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कश्मीरी पंडितों की घर वापसी पर फिर गर्म हुई घाटी की राजनीति

गौहर गिलानी | Updated on: 2 June 2016, 7:30 IST

कश्मीरी पंडितों के घर वापसी की बहस के बीच करीब 1200 पंडित स्कूल टीचर चुपचाप अपने काम पर वापस आने जा रहे हैं. उनकी वापसी का जरिया बन रही है केंद्र सरकार की कश्मीरी प्रवासी वापसी और पुनर्वास योजना.

राज्य सरकार के एक सूत्र ने कैच को बताया, "करीब 1200 प्रवासी पंडित कश्मीर के विभिन्न स्कूल और कॉलेजों में प्रिंसिपल, हेडमास्टर, टीचर के तौर पर विभिन्न स्कूलों में अपनी सेवा दे रहे हैं."

1990 के दशक में घाटी छोड़कर बाहर जाने वाले पंडितों की वापसी का मुद्दा हमेशा विवादों में रहता है. हुर्रियत और जेकेएलएफ जैसे अलगाववादी गुट 'कंपोजिट टाउनशिप' या 'अलहदा कॉलोनियों' में उनकी वापसी का विरोध करते हैं. अलगाववादी इसकी तुलना फिलीस्तीन में बसाई गई इसराइली बस्तियों से करते हैं. 

जब भी कश्मीरी पंडितों की वापसी की बहस तेज होती है तो ये गुट विरोध प्रदर्शन करने लगते हैं. इनका कहना है कि अगर पंडितों को वापस आना है तो वो अपने मूल घरों में वापस आएं.

व्यावहारिक विचार

राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हाल ही में विधानसभा में कहा कि उनकी सरकार 'कश्मीरी पंडितों की ससम्मान वापसी' सुनिश्चित करेगी.

सीएम ने कहा कि पीडीपी-बीजेपी सरकार कश्मीरी पंडितों और दूसरे प्रवासियों को वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा कि जो प्रवासी कश्मीर वापस आना चाहेंगे सरकार उनके लिए ट्रांजिट एकॉमोडेशन (अस्थाई आवास) की व्यवस्था भी करेगी.

महबूबा ने विपक्षी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस और अलगाववादी गुटों के उन दावों को गलत बताया कि सरकार पंडितों के लिए अलग कॉलोनी बना रही है. 

कश्मीरी पंडितों के लिए ट्रांजिट एकॉमोडेशन के सवाल पर महबूबा ने कहा कि इसका सुझाव 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वर्किंग ग्रुप ने दिया था और ये 'मुसलमान और सिख प्रवासियों के लिए भी' होगा.

कश्मीरी पंडितों के अस्थाई निवास की तुलना इसराइली बस्तियों से करना गलतः सीएम महबूबा मुफ्ती

कश्मीरी पंडितों के उनके मूल निवासों में वापसी पर हैरत जताते हुए महबूबा ने कहा कि जब पीडीपी, कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस और दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ता सुरक्षा घेरे में रह रहे हों तो कश्मीरी पंडितों का अपने मूल निवासों में लौटना कैसे संभव है.

सीएम ने कहा, "ट्रांजिट एकॉमोडेशन प्रवासियों को दी जाने वाली सुविधा है. क्या प्रवासी मुस्लिम नहीं हैं? क्या जम्मू में प्रवासी नहीं हैं? क्या उनमें सिख और दूसरे लोग नहीं हैं? अगर हम कहते हैं कि उनमें 50 फीसदी कश्मीरी पंडित होंगे और बाकी अन्य तो आप कहते हैं कि इसराइल जैसी हालत हो जाएगी." 

सीएम ने विपक्षियों को जवाब देते हुए कहा कि कश्मीरी पंडित तभी घर वापस आ सकते हैं जब वो सुरक्षित महसूस करें.

विवाद का जवाब

महबूबा द्वारा कश्मीरी पंडितों के अपने मूल निवासों में वापसी के मुद्दे पर ' कबूतर को बिल्लियों के बीच फेंकने' मुहावरे के प्रयोग से विपक्षी दल और अलगाववादी गुट नाराज हो गए.

सीएम महबूबा ने कहा था कि "कश्मीरी पंडितों को उनके मूल निवासों में वापसी करने के लिए कहना कबूतर को बिल्लियों के बीच फेंकने जैसा होगा."

सीएम के बयान के बाद हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी ने महबूबा से मुसलमानों की तुलना "बिल्लियों" से और पंडितों की तुलना "कबूतरों" से करने के लिए माफी मांगने की मांग की.

विकल्प

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के प्रमुख संजय टिक्कू कहते हैं कि इस मुद्दे का 'बेवजह राजनीतिकरण' किया जा रहा है, ये एक मानवीय मुद्दा है. उन्होंने कैच से कहा, "अभी स्थिति प्रतिकूल है. एक मानवीय विषय को अलग-अलग लोग राजनीतिक बना रहे हैं."

टिक्कू कहते हैं कि इस मुद्दे के राजनीतिकरण से मुसलमान, पंडित और सिख असुरक्षित होंगे. खुद टिक्कू उन पंडितों में से हैं जिन्होंने अलगाववाद के चरम के समय भी कश्मीर नहीं छोड़ा. वो आज भी श्रीनगर के बारबारशाह में रहते हैं.

वो कहते हैं कि ज्यादातर कश्मीरी पंडित अपनी पैतृक संपत्तियां बेच चुके हैं इसलिए उनका अपने मूल निवास में वापसी 'व्यावहारिक' नहीं है. वे पूछते हैं कि अगर कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की एक योजना सफल नहीं होती तो क्या सरकार के पास कोई वैकल्पिक योजना है?

पुनर्वास योजना

कश्मीरी पंडितों की वापसी और पनर्वास के लिए प्रधानमंत्री पैकेज की  अप्रैल 2008 में घोषणा की गई थी. इसके तहत हर परिवार को अपने टूटे हुए घर के निर्माण के लिए 7.5 लाख रुपये, घर की मरम्मत के लिए दो लाख रुपये की मदद देने की बात कही गई थी. 

जो लोग अपना पैतृक निवास बेच चुके हैं उन्हें किसी हाउजिंग कॉलोनियों में घर खरीदने के लिए 7.5 लाख रुपये देने का प्रावधान था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित नए पैकेज के अनुसार पंडित परिवारों को उनके घर तैयार होने तक 'अस्थाई आवास' उपलब्ध कराए जाएंगे. जिन परिवारों को अस्थाई आवास नहीं मिल सकेगा उन्हें किराया-भत्ता दिया जाएगा. लोगों का मानना है कि नया पैकेज पहले से ज्यादा आकर्षक है.

प्रक्रिया

जम्मू-कश्मीर सरकार के प्रवक्ता नईम अख्तर ने कैच से कहा, "कश्मीरी पंडितों की वापसी को एक प्रक्रिया की तरह देखना चाहिए न कि एक आयोजन के तौर पर. स्थिति धीरे धीरे बेहतर हो रही है. कश्मीरी पंडितों की वापसी की प्रक्रिया की अपनी सीमारेखा है."

अख्तर कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय को ये महसूस होने लगा है कि कश्मीरी पंडितों का घाटी छोड़ना 'कश्मीर के आपसी एकता और भाईचारे के समृद्ध इतिहास' में एक 'दुखद अध्याय' है.

मुसलमानों को ये महसूस होने लगा है कि कश्मीरी पंडितों का घाटी छोड़ना कश्मीर के इतिहास का एक दुखद अध्याय है

वो कहते हैं, "मुस्लिम समुदाय उनके घाटी छोड़ने के लिए जिम्मेदार नहीं है लेकिन जो गंभीर भूल हुई है उसे हम स्वीकार तो कर सकते हैं?"उनका मानना है कि घाटी के बहुसंख्यक तबके द्वारा ये स्वीकार किये जाने से पंडितों को नैतिक साहस मिलेगा.

अख्तर ने मुस्लिम-पंडित भाईचारे को याद करते हुए बताया कि किसी तरह उन्होंने जनवरी, 2006 में अपने पंडित दोस्त जगत नाथ साहू का अंतिम संस्कार किया था. साहू लंदन के टेलीग्राफ अखबार में पत्रकार थे.

अख्तर कहते हैं, "साहू ने वसीयत की थी कि मेरा अंतिम संस्कार नईम अख्तर करेगा. 25 जनवरी 2006 को मैंने दिल्ली से जाकर उसका अंतिम संस्कार किया. जब मैं पहुंचा तो उसे कैजुअल्टी वार्ड में ले जाया जा रहा था. जब उसे खबर मिली कि मैं पहुंच गया हूं तो उसने पल भर के लिए अपनी आंखें खोलीं और फिर हमेशा के लिए बंद कर लीं."

First published: 2 June 2016, 7:30 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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