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क्या मौर्या के आने से उत्तर प्रदेश में भाजपा के सिर मुकुट सज सकेगा?

पाणिनि आनंद | Updated on: 9 April 2016, 12:42 IST

फूलपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद केशव प्रसाद मौर्य को भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की कमान सौंप दी है. अमित शाह का यह फैसला पार्टी के भीतर और बाहर सबके लिए चौंकाने वाला था. जिन नामों को लेकर चर्चा चल रही थी, केशव मौर्य उनकी सूची में दूर-दूर तक नहीं थे. माना जा रहा था कि सूबे की कमान भाजपा सांसद और रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा को सौंपी जाएगी. कुछेक मौके पर इसकी घोषणा तक होने वाली थी और मनोज सिन्हा इस बाबत सक्रिय भी दिखे थे.

लेकिन पार्टी में कई कद्दावर नेताओं को मनोज सिन्हा नहीं भा रहे थे. खासकर राजनाथ सिंह और पार्टी के राज्य प्रभारी ओम माथुर, मनोज सिन्हा के नाम से सहमत नहीं थे. इन लोगों की ओर से भाजपा नेता धर्मपाल सिंह, जो कि लोध समाज के हैं, का नाम प्रस्तावित किया जा रहा था.

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इन नेताओं का कहना था कि धर्मपाल संगठन के आदमी हैं, लंबे समय से संगठन के लिए काम करते आए हैं और उनकी राज्य के कई हिस्सों में कार्यकर्ताओं के बीच पैठ है.

लेकिन धर्मपाल की इन कद्दावर नेताओं द्वारा की गई वकालत ही उनके नाम को खारिज करने की शायद वजह बन गई. पार्टी नेतृत्व और प्रधानमंत्री के लिए ऐसे लोगों का मज़बूत होना रणनीतिक रूप से बेहतर नहीं है जो कल को उनके प्रतिद्वन्द्वी के तौर पर खड़े हो सकते हैं. धर्मपाल भाजपा के कुछ राष्ट्रीय चेहरों के चहेते होने के कारण एक मज़बूत दावेदार होकर भी इस दायित्व से वंचित रह गए.

केशव मौर्य के आने से पार्टी के संकटों पर पूर्णविराम नहीं लगा हैबल्कि पार्टी के भीतर एक और मोर्चा खुल गया है


ऐसे में केशव प्रसाद मौर्य का नाम पार्टी नेतृत्व के लिए बीच का रास्ता है. लेकिन यह केवल मजबूरी भर नहीं है. पार्टी को इसमें सूबे की जातीय अंकगणित के लिए एक बेहतर आकलन भी नज़र आ रहा है. मौर्य के सहारे पार्टी की नज़र राज्य के 20 प्रतिशत अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों पर भी है.

पार्टी को पता है कि मुसलमान का वोट उन्हें मिलने से रहा. यहां तक कि अन्य पिछड़ा वर्ग से यादवों का वोट भी टूटकर पार्टी के खाते में जाएगा, इसकी गुंजाइश कम ही है. दलितों का वोट भी पार्टी के लिए दूर का स्वप्न है. खासकर दलितों में बड़ी तादाद जाटव और चमारों की है और ऐसा लगता है कि इसबार वे मायावती के पक्ष में कमर कस चुके हैं.

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बाकी दलित वोटों के बीच भी भाजपा को ज़्यादा कुछ हासिल होगा, इसकी गुंजाइश कम है क्योंकि दलित पिछले कुछ वर्षों में यह सीख चुका है कि मायावती के राज में वो सुरक्षित है और उसकी सुनवाई भी होती है.

भाजपा की सारी उम्मीद इस बात कर क़ायम है कि अगड़ी जातियां पूरे तौर पर उसके साथ जाएंगी और इसमें सेंधमारी कर पाने में सपा और बसपा असफल रहेंगे. कांग्रेस और भाजपा के बीच अगड़ों में ज़्यादा वोट कांग्रेस को मिलेंगे इसकी गुंजाइश भाजपा को नहीं लगती. उनका आकलन है कि राष्ट्रवाद से लेकर हिंदुत्व तक की बहस का लाभ भाजपा को मिलेगा और सवर्ण उसके साथ खड़ा नज़र आएगा.

भाजपा की रणनीति उत्तर प्रदेश की यादव के अलावा बाकी छोटी-छोटी ओबीसी जातियों को साधने की भी है


लेकिन केवल सवर्ण वोटों के सहारे भाजपा उत्तर प्रदेश की वैतरिणी पार नहीं कर सकती. इसीलिए ज़रूरी है कि वो अन्य पिछड़ा वर्ग के और अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों पर अपना ध्यान केंद्रित करे. यह ऐसा तबका है जो अब तक असंगठित रूप से वोट करता आया है. भाजपा की रणनीति उत्तर प्रदेश की इन छोटी-छोटी ओबीसी जातियों को साधने की भी है.

सवर्ण साथ है और अति पिछड़े को साथ लाने के लिए उनके बीच से एक व्यक्ति अब भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष है, पार्टी यह संदेश दे पाने में खुद को फिलहाल सफल पा रही है.

दूसरी अहम बात यह है कि मायावती के पास जो सबसे विश्वस्त नाम हैं, उनमें से एक नाम स्वामी प्रसाद मौर्य का है. बसपा में स्वामी प्रसाद मौर्य अति पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करते हैं और मायावती के सबसे खास माने जाते हैं. यही कारण है कि बिरादरी उनको अपना नेता मानती है और बसपा के लिए वोट भी करती है.

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ऐसे में भाजपा के लिए ज़रूरी है कि वो अति पिछड़ों के बीच से एक चेहरे को सामने रखकर बसपा के प्रति उनके रुझान का विकल्प दे. साथ-साथ अति पिछड़ों के बीच बसपा की पकड़ को कमज़ोर करने से वोट बंटेगा और इसका लाभ भी भाजपा को मिलने की उम्मीद है.

दरअसल, भाजपा के लिए यह बहुत जरूरी है कि मायावती को इस वक्त कमज़ोर किया जाए और उनकी रणनीति के सापेक्ष अपनी रणनीति रची जाए. ऐसा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि अभी आम जनता के बीच मायावती को सूबे की सबसे बेहतर प्रशासक के रूप में याद किया जा रहा है. मायावती को कमज़ोर किए बिना भाजपा को बड़ी नुकसान हो जाएगा.

उत्तर प्रदेश की आम जनता के बीच मायावती को सूबे की सबसे बेहतर प्रशासक के रूप में याद किया जा रहा है


केशव प्रसाद मौर्य के साथ जो बातें भाजपा को अपने पक्ष में जाती दिखती हैं वो ये हैं कि वो एक बहुत ग़रीब घर से आते हैं. हालांकि ताज़ा हलफ़नामों के मुताबिक केशव मौर्य करोड़पति हैं और कई बड़े आपराधिक मामले भी उनपर दर्ज हैं. लेकिन उन्होंने ऐसा समय भी देखा है जब उनके पिता चाय बेचते थे. केशव मौर्य ने खुद पिता के साथ चाय बेचने का और अखबार बेंचने का काम किया है.

केशव मौर्य के खिलाफ़ कई अपराधिक मामले दर्ज हैं. बताया जाता है कि इनमें से एक मामला हत्या का भी है. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपराध मुक्त राजनीति का नारा भी संदेह के दायरे में आ गया है. लेकिन भाजपा को इससे खासा फर्क नहीं पड़ता. वो जानते हैं कि ऐसी स्थितियों के बावजूद इस बात की गुंजाइश कम ही है कि शहरी मध्यवर्ग केवल इतने भर से भाजपा के बारे में अपनी राय बदल देगा और मोदी से मुंह मोड़ लेगा.

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साथ ही केशव प्रसाद का इतिहास लगभग दो दशकों तक विश्व हिंदू परिषद के प्रचारक के तौर पर काम करने का भी रहा है. वो ज़्यादा दिखावे वाले भाजपा नेताओं में से नहीं गिने जाते. ऐसे में संघ और विहिप से भी उनके नाम को लेकर किसी आपत्ति की संभावना नहीं है.

एक और बात बहुत अहम है. किसी कद्दावर नेता के कंधे से उत्तर प्रदेश की राजनीति साध पाना पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए इतना आसान नहीं होता. लेकिन केशव प्रसाद मौर्य क्योंकि इतने बड़े नाम और नेता नहीं हैं, ऐसे में निर्णयों और प्रबंधन में अमित शाह को असहमति या अड़चनों का कम सामना करना पड़ेगा. अमित शाह, केशव मौर्य को सामने रखकर ज़्यादा आसानी से उत्तर प्रदेश में पार्टी की राजनीति को नियंत्रित कर सकते हैं.

हालांकि केशव मौर्य के आने से पार्टी के संकटों पर पूर्णविराम लग गया है, ऐसा हरगिज़ नहीं है. बल्कि पार्टी के भीतर भाजपा ने एक और मोर्चा खोल दिया है.

First published: 9 April 2016, 12:42 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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