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'परमाणु ऊर्जा के लिए भारत की बेचैनी ज्यादा चिंताजनक है'

कुमार सुंदरम | Updated on: 12 December 2015, 18:50 IST
QUICK PILL
  • भारत-जापान नाभिकीय सौदे से फ्रांसीसी नाभिकीय कंपनी अरेवा की महाराष्ट्र के जैतापुर स्थित परियोजना को गति मिलेगी.  
  • लेकिन इस नाभिकीय पार्क से 40 हजार लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी साथ ही पारिस्थितिकी को भी नुकसान पहुंचेगा.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे 11 दिसंबर को भारत आए. उनकी भारत यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि वे अपने साथ बुलेट ट्रेन, विमान और सबसे जरूरी नाभिकीय ऊर्जा के सौदे की सौगात लेकर आए हैं. 

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हमें वाकई नाभिकीय ऊर्जा की जरूरत है? शायद या फिर बिल्कुल नहीं. आइए जानते हैं इसके प्रमुख कारण.

इस यात्रा के दौरान ही प्रस्तावित भारत-जापान नाभिकीय समझौते पर हस्ताक्षर होने हैं. इस द्विपक्षीय सौदे से ज्यादा महत्वपूर्ण बात है कि यह अमेरिकी और फ्रांसीसी नाभिकीय गुटों के हित पूरा करने का एक साधन है.

इस सौदे से बड़ी फ्रांसीसी नाभिकीय कंपनी अरेवा की जैतापुर, महाराष्ट्र की परियोजना को गति मिलेगी. यह गुजरात के मिठी वर्डी और आंध्र प्रदेश के कोवाडा में अमेरिकी नाभिकीय परियोजनाओं तक महत्वपूर्ण उपकरणों की आपूर्ति के लिए भी काफी निर्णायक साबित होगा. 

लेकिन इसके केवल यही सबसे हानिकारक पहलू नहीं हैं. 

पारिस्थितिकी आपदा का नुस्खा

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भारत के विकास के लिए दिल्ली और टोक्यो दोनों ही इस सौदे के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं. जबकि हकीकत यह है कि इस सौदे से हमारे कुछ प्राचीन प्राकृतिक दृश्य, जैव विविधता के आकर्षण केंद्र, समृद्ध कृषि भूमि और सामुदायिक संस्कृतियों का विनाश होने की संभावना बढ़ जाएगी. 

हम यह कैसे कह सकते हैं? दरअसल, नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों को ठंडा रखने (कूलेंट) के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है. सामान्य तौर पर यह प्रमुख राजमार्गों के पास स्थित होने के साथ ही बड़ी आबादी वाले क्षेत्रों से ज्यादा दूर नहीं होते. और दुनिया भर में ऐसी जगहों पर आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध समुदाय होते हैं. 

उदाहरण के लिए जैतापुर को ही लेते हैं. यह बहुत ही खूबसूरत कोंकण इलाके में पड़ता है. इसके हरे-भरे पहाड़ जादुई खूबसूरती समेटे हैं. जहां झीलें और भरपूर हरियाली के साथ ही एक ओर विशाल खुला समुद्र है. एनपीसीआईएल ने इस क्षेत्र की तकरीबन 65 फीसदी जमीन को बंजर घोषित कर दिया है. जो स्थानीय लोगों को काफी अपमानजनक लगता है. 

कोंकण दुनिया के 10 "बेहतरीन जैव विविधता वाले आकर्षण केंद्रों" में शामिल है. यह क्षेत्र फूलों वाले पौधों की 5000 से ज्यादा प्रजातियों के साथ ही 139 स्तनधारियों, 508 पक्षियों और 179 उभयचरों को समेटे हुए हैं. जिनमें 325 प्रजातियों पर दुनियाभर में विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है. 

यह क्षेत्र अपने बाशिंदो को बेहतरीन और समृद्ध जीवन प्रदान करता है. कुल मिलाकर यह नाभिकीय पार्क 40 हजार लोगों की आजीविका को खतरे में डाल देगा. 

एनपीसीआईएल ने इस क्षेत्र की करीब 65 फीसदी जमीन को बंजर घोषित किया है. स्थानीय लोगों को ये काफी अपमानजनक लगा.

जैतापुर स्थित मछुआरों के गांवों का सालाना कारोबार करीब 15 करोड़ रुपये का है. नाटे में ही 200 बड़े मछली पकड़ने वाले जहाज और 250 छोटी नाव हैं. करीब 6000 लोग मछली पकड़ने पर सीधे निर्भर हैं और 10 हजार से ज्यादा लोग इसकी सहायक गतिविधियों पर निर्भर हैं.

इस समुदाय में यह चिंता बढ़ती जा रही है कि अगर एक बार यह परियोजना शुरू हो जाती है, तो इसके चारों ओर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम कर दिए जाएंगे. जिससे जैतापुर और विजयदुर्ग की दो खाड़ियों में मछुआरों के जाने पर रोक लग जाएगी. 

यहां बनने वाला नाभिकीय संयंत्र अरब सागर में रोजाना 5200 करोड़ लीटर गर्म पानी छोड़ेगा जिससे इस समुद्र की मछिलयों की आबादी भी प्रभावित होगी.

जैतापुर की भूमि अत्यधिक उपजाऊ है. यहां चावल और अन्य अनाज के अलावा यकीनन दुनिया का सबसे मशहूर आम अलफांसो पैदा होता है. इसके अलावा इस क्षेत्र में काजू, नारियल, कोकुम (रताम्बी), सुपारी, अनानास और अन्य फल भी बहुतायत में पाए जाते हैं. 

मवेशी चराने और वर्षा सिंचित कृषि के लिए भी इस भूमि का काफी इस्तेमाल किया जाता है. 

(परमाणु) टाइम बम शुरू

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जैतापुर में सुरक्षा चिंताएं बेबुनियाद नहीं हैं. फुकुशिमा आपदा के बाद दिवालियापन की कगार पर पहुंच चुकी अरेवा कंपनी, जैतापुर में छह यूरोपीय प्रेशराइज्ड रिएक्टर (ईपीआर) का निर्माण कर रही है. 

नाभिकीय संयंत्र अरब सागर में रोजाना 5200 करोड़ लीटर गर्म पानी छोड़ेगा जिससे समुद्र की मछलियां प्रभावित होगी

विडंबना यह है कि अप्रैल में मोदी की फ्रांस यात्रा से पहले जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि यह ईपीआर जांच के दायरे में हैं. फ्रांसीसी नाभिकीय नियामक द्वारा इसकी डिजाइन में महत्वपूर्ण खामियां बताई गईं हैं.

बढ़ती लागत और परियोजना में विलंब के बाद इस साल फिनलैंड ने ऑल्किलुओटो में 4 परियोजना के लिए अपना ऑर्डर रद्द कर दिया. 

कोवाडा और मिठी वर्डी की भी कहानी ऐसी ही है. जहां हजारों ग्रामीणों की सुरक्षा और आजीविका पर इन प्रस्तावित नाभिकीय संयत्रों की वजह से खतरा मंडरा रहा है. 

हर व्यक्ति के साथ ही शिंजो को भी इन खतरों के बारे में पता होना चाहिए. 

फुकुशिमा को न भूलें शिंजो अबे

शिंजो अबे के ही देश में उनकी ही निगरानी के बावजूद फुकुशिमा संकट गहराता ही जा रहा है. वहां के राष्ट्रीय प्रसारक एनएचके के मुताबिक, फुकुशिमा डायची परमाणु संयंत्र चलाने वाली टोक्यो इलेक्ट्रिक कंपनी ने 4,000 गुना अधिक विकिरण का पता लगाया है.

वह भी इसके बावजूद जब दो साल पहले शिंजो अबे ने घोषणा की थी कि फुकुशिमा 'नियंत्रण में' है. 

कल ही मैनिची ने रिपोर्ट दी कि दुर्घटना के 4 साल और 9 महीने बाद, अत्यधिक दूषित रेडियोधर्मी कचरे के 90 लाख से ज्यादा बैग फुकुशिमा के 1,14,700 अंतरिम भंडारण स्थलों पर फैले हुए हैं और इनके निपटान की कोई योजना नहीं दिखाई देती.

बेकार रिएक्टरों को नियंत्रित करने, पिघले हुए कोरों (मॉल्टेन कोर्स) को ठंडा रखने के लिए रोजाना पंप किए जाने वाले 100 टन दूषित पानी के प्रबंधन के अलावा भी अबे की सत्ता पुनर्वास के मुद्दे पर संघर्ष कर रही है. 

विकिरण (रेडिएशन) जनित रोगों के लगातार डर और सामाजिक बहिष्कार के बीच अपने परिजनों से बिछड़े कम से कम दो लाख लोग बिखरे जीवन के साथ अस्थायी बस्तियों में रह रहे हैं. 

वैसे नाभिकीय संयंत्रों के प्रमोटरों द्वारा संभावित हादसों को कार दुर्घटनाओं के समान ही पेश किया जाता है. लेकिन हकीकत इसके विपरीत है क्योंकि औद्योगिक या प्राकृतिक दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों की संख्या के मामले में रेडियोधर्मी दुर्घटनाएं काफी ज्यादा विकराल होती हैं.

आम तौर पर ज्यादातर औद्योगिक या प्राकृतिक दुर्घटनाओं में राहत और पुनर्निर्माण अगले दिन से शुरू किए जा सकते हैं. लेकिन एक नाभिकीय दुर्घटना के मामले में बेहद जहरीला विकिरण (रेडिएशन) दशकों के लिए राहत-पुनर्निर्माण को असंभव बना देता है. अप्रैल में पहली बार फुकुशिमा रिएक्टर के कोर के अंदर एक रोबोट को पिघले हुए ईंधन के आकलन के लिए भेजा गया था. और यह विकिरण इतना ज्यादा था कि यह रोबोट 3 घंटे के भीतर ही 'मर गया.'

मसलन, चेर्नोबिल में दुर्घटना के 30 साल बाद तक आपदा स्थल के चारों ओर का 20 किलोमीटर क्षेत्र निर्जन या लोगों के न रहने लायक हो गया था. फुकुशिमा में भी इस तरह के कई वीरान कस्बे जैसे नैमी, फुताबा और मिनामी सोमा मौजूद हैं. 

जहां इस हादसे के बाद से जापानी संसद के सामने हर शुक्रवार शाम सैकड़ों लोग प्रदर्शन करते आ रहे हैं. वहीं, इस गंभीर स्थिति के विरोध में हजारों लोगों ने टोक्यो की गलियों में प्रदर्शन किया. 

यह विकिरण इतना ज्यादा था कि यह रोबोट 3 घंटे के भीतर ही "मर गया"

फिर भी, शिंजो भारत को नाभिकीय तकनीक बेचना चाहते है. वह भी तब जब यह पागलपन की हद तक महंगा सौदा साबित हो सकता है. भारत नाभिकीय ऊर्जा के जिस तरह पीछे पड़ा है वो इससे भी ज्यादा चिंताजनक है. 

रईसों के सपने का भुगतान

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आयातित रिएक्टरों से पैदा होने वाली बिजली की कीमत बहुत अधिक होगी. ब्रिटेन में ईपीआर की लागत देखते हुए, प्रत्येक भारतीय रिएक्टर के लिए 60,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं. वास्तव में जैतापुर के पहले चरण की लागत ही अकेले विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर कुल व्यय के बराबर बैठेगी. 

फुकुशिमा हादसे के बाद भारत परमाणु विस्तार करने वाले मुट्ठी भर देशों में से एक है. 2008 में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की बैठक से पहले, भारत ने अपने प्रमुख सदस्य देशों से विशाल नाभिकीय खरीद की पेशकश की थी.

अनिवार्य रूप से रईसों की महाशक्ति हासिल करने के सपने यानी भारत की नाभिकीय परियोजनाओं की कीमत का भुगतान यहां के ग्रामीणों द्वारा किया जा रहा है. भारत के परमाणु प्रतिष्ठान वो समूह हैं जो 2005 में अमेरिका के साथ परमाणु करार से हैरान हो गए थे. इसके बाद ही भारत के लिए परमाणु ऊर्जा की अनिवार्यता को युक्तिसंगत बनाने के औचित्य की बात हुई.

भारत में असुरक्षित नाभिकीय ऊर्जा बहुत ज्यादा जोखिम भरी हो जाती है, क्योंकि भारत के नाभिकीय क्षेत्र पूर्णत: गैरपारदर्शी हैं जो स्वतंत्र जांच और नियमन के लिए आसानी से राजी नहीं होते. 

फुकुशिमा हादसे के बाद शायद भारत ही एकमात्र देश है जिसने कमजोर परमाणु नियामक के लिए प्रस्ताव रखा है. सरकार पहले से ही कमजोर कानूनी प्रावधानों को दूर करने के साथ ही नाभिकीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ संभावित दुर्घटनाओं को आमंत्रित करने के हरसंभव प्रयास में जुटी है.  

आश्चर्य की बात नहीं है कि शिंजो अबे की भारत यात्रा के दौरान जैतापुर में ग्रामीणों द्वारा विरोध किया जाएगा. जिसमें बाहर से भी बहुत सारे लोग शामिल होंगे. यह वे सब लोग होंगे जिन्हें इस देश की परवाह है.

First published: 12 December 2015, 18:50 IST
 
कुमार सुंदरम @pksundaram

The author is a researcher with the Coalition for Nuclear Disarmament and Peace.

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