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बेनी बाबू की घर वापसी, समाजवाद की एक क्षरित तस्वीर

पाणिनि आनंद | Updated on: 15 May 2016, 8:36 IST

वर्ष 2007 में समाजवादी पार्टी का दामन छोड़कर जाने वाले बेनी प्रसाद वर्मा की घर वापसी हो गई है. उन्होंने पार्टी में वापसी की घोषणा उस वक्त की जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बनारस में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. 

सूबे की राजनीति के लिए यह अगले साल के विधानसभा चुनावों से पहले की एक अहम करवट है. इस करवट से जाति आधारित राजनीति का अंकगणित जुड़ा है. इस फैसले में वर्चस्व की राजनीति समाहित है. इस क़दम में जनता परिवार की कलह दिखाई दे रही है.

नीतीश और बेनी प्रसाद दोनों ही कुर्मी समाज से हैं और उनके नेता माने जाते हैं. फर्क इतना है कि बेनी की ज़मीन उत्तर प्रदेश है और नीतीश की बिहार. लेकिन नीतीश बिहार से भी बड़े विस्तार के नेता बनने का मन बना चुके हैं. उनकी नज़र में 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी है और 2019 का लोकसभा चुनाव भी. 

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बेनी बाबू अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और मुलायम को बेनी प्रसाद में एक पुराना तुरुप का इक्का नज़र आ रहा है. इसीलिए राजनीति की घोड़ी को बेनी प्रसाद ने अब मुलायम के आंगन में बांध दिया है.

बेनी बाबू के पास पार्टी छोड़ते वक्त जो तर्क था, वही तर्क आज भी है. उनका तर्क था कि उन्होंने इस पार्टी को बनाया है, इसे एक परिवार की भेंट चढ़ते नहीं देख सकते और इसलिए पार्टी छोड़कर जा रहे हैं. आज भी वही वाक्य वापसी का बहाना है. वो कह रहे हैं कि यह पार्टी उन्होंने बनाई है और इसीलिए इसमें बने रहना चाहते हैं. 

दरअसल, बेनी प्रसाद अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और सत्ता में प्रासंगिक बने रहने की हुड़क उन्हें वापस मुलायम सिंह यादव के दरवाज़े तक खींच लाई है.

बेनी का परिवारवाद

बेनी बाबू ने जब मुलायम का साथ छोड़ा था तब उन्होंने मुलायम पर परिवारवाद का आरोप लगाया था. बेनी को दुख था कि समाजवाद की राजनीतिक विचारधारा यादव परिवार की गाय बन गई है और उसे वही लोग दुह रहे हैं जो परिवार के सदस्य हैं. बाकी लोगों को मुलायम सिंह यादव ने नारे लगाने और संख्या जुटाने के लिए रख रखा है.

बेनी प्रसाद इसके बाद कांग्रेस में गए. केंद्रीय मंत्री बने. फिर कांग्रेस की सरकार गई तो खुद को अप्रासंगिक पाने लगे. दरअसल, बेनी कभी कांग्रेस के नहीं थे. वो अवसर के थे. अवसर गया तो सत्ता के अवसर की ओर देख रहे हैं. 

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बेनी बाबू का नाम इस वक्त समाजवादी पार्टी की ओर से राज्यसभा भेजे जाने वाले लोगों में सबसे ऊपर है. साथ ही बेनी प्रसाद को खुद के साथ-साथ अपने बेटे राकेश वर्मा के राजनीतिक करियर को भी रास्ते पर लाना है.

जिस परिवारवाद का इल्ज़ाम बेनी प्रसाद ने मुलायम पर लगाया उसी का मोह उन्हें वापस मुलायम के पास खींच ले गया है. 75 के हो चुके बेनी प्रसाद जीवन के इस पड़ाव में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं. 

कांग्रेस के पास उनके लिए काम नहीं है क्योंकि वो कांग्रेस की कार्यसंस्कृति के हैं भी नहीं और उन्हें सामने खड़ा करना कांग्रेस के लिए खतरे से खाली भी नहीं है क्योंकि बेनी प्रसाद अपने विवादित बयानों से राजनीतिक हलचल पैदा करते रहे हैं और उनके जैसे बयान राहुल गांधी वाली कांग्रेस में पसंद नहीं किए जाते हैं.

अबकी बार, बेनी बनाम नीतीश कुमार

मुलायम के पास उन्हें वापस लेने के लिए पर्याप्त कारण हैं. बेनी प्रसाद जिस वक्त पार्टी से गए थे, उस वक्त पार्टी एक परिवार के बजाय एक समाजवादी पीढ़ी की धरोहर थी. मुलायम सिंह यादव का कद सबसे बड़ा था लेकिन परिवारवाद को पूरी तरह से स्वीकृति नहीं मिली थी.

बेनी प्रसाद खुद को मुलायम के क़द के नेता के तौर पर देखते आए हैं. वो पिछड़े वर्ग की दूसरी सबसे मज़बूत और दबंग जाति के नेता हैं. उन्हें लगता था कि पार्टी में उनका क़द मुलायम के समकक्ष रहेगा. 

ऐसा हुआ नहीं. परिवार की अपनी सूची लंबी होती गई और उसने पार्टी पर अपना कब्ज़ा बना लिया. बेनी से राजनीति का रा सीखने वाले अखिलेश यादव अब सूबे के मुख्यमंत्री हैं.

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तब बेनी मुलायम के लिए एक चुनौती थे. अब नहीं हैं. तब बेनी प्रसाद पार्टी में अपने कद के लिए लड़ रहे थे, आज पद के लिए लड़ रहे हैं. तब बेनी प्रसाद को लगता था कि समाजवादी पार्टी उनके बिना ल़खड़ाने लगेगी, आज वो खुद को खड़ा रखने की जद्दोजहद में लगे हैं. 

बेनी बाबू अब मुलायम के लिए एक मज़बूत स्पर्धी नहीं हैं, एक ऐसा चेहरा हैं जिसे चंद रेवड़ियां देकर एक बड़ी जाति को अपने साथ खड़ा रखा जा सकता है.

बेनी इस वक्त की ज़रूरत भी हैं. नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश का रुख कर चुके हैं. मुलायम के लिए नीतीश का सूबे में आना अच्छी खबर नहीं है. नीतीश कांग्रेस और बाकी छिटपुट राजनीतिक दलों के साथ मिलकर बड़े खेल की तैयारी कर रहे हैं. मुलायम के लिए यह उन्हें उनकी ज़मीन पर ललकारने जैसा है.

कुर्मी सूबे में पांच प्रतिशत के करीब हैं. यह एक अच्छी संख्या है. कुर्मी जिन जिन ज़िलों, इलाकों में हैं, वहां अच्छी तादाद में हैं और परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. 

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ऐसे में मुलायम के लिए बेनी नीतीश का जवाब बनकर आए हैं. कम से कम मुलायम ऐसा मानते हैं कि नीतीश से निपटने में बेनी बाबू एक अहम हथियार साबित होंगे.

बेनी खुद भी नहीं चाहते कि उनके रहते कोई और कुर्मियों का नेता बनकर सूबे में खड़ा हो जाए. उनके लिए भी यह ज़रूरी है कि इस रथ को रोका जाए. कांग्रेस में बने रहने से बेनी को नीतीश के आगे छोटा करके ही रखा जाएगा लेकिन सपा में जाकर वो खुद को जाति का सेनापति बता सकते हैं.

बेनी प्रसाद की घर वापसी की ख़बर 2-3 महीने से चल रही थी. नीतीश की ललकार इसे घोषित करने का सही अवसर बनकर आई. राजनीति में अवसर की भाप और जनता का ताप समीकरणों को तय करता है.

बेनी और मुलायम अपने कमज़ोर होते वर्चस्व और ढलती हुई अवस्था में फिर से साथ खड़े होकर एक दूसरे के सहारे मज़बूत होना चाहते हैं. यह मज़बूती कितनी संभव हो पाती है, यह अगले वर्ष तय हो सकेगा.

First published: 15 May 2016, 8:36 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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