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सिंधु का पानी, पाकिस्तान को नानी याद दिला सकता है, लेकिन भारत पर इसके संभावित नतीजे भी जान लें

सादिक़ नक़वी | Updated on: 27 September 2016, 13:49 IST

सिंधु नदी का जल पाकिस्तान को बर्बाद करने के लिए एक कारगर हथियार साबित हो सकता है. सरकार से जुड़े रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों के एक वर्ग मानता है कि भारत को 1960 की सिंधु जल संधि पर फिर से विचार करना चाहिए.

इससे पड़ोसी देश को एक कड़ा संदेश दिया जा सकता है. उरी में सैन्य कर्मियों पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के बाद भारत कूटनीतिक कदम उठाते हुए सिंधु जल समझौते से दूरी बनाने के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है. भारत पाकिस्तान को धमकी भी दे सकता है कि वह आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करे अन्यथा यह संधि तोड़ दी जाएगी.

सवाल यह है कि क्या भारत का सत्ता प्रतिष्ठान भी सिंधु जल समझौते पर फिर से विचार करने के विकल्प पर विचार कर रहा है. कल प्रधानमंत्री ने बयान देकर स्पष्ट कर दिया कि भारत इस विकल्प पर गंभीरता से सोच रहा है. नरेंद्र मोदी ने कहा- 'पानी और रक्त साथ-साथ नहीं बस सकते'.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि यह पड़ोसी देश को चारों ओर से घेरने का समय है. किसी भी समझौते में दो देशों के बीच संधि काम करती रहे, इसके लिए आपसी भरोसा और एक दूसरे का सहयोग का करना जरूरी है. यह एकतरफा जारी नहीं रह सकती.

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवन्त सिन्हा ने हाल ही में लिखे एक लेख में भारत सरकार को सलाह दी है कि तुरन्त प्रभाव से यह संधि तोड़ दी जानी चाहिए. सेना पर हमले के बाद कूटनीतिक बहसों में इजाफा हुआ है.

राजनयिक समुदाय हाईब्रिड रिस्पॉन्स देने की वकालत कर रहा है तो अन्य लोग दूसरे कदमों की हिमायत कर रहे हैं. इनमें पाकिस्तान के नई दिल्ली स्थित राजनयिक मिशन के स्टाफ में कटौती तथा डूरन्ड रेखा (अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा) को मान्यता देने से दूरी बनाए रखने जैसे विकल्प शामिल हैं.

इस बात के भी संकेत हैं कि भारत सार्क संबंधी आयोजनों में अपनी भागीदारी को भी प्रभावी तरीके से कम करने पर विचार कर रहा है. इसका उदाहरण है कि हाल के मंत्री स्तरीय एक आयोजन में वित्त मंत्रालय से एक ब्यूरोक्रेट को पाकिस्तान भेजा गया जबकि इसमें अरुण जेटली को भाग लेना था.

भारत कैसे पाकिस्तान को घेर सकता है?

संधि को एकतरफा नकारना आसान विकल्प नहीं है. तथ्य यह है कि नदी के प्रवाह को रोकना आसान काम नहीं है. किसी भी देश को दिन-रात इस पर काम करना होता है. समय-सीमा के भीतर ढेर सारे बांध और नहरें बनानी होंगी, यह काम इतना आसान नहीं है.

एक कूनीतिज्ञ के अनुसार भारत इस संधि से दूरी बनाए रखने वाली नीति का पालन कर सकता है. इसके लिए आवश्यक होगा कि सिंधु जल आयोग से भारतीय आयुक्त को वापस बुलाया जाए, नॉन फंक्शनल कामों को छोड़ दिया जाए और अनुच्छेद 11 के तहत डिस्प्यूट सेटलमेन्ट मैकेनिज्म में भागीदारी को स्थगित कर दिया जाए. साथ ही यह भी संकेत दिया जाय कि उसका डाटा उपलब्ध कराना जारी है और वह समय सीमा के लिए अन्य इकरारनामों से बंधा हुआ है.

उल्लेखनीय है कि सिंधु जल संधि को दो देशों के बीच जल विवाद पर एक सफल अंतरराष्ट्रीय उदाहरण बताया जाता है. 56 साल पहले भारत और पाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. हजारों अवरोधों, विरोध के बाद भी यह संधि कायम है, इस पर कोई असर नहीं पड़ा है.

कश्मीरियों पर भरोसा बढ़ाना

विशेषज्ञों के अनुसार इस कदम से न केवल पाकिस्तानी प्रतिष्ठान को कमजोर किया जा सकेगा बल्कि जम्मू-कश्मीर को लोगों तक भी सकारात्मक संदेश पहुंचेगा. हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद से इस राज्य में अशांति बनी हुई है.

वानी के मारे जाने के बाद से, विशेषकर इस्लामिक अलगाववादी, इस संकट को उकसाने के लिए मोर्चे पर आ डटे हैं. और इसी का परिणाम है कि घाटी में तीन माह से हड़ताल-बंद चल रहा है.

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि भारत संधि से वापस हटने का विचार कर रहा है, यह असम्भव है. उन्होंने ट्वीटर पर लिखा- 'यह बहुत ही अप्रिय और नकारात्मक विचार है, इस पर आगे नहीं बढ़ना चाहिए.'

जम्मू-कश्मीर ने लम्बे समय से कापी कुछ झेला है लेकिन किसी सरकार ने इसे खत्म करने का विचार नहीं किया. उन्होंने यह भी रेखांकित किया है कि किस तरह से यह संधि चार युद्ध होने तथा जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद भी अस्तित्व में बनी हुई है.

इस संधि के तहत, पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब नदी पर विशेष अधिकार है. तीनों नदियां कश्मीर से होकर बहती हैं. वर्ष 2002 में विधानसभा ने इस संधि को खत्म करने वाला एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया था.

यह मुद्दा नियमित रूप से जम्मू-कश्मीर विधानसभा में उठता रहा है. यदि सरकार सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर योजना के अनुसार अपना रुख कड़ा करती है तो इससे कश्मीरियों पर विश्वास बहाली के मापदंड बनाने में मदद मिलेगी और यह पाक समर्थित अलगाववादियों पर भी गहरा असर पड़ेगा.

इस रास्ते पर कैसे चला जाए

यह समझा जाता है कि सरकार बगलिहार और किशनगंगा परियोजनाओं के क्रियान्वयन के रूप में एक विकल्प पर विचार कर रही है. पाकिस्तान 2011 में, 864 मिलियन डॉलर वाली किशनगंगा परियोजना पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट की पंचाट में गया था. उसका दावा था कि इस निर्माण से इसी नदी पर बनने वाली उसकी खुद की हाइड्रो पावर परियोजना (जिसे नीलम कहा जाता है) पर असर होगा. लेकिन वह 2013 में यह केस हार गया.

इसी तरह से बगलिहार परियोजना विवाद को पाकिस्तान ने तटस्थ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सामने उठाया लेकिन यह मामला भी वर्ष 2007 में भारत के पक्ष में गया. भारत, इसके अलावा तुलबुल परियोजना पर काम बहाली की घोषणा कर सकता है.

वूलर झील के मुहाने पर बैराज बनाने की योजना थी, उत्तरी कश्मीर के बांदीपुर जिले में स्थित वूलर झील को एशिया की सबसे बड़ी ताजा पानी वाली झील माना जाता है. पाकिस्तान द्वारा आपत्ति उठाए जाने के बाद इस परियोजना को 1987 में स्थगित कर दिया गया था. परियोजना के तहत विचार था कि सर्दियों के दौरान बारामूला तक नदियों को सबसे बड़ी झील के ताजे पानी से भरा जा सकेगा. सूखे में भी 4.5 फीट जलस्तर बना रहेगा तथा अनंतनाग से श्रीनगर और बारामूला तक नेवीगेशन को भी सुनिश्चित किया जा सकेगा.

अन्य उपाय

जैसा कि, ऊपर कहा जा चुका है कि विशेषज्ञों ने सरकार को सलाह दी है कि वह नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी राजनयिक मिशन के स्टाफ में कटौती पर विचार करे. हालांकि ऐसा कदम पाकिस्तान भी इस्लामाबाद स्थित भारतीय मिशन में काम करने वाले राजनयिकों के खिलाफ उठाएगा.

हाई कमिश्नर को वापस बुलाना कार्ड पर नहीं है. हालांकि, यह एक बहुत पुराना सुझाव है जिस पर पहले काफी विचार-विमर्श किया जा चुका है.

दूसरी तरफ अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी की अगुवाई वाली अफगान सरकार के साथ भारत के रिश्ते पहले से कहीं बहुत बेहतर और उच्च शिखर पर हैं. अफगानिस्तान के पाक सरकार के साथ कड़वे रिश्ते दिख रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफगानिस्तान के उप राष्ट्रपति सरवार दानिश ने आतंक को दूसरे देशों में भेजने के लिए पाकिस्तान की कड़ी खिंचाई की है.

पाकिस्तान के खिलाफ अपने आक्रामक तेवर को बनाए रखने की दिशा में भारत डूरन्ड रेखा को मान्यता देने से इनकार कर सकता है. इससे भी पाकिस्तान पर दाग लगेगा जबकि अफगानिस्तान इसका स्वागत करेगा.

First published: 27 September 2016, 13:49 IST
 
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