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प्रभाकर केलकर: नोटबंदी से किसानों को कोई फ़ायदा नहीं

श्रिया मोहन | Updated on: 22 November 2016, 7:33 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • सड़क से संसद तक नोटबंदी पर मोदी सरकार हमले झेल रही थी लेकिन अब बग़ावत के सुर भीतर से उठना शुरू हो गए हैं. 
  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित भारतीय किसान संघ के महासचिव प्रभाकर केलकर ने कहा है कि इस फ़ैसले से किसानों को कोई फ़ायदा नहीं है.

अफ़वाहें तेज़ हैं कि नोटबंदी के फ़ैसले ने थोड़ी नाराज़गी आरएसएस और बीजेपी के अंदर भी पैदा हो गई है. इस बीच आरएसएस समर्थित संगठन भारतीय किसान संघ के महासचिव प्रभाकर केलकर ने कैच न्यूज़ से खुलकर बात की है. उन्होंने बताया कि नोटबंदी का फ़ैसला ग्रामीण भारत के लिए किस तरह तकलीफ़देह है. यह भी कि कैसे नरेंद्र मोदी के इस 'मास्टर स्ट्रोक' में किसानों के लिए कुछ भी नहीं है. 

साक्षात्कार

आपका बयान आया है कि नोटबंदी किसानों के लिए पीड़ादायक है. बता सकते हैं कैसे?

मेरे बयान को गलत ढंग से पेश किया गया है. मेरा मानना है कि नोटबंदी से किसानों को नुकसान और फायदा दोनों बराबर होगा. कोई शक़ नहीं कि नोटबंदी का फ़ैसला उनके लिए मुश्किल भरा है. यह ऐसा मौसम है जब रबी की बुआई के लिए बीज-उर्वरक ख़रीदने और कुछ हिस्सों में खड़ी फ़सल बेचने के लिए नकद की ज़रूरत होती है.  

चिंताएं और भी हैं. फ़सल ख़रीदने की एवज में किसानों पर आढ़ती पुरानी नोट लेने का दबाव बना रहे हैं. ऐसे तरीक़े ढूंढने ही होंगे कि आढ़तियों पर नज़र रखी जा सके और वे निराश किसानों को भुगतान में गड़बड़ी फैलाकर उनका शोषण नहीं कर पाएं. उनतक यह संदेश साफ़ शब्दों में पहुंचना चाहिए कि किसानों को भुगतान नई करंसी में ही करें. 

सहकारी बैंकों का सवाल भी काफ़ी महत्वपूर्ण है. अमूमन किसानों के खाते सहकारी बैंकों में होते हैं मगर नोटबंदी का ऐलान होने के बाद से सहकारी बैंक ठप हो गए हैं. यहां ना रकम जमा की जा सकती है और ना ही पुरानी नोटों की अदला-बदली हो सकती है. कैश सिर्फ चेक से निकल सकता है. मजबूरी में किसानों को राष्ट्रीयकृत बैंकों में खाता खुलवाना पड़ रहा है. 

किसानों का शोषण काली कमाई को सफ़ेद करवाकर भी किया जा रहा है. केवाईसी के नियमों की वजह से किसान भ्रष्ट लोगों के जाल में फंसने को मजबूर हैं. दूसरी तरफ आयकर विभाग भी घात लगाए बैठा है. उन्हें इस बारे में स्पष्ट दिशानिर्देश मिलना चाहिए. 

किसान आमतौर पर अपनी बचत घरों में ही रखते हैं. पत्नियों से इतर सामुदायिक स्तर पर औरतें जीवनभर पर इस बचत को बचाने में लगा देती हैं. ऐसे भी मामले होते हैं जहां किसान अपने जीवन की सारी बचत कैश में अपने पास रखता है. ऐसे लोगों को आयकर विभाग की ज़द से बाहर रखा जाना चाहिए. भले ही उनकी रकम 2.5 लाख से ऊपर क्यों ना हो. गांवों में शादियां भी टालनी पड़ी हैं. ज़्यादातर शादियां फरवरी तक टाल दी गई हैं इस उम्मीद में कि तब तक हालात ठीक हो जाएंगे. 

बहरहाल, इन तमाम मुद्दों को अगर अलग कर दिया जाए तो ज़्यादातर इलाक़ों में किसान नोटबंदी के पक्ष में हैं. 

किसानों को नफ़ा-नुकसान बराबर कैसे है? ऊपर आपने नुकसान गिना दिए. अब फायदे भी बता दीजिए. 

नोटबंदी का फै़सला किसानों के हक़ में नहीं है. सच तो यही है कि इस फ़ैसले में उनके लिए कुछ भी नहीं है.

क्या नोटबंदी ने गावों में कर्ज़ लेने की व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है? क्या इसके बिना किसानों का काम चल सकता है?

संकट की इस घड़ी में बार्टर जैसी पुरानी व्यवस्था बहुत बड़ा सपोर्ट है. बेशक़ नोटबंदी ने गांवों में आपसी विश्वास और भरोसे को कमज़ोर किया है लेकिन बहुत सारे लोग अभी भी एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं. 

क्या इसका रबी की बुआई पर कोई असर होगा?

रबी की बुआई पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ेगा. किसान धीरे-धीरे अपने खेतों की तरफ़ लौटेंगे. उनके पास पुराने बीज हैं और थोड़ा बहुत वे उधार या कर्ज़ लेंगे. ज़्यादातर किसान भुगतान चेक से करेंगे और उन्हें उनकी ज़रूरत का सामान मिल जाएगा. मानसून अक्टूबर में ख़त्म हो गया है और चने भी अंकुरित होना शुरू हो गए हैं. 

मौसम अलग होने के नाते कई राज्यों में रबी की बुआई नहीं होती. वहां सिर्फ़ एक फ़सल की ही बुआई हो पाती है जबकि कुछ राज्यों में पानी की कमी के चलते बुआई नहीं होती, जैसे छत्तीसगढ़. कुछ राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलांगना वग़ैरह में संकट हो सकता है. 

क्या अनाज की किल्लत के नाते अगले साल खाने-पीने के सामान महंगे हो जाएंगे?

खाद्य पदार्थ तभी महंगे होते हैं, जब अनाज की पैदावार कम हो. मगर हमारे अनाज भंडारण हमेशा भरे रहते हैं. हालांकि, इस बार अनाज की पैदावार में थोड़ी कमी हो सकती है. अनुमान से एक या दो फ़ीसदी तक कम. मगर मुझे नहीं लगता कि खाने-पीने के सामानों के दाम बढ़ेंगे. 

अगर नोटबंदी की घोषणा कृषि चक्र को ध्यान में रखकर की गई होती तो क्या अच्छा होता?

बिल्कुल, अगर इसकी घोषणा रबी की बुआई के बाद होती तो किसानों को कम से कम नुकसान उठाना पड़ता. 

First published: 22 November 2016, 7:33 IST
 
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