुख्यमंत्री घटनाओं से सबक सीखने की बजाय मोटा मुआवजा बांटकर आगे बढ़ जाने में यकीन करते हैं.

मथुरा में मारे गए एसपी मुकुल द्विवेदी की मां ने राज्य सरकार के मुआवजे को ठुकराते हुए कहा कि ''हमें मुआवजा नहीं, हमारा बेटा वापस चाहिए. हमने क्या उसे मरने के लिए मथुरा भेजा था.'' 

समाजवादी पार्टी की सरकार पर आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संरक्षण देने का आरोप हमेशा लगता रहा है. डिप्टी एसपी जियाउल हक की हत्या का आरोप सपा सरकार के मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया पर लगा था. 

राजनीतिक दबाव की वजह से उन्हें मंत्री पद से हटाया तो गया लेकिन कथित ''क्लीन चिट'' मिलने के बाद उन्हें फिर से मंत्रालय दे दिया गया. आजाद बताती हैं, 'राजा भैया जिस क्लीन चिट के आधार पर फिर से मंत्रालय में शामिल किए गए, उसे मैंने चुनौती दी थी और वह खारिज हो चुका है.' 

आजाद ने कहा कि क्लीन चिट खारिज होने के बाद राजा भैया को मंत्री पद से हटाया जाना चाहिए था लेकिन वह अभी भी मंत्री बने हुए हैं. उन्होंने कहा, 'उत्तर प्रदेश सरकार तत्काल मुआवजा देती है, न्याय नहीं.' आजाद बताती है, 'मुझे जो मुआवजा मिला वह अभी भी बैंक  में ही पड़ा है. मैं यह लड़ाई सिर्फ अपने पति को न्याय दिलाने के लिए नहीं बल्कि उन अधिकारियों के लिए भी लड़ रही हूं जिन्हें राजनीतिक सरंक्षण प्राप्त अपराधियों के हाथों जान गंवानी पड़ती है.'

डीएसपी जियाउल हक की हत्या का मामला अभी भी अदालत में चल रहा है लेकिन राजा भैया सरकार में मंत्री बने हुए हैं. आजाद ने कहा, 'मुख्यमंत्री को रघुराज प्रताप सिंह को मंत्रीमंडल से हटाना चाहिए. उनके सरकार में बने रहने से गलत संदेश जाता है.'

मथुरा के पहले भी उत्तर प्रदेश में ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपराधियों के सामने समर्पण कर दिया. जियाउल हक के मामले में भी यही देेखा गया जब पुलिस के छोटे अधिकारी हिंसक भीड़ से मुकाबला करने की बजाए वहां से भाग खड़े हुए. 

आजाद बताती हैं कि विभाग ने उन पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई तो नहीं की. हां उनमें से कुछ अधिकारियों को पुलिस पुरस्कार जरूर दे दिया गया. 

सिटी एसपी मुकुल द्विवेदी और एसओ संतोष कुमार की हत्या के बाद पुलिस ने जिस बड़ी मात्रा में जवाहर बाग से अवैध हथियारों का जखीरा बरामद किया है, वह यह बताने के लिए काफी है कि रामवृक्ष यादव को सरकार में किस स्तर का संरक्षण मिला हुआ था.

पिछले तीन सालों (2012-14) के दौरान राज्य में हत्या और दंगों समेत संज्ञेय अपराधों में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2012 में राज्य में दर्ज कुल संज्ञेय अपराधों की संख्या 1,98,093 थी जो 2014 में बढ़कर 2,40,457 हो गई. यह आंकड़ा इस बात की गवाही है कि अखिलेश यादव अपने कार्यकाल में अपराध को रोकने में पूरी तरफ से विफल रहे हैं.

First published: 4 June 2016, 14:38 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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