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सियासत को मंजूर न था वरना हाशिम अंसारी का फैसला 2010 में आ चुका था

अतुल चौरसिया | Updated on: 20 July 2016, 19:22 IST
(कैच न्यूज)

24 सितंबर 2010 को अयोध्या में पत्रकारों का बड़ा मेला लगा हुआ था. इस दिन लगभग साठ साल से चल रहे बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद पर इलहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का फैसला आना था. दोपहर करीब एक बजे इस लेख का लेखक फैजाबाद से अयोध्या के रास्ते में दाहिने तरफ को जाने वाली एक संकरी सी गली के मकान में मौजूद था. सामने दम पर दम बीड़ियां फूंक रहे नब्बे साल से ऊपर के बुजुर्ग बार-बार तिरपठिया- तिरपठिया कहते हुए अवधी में किसी को कोस रहे थे.

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नब्बे साल के ये बुजुर्ग हाशिम अंसारी थे जो मंदिर-मस्जिद विवाद के सबसे पुराने मुद्दई थे. सारी कहानी कुछ यूं शुरू हुई थी कि 24 सितंबर को हाईकोर्ट का फैसला आने से ठीक पहले रमेश चंद्र त्रिपाठी नाम के एक पूर्व नौकरशाह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाईकोर्ट के फैसले को टालने की मांग की थी.त्रिपाठी की तरफ से इस याचिका पर बहस वर्तमान एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी कर रहे थे. इसी याचिका के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को 24 सितंबर को फैसले की घोषणा करने से रोक दिया था. इस बात से अंसारी बुरी तरह भन्नाए हुए थे. हमें वहीं पता चला कि फैसला आज नहीं आने वाला है.

फैसले के आने से देश में दंगे भड़क सकते हैं

त्रिपाठी की याचिका किसी तथ्य पर आधारित न होकर छिपे हुए मकसद पर सवार थी जिसमें कहा गया था कि इस फैसले के आने से देश में दंगे भड़क सकते हैं लिहाजा फैसला रोक दिया जाना चाहिए. साठ साल से मामले में मुस्लिम पक्ष की पैरवी कर हाशिम अंसारी के लिए यह इंतजार गैरजरूरी और असहनीय था.

अब रमेशचंद्र त्रिपाठी की खोज शुरू हो गई. उनके बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं थी. बस इतना था कि वे इस मामले में 17वें नंबर के पक्षकार थे. एक और बात पता चली कि वो पड़ोसी अंबेडकरनगर जिले के रहने वाले हैं. दोपहर से शाम और शाम से रात हो गई. इस बीच त्रिपाठी और उनके कांग्रेस कनेक्शन से जुड़ी खूब सारी अफवाहें सुनने को मिलीं, मसलन वो कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहे हैं, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और अखिलेश दास इस पूरे प्रकरण के पीछे हैं आदि-आदि.

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अचानक से रात में दस बजे किस्मत ने पलटी खाई. अयोध्या में तैनात पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत के दौरान उन्होंने चिट पर एक नंबर पकड़ाया. इस नंबर पर सीधे रमेश चंद्र त्रिपाठी से बात हो गई. यह जैकपॉट लगने जैसा था. जिस त्रिपाठी को देश भर का मीडिया खोज रहा था वह सीधे हमसे फोन पर बात कर रहा था. हालांकि उस बातचीत में त्रिपाठी कुछ खास बताने को तैयार नहीं हुआ लेकिन उसने इतना जरूर कबूल किया कि उनकी कुछ दिन पहले लखनऊ में दिग्विजय सिंह से मुलाकात हुई थी. उस समय दिग्विजय सिंह कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिवों में शुमार थे और उत्तर प्रदेश के प्रभारी भी हुआ करते थे.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस फैसले को टालने के कुछ दूरगामी नतीजे थे. उन नतीजों को देखकर ही अंसारी त्रिपाठी पर भन्नाए हुए थे. इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में तीन सदस्यों की बेंच कर रही थी जिसमें से एक जज डीवी शर्मा एक अक्टूबर, 2010 यानी फैसले के ठीक एक हफ्ते बाद ही रिटायर होने वाले थे. फैसला सुनाए बिना उनके रिटायर होने की सूरत में एक बार फिर से नई बेंच का गठन करना पड़ता और नई बेंच एक बार फिर नए सिरे से पूरे मामले की सुनवाई करती. लिहाजा यह इंतजार अंतहीन खिंच सकता था.

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यह बात जाहिर थी कि फैसला आने के अंतिम क्षण में इस याचिका का मकसद असल में फैसले को लटकाना और साथ में विवाद को खींचना था. इसमें कांग्रेसी नेताओं की भूमिका सामने आने से बात और जटिल हो गई थी. बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को जजमेंट रोकने के फैसले को वापस लेते हुए 30 सितंबर को निर्णय सुनाने का आदेश दिया और रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका खारिज कर दी.

फैसला अंतिम होगा और सबको मान्य होगा

अपने दो कमरों के घर में बैठे हाशिम अंसारी ने हमें बताया कि यह फैसला अंतिम होगा और सबको मान्य होगा. इसके बाद वो ऊपरी अदालत में इसे लेकर नहीं जाएंगे. लेकिन अंसारी के ऊपर धर्मों की सियासत भारी पड़ गई. लगभग हाईकोर्ट का फैसला आने के साथ-साथ ही मामले में पक्षकार चारो दावेदारों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, रामजन्मभूमि न्यास और दिवंगत गोपाल सिंह विशारद ने घोषणा कर दी कि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे.

एक वक्त तो हाशिम अंसारी और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे ही आपस में टकरा गए. अयोध्या में हाशिम अंसारी ने हमसे जो कुछ कहा था उसके ठीक विपरीत बात लखनऊ में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्य जफरयाब जिलानी कह रहे थे. भगवा ब्रिगेड तो खैर पहले से ही 'एक-एक इंच' जमीन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर जाने की घोषणा कर चुका था.

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हाशिम अंसारी, इस मामले के सबसे पुराने पैरोकार ताकते रह गए और बाद में इससे जुड़े राजनैतिक पक्ष बयानबाजी की धार तेज करने लगे. मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है. किसी ने अंसारी के उन वादों की एक न सुनी जिसमें उन्होंने कहा था, 'अब बहुत लड़ाई हो चुकी. हाईकोर्ट का फैसला अंतिम होगा. आगे कोई लड़ाई नहीं होगी. मुल्क का अमन चैन जरूरी है.'

अयोध्या से खबर है कि 96 साल के अंसारी का अंतिम संस्कार आज शाम ही अयोध्या में कर दिया जाएगा. वही अंसारी, जिनकी चलती तो अयोध्या विवाद का अंत 2010 में ही हो गया होता. लेकिन जीते जी अयोध्या का हल देखना उनकी किस्मत में नहीं था. हाशिम अंसारी 60 सालों से बाबरी मस्जिद के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे. उन्होंने सन 1949 में बाबरी मस्जिद की पैरोकारी शुरू की थी.

दो सदियों में फैली जिंदगी का सफरनामा

1921 में जन्मे हाशिम अंसारी ने ही 1949 में मस्जिद के भीतर मूर्तियां रखे जाने के बाद मुकदमा दर्ज करवाया था. हाशिम अंसारी का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है. वे सिर्फ ग्यारह साल के थे जब 1932 में उनके पिता की मृत्यु हो गई थी.

हाशिम अंसारी की दुनियाभर में पहचान का सबसे बड़ा आधार यही है कि वो राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के पक्षकार थे. वरना साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि और आर्थिक स्थिति वाले हाशिम अंसारी को शायद इतनी शोहरत नहीं मिलती. महज दूसरी कक्षा तक पढ़े अंसारी ने रोजी-रोटी के लिए दर्जी का कम सीखा था. उनकी शादी फैजाबाद शहर में ही हुई थी. अपने पीछे वो एक बेटा और एक बेटी छोड़ गए हैं.

लोगों से बातचीत में वो अक्सर अयोध्या विवाद से जुड़ी कहानियां सुनाते थे. उन्हें 1934 में अयोध्या में हुआ बलवा भी याद था. उस साल हिंदू वैरागी संन्यासियों ने बाबरी मस्जिद पर हमला बोल दिया था. अंसारी के मुताबिक ब्रिटिश हुकूमत ने सामूहिक जुर्माना लगाकर मस्जिद की मरम्मत कराई थी और जो लोग मारे गए उनके परिवारों को मुआवज़ा दिया था.

1949 में विवादित मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखी गई तो एक बार फिर से अयोध्या और फैजाबाद का माहौल बिगड़ गया था. उस समय प्रशासन ने शांति व्यवस्था के लिए जिन लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें हाशिम अंसारी भी शामिल थे.

वे बाबरी मस्जिद विवाद में पैरोकार कैसे बने इसकी कहानी भी दिलचस्प है. अयोध्या में नाममात्र की मुस्लिम आबादी थी. हां फैजाबाद में जरूर मुसलमान ठीकठाक संख्या में थे. हाशिम बताते थे कि उनका सभी लोगों के साथ सामाजिक मेलजोल था. जब यह बात आई कि मस्जिद में मूर्ति रख दी गई है और इसका विरोध होना चाहिए. तो लोगों ने उनसे मुकदमा करने के लिए कहा. इसकी एक वजह यह भी थी कि उनका घर उन कुछेक मुसलिम परिवारों में था जो विवादित परिसर के आस पास ही रहता था और कभी कभार मस्जिद में नमाज पढ़ने जाता था. लिहाजा उन्होंने पहली रपट दर्ज कराई और बाबरी मस्जिद विवाद में पैरोकार बन गए.

बाद में 1961 में सुन्नी वक्फ़ बोर्ड मुस्लिमों की तरफ से इस मामले को देखने लगा. लेकिन उसने हाशिम अंसारी को इसमें मुख्य मुद्दई बनाए रखा. थाने में नामजदगी के कारण पुलिस ने 1975 के आपातकाल में उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और आठ महीने तक बरेली सेंट्रल जेल में रखा था.

छह दिसंबर, 1992 के बलवे में कारसेवा करने आए लोगों ने अयोध्या में जमकर दंगा फसाद किया जिसमें अंसारी का घर भी फूंक दिया था. लेकिन अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को दंगाईयों की भीड़ से बचाया. इस घटना के बाद हामिद अंसारी को सरकार की तरफ से जो कुछ मुआवज़ा मिला उससे उन्होंने अपने छोटे से घर को दोबारा बनवाया. हाशिम का कहना था कि वो फ़ैसले का भी इंतज़ार कर रहे हैं और मौत का भी, लेकिन वो चाहते हैं कि मौत से पहले फैसला देख लें. लेकिन सियासत को ये मंजूर नहीं था वरना अंसारी के लिए यह मामला 2010 में ही खत्म हो चुका था.

(यूपी पत्रिका डॉट कॉम के सहयोग के साथ)

First published: 20 July 2016, 19:22 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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