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चंदे का चक्कर: इस जुर्म में बीजेपी-कांग्रेस बराबर के साझेदार हैं

जगदीप एस छोकर | Updated on: 7 January 2016, 8:12 IST
QUICK PILL
  • एफसीआरए के तहत भारत की कोई राजनीतिक पार्टी विदेशी चंदा नहीं ले सकती. लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने विदेशी चंदा लिया. दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से उनपर कार्रवाई करने के लिए कहा है.
  • भारत सरकार इस कार्रवाई से बचने के लिए एफसीआरए कानून में बदलाव करने की कोशिश कर रही है. राजनीतिक पार्टियां कानूून से बचने के लिए पहले भी इस तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं.

बीजेपी और कांग्रेस संसद के अंदर और बाहर लगभग हर मुद्दे पर एक दूसरे से असहमत नजर आते हैं लेकिन एक मुद्दे पर दोनों दल पूरी तरह रजामंद हैं. वो है पार्टियों को मिलने वाला विदेशी चंदा.

पब्लिक डोमेन में मौजूद जानकारी के अनुसार भारत के ये दोनों प्रमुख दल विदेशी चंदा लेते हैं. जबकि उन्हें नहीं लेना चाहिए.

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद मौजूदा सरकार के रवैये से ऐसा नहीं लगता कि इन दोनों पार्टियों को कानून तोड़ने के लिए किसी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा.

क्या है कानून?

एफसीआरए (फॉरेन कंट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) पहली बार 1976 में लागू किया गया. साल 2010 में इस कानून को विस्तार दिया गया. जिसके अनुसार राजनीतिक पार्टियां और उनके पदाधिकारी विदेशी चंदा नहीं ले सकते.

इसके अलावा कानून निर्माता, चुनाव प्रत्याशी और राजनीतिक चरित्र वाली कोई भी संस्था विदेशी चंदा नहीं ले सकते.

भारत में राजनीतिक पार्टियों को इनकम टैक्स से पूरी तरह छूट है. इस छूट को हासिल करने के लिए उन्हें 20 हज़ार रुपये से अधिक के चंदे की जानकार चुनाव आयोग को देनी होती है.

कैसे हुआ उल्लंघन?

साल 2013 में केंद्र सरकार ने कार्पोरेट कंपनियों को चुनावी ट्र्स्ट बनाने की अनुमति दी. राजनीतिक पार्टियां द्वारा चंदा के बारे में दी गयी जानकारी के अनुसार कुछ पार्टियों ने ऐसे चुनावी ट्रस्टों से चंदा लेने की जानकारी आयोग को दी थी.

चुनावी ट्रस्ट से चंदा लेने वालों में बीजेपी और कांग्रेस दोनों थे. दोनों ने तीन कंपनियो द्वारा मिलकर बनाये गए एक ट्र्स्ट से पैसा लेने की जानकारी दी थी.

इन कंपनियों की वेबसाइट पर दी गयी जानकारी के अनुसार ये तीनों ब्रिटेन में पंजीकृत एक कंपनी की सहायक कंपनियां हैं. कार्पोरेट पर्दे के पीछे इन दोनों पार्टियों ने विदेशी चंदा लिया. यानी दोनों ने एफसीआरए का उल्लंघन किया.

जनहित याचिका पर अदालत का फैसला

दोनों पार्टियों के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गयी.

28 मार्च, 2014 को अदालत ने बीजेपी और कांग्रेस को एफसीआरए के उल्लंघन का दोषी पाया. अदालत ने फ़ैसले पर अमल के लिए चुनाव आयोग को छह महीने की वक़्त दिया.

इस मामले में भारत सरकार और चुनाव आयोग प्रतिवादी थे. एफसीआरए को लागू कराने की जिम्मेदारी भारत के गृह मंत्रालय की है. चुनाव आयोग ने गृह मंत्रालय को अदालत के फैसले के अनुरूप कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा.

एफसीआरए के तहत प्रतिबंध के बावजूद बीजेपी और कांग्रेस ने लिया विदेशी चंदा

गृह मंत्रालय ने कार्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय से दोनों पार्टियों को चंदा देने वाली 'विदेशी' कंपनियों के बारे में जानकार मांगी. कार्पोरेट मंत्रालय ने जो सूची दी उसे गृह मंत्रालय ने चुनाव आयोग को भेज दिया.

ऐसा लगता है कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब तक कुल यही कार्रवाई हुई है. दूसरी तरफ बीजेपी और कांग्रेस ने हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी है.

राजनीतिक पार्टियों ने जो किया

21 दिसंबर, 2015 को 'द इकॉनिमिक टाइम्स' में एक रिपोर्ट छपी जिसमें इस मामले में की गई 'असल कार्रवाई' के बारे में बताया गया था.

रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय ने एफसीआरए में बदलाव करने का प्रस्ताव दिया है. जिसके अनुसार, "भारत में जिन सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है उनमें काम करने वाली भारत में पंजीकृत कंपनियों को अपने कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलटी(सीएसआर) फंड से भारतीय राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने की इजाज़त होगी."

रिपोर्ट के अनुसार इससे पहले भारत में पंजीकृत किसी भी कंपनी को 'भारतीय कंपनी' मानने, चाहे उसके शेयर किसी के पास हों, के प्रस्ताव पर अंतर-मंत्रालयी चर्चा में अस्वीकार कर दिया गया था.

विदेशी चंदे लेने के मामले में कार्रवाई से बचने के लिए सरकार कानून बदलने की कोशिश कर रही है

इस रिपोर्ट से ये अर्थ निकाला जा सकता है कि भारत की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों को ये भरोसा नहीं कि इस मामले में वो अदालती रास्ते से बच पाएंगी. इसीलिए वो कानून के उल्लंघन की सजा से बचने के लिए पिछले दरवाजे से प्रयासरत हैं.

ऐसा लगता है कि जब इस कानून से बचने का आसान रास्ता कुछ अधिकारियों के चलते विफल हो गया तो इन पार्टियों ने लंबा और बहुस्तरीय रणनीति अपनायी-

  1. कानून में संशोधन करना जो पिछली तारीख से लागू हो. इससे दोनों पार्टियां उनपर लगे आरोपों से मुक्त हो जाएंगी. इसका शायद ही कोई दूसरी पार्टी विरोध करे क्योंकि उन्हें भी भविष्य में लाभान्वित होने की उम्मीद होगी.
  2. जिन सेक्टरों में एफडीआई की अनुमति है उनमें 'भारत में पंजीकृत विदेशी कंपनियों' को 'भारतीय राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने' की इजाज़त देने की कोशिश को मास्टरस्ट्रोक की तरह देखा जा रहा है. जिसका भी इस देश के तौरतरीकों से परिचय है उसे ये समझते देर नहीं लगेगी कि ये मामला साफ़ साफ़ एक-दूसरे का हित साधने की मंशा को कानूनी जामा पहनाना है.
  3. राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए के लिए सीएसआर फंड के इस्तेमाल की इजाज़त देने की बात तो सचमुच गुगली ही है. जब कुछ कंपनियों के लिए सीएसआर को जरूरी बनाया गया तो कार्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय को तय करना था कि इसे किन मदों में खर्च किया जा सकता है. इसके शुरुआती मसौदे में राजनीतिक पार्टयों को दिया गया चंदा को भी सीएसआर के तहत रखा गया था.

कई नागरिक संगठनों और संस्थाओं ने इन प्रस्तावों का विरोध किया. लंबी बहस के बाद राजनीतिक पार्टियों को दिए गये चंदे को सीएसआर से बाहर रखने पर सहमति बनी. अब इस नये संशोधन के बाद दोबार एक बार ठुकराये जा चुके प्रावधान को लागू किया जा रहा है.

हम कहां हैं और भविष्य क्या होगा

मौजूदा स्थिति ये है: 

  • बीजेपी और कांग्रेस ने एफसीआरए को उल्लंघन किया है.
  • दोनों पार्टियों की अपील सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.
  • दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बावजूद गृह मंत्रालय ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की.
  • राजनीतिक पार्टियों को विदेशी चंदा दिलाने के लिए एफसीआरए में बदलाव करने की कोशिश की जा रही है.

भविष्य में क्या होगा?

एक चीज तो साफ है कि जब भी इस देश की राजनीतिक पार्टियां किसी कानून का उल्लंघन करते हुए पकड़ी जाती हैं तो वो उस कानून को ही बदलने की कोशिश करती हैं. वो हमेशा खुद को कानून से ऊपर रखने की कोशिश करती हैं.

ये कम से कम पिछले 40 साल से होता रहा है. 1975 में कंवरलाल गुप्ता बनाम अमर नाथ चावला मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आरपी एक्ट (जनप्रतिनिधि कानून) में संशोधन कर दिया गया.

आरपी एक्ट, फिर आरटीआई एक्ट और अब एफसीआरए. ये सूची लंबी होती जा रही है. क्या इसपर कभी रोक लगेगी? कौन जानता है?

First published: 7 January 2016, 8:12 IST
 
जगदीप एस छोकर @CatchNews

Jagdeep S. Chhokar is a former professor, Dean, and Director In-charge at IIM, Ahmedabad. Views are personal.

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