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प्रकाश सिंह रिपोर्ट: प्रशासनिक नकारापन और जातीय ध्रुवीकरण ने हिंसा को हवा दी

राजीव खन्ना | Updated on: 2 June 2016, 23:21 IST
(फाइल फोटो)
QUICK PILL
  • समिति की रिपोर्ट में साफ तौर पर रेखांकित किया गया है कि फरवरी 2016 में 30 लोगों की जान लेने वाले यह जाट आरक्षण दंगे अभूतपूर्व थे.
  • इस रिपोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों की तरफ इशारा करते हुए साफ किया है कि उन्होंने के जातिगत पूर्वाग्रहों के चलते दंगाईयों के खिलाफ जानते-बूझते कार्रवाई नहीं की.
  • विपक्ष ने अब खुफिया पहलू रोशनी डालने वाले रिपोर्ट के दूसरे खंड को भी सार्वजनिक किए जाे की मांग की है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार रिपोर्ट को छिपा रही है.

हरियाणा में बीते दिनों शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिये हुए जाट आंदोलन के दौरान सरकारी तंत्र की चूकों और कृत्यों की जांच के लिये बनी प्रकाश सिंह समिति ने अपनी रिपोर्ट में राज्य के अधिकारियों की लापरवाही को लेकर तीखी टिप्पणियां की हैं.

रिपोर्ट सौंपे जाने के लगभग 20 दिन बाद हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने दबाव में आकर अंततः रिपोर्ट के पहले खंड को सार्वजनिक किया. विपक्ष ने अब खुफिया पहलू रोशनी डालने वाले रिपोर्ट के दूसरे खंड को भी सार्वजनिक किए जाे की मांग की है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार रिपोर्ट को छिपा रही है.

समिति की रिपोर्ट में साफ तौर पर रेखांकित किया गया है कि फरवरी 2016 में 30 लोगों की जान लेने वाले यह जाट आरक्षण दंगे अभूतपूर्व थे. साथ ही इन दंगों में करीब 20 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति भी तबाह हुई है. इन दंगों में करीब 1196 दुकानों को आग के हवाले करने के अलावा 371 वाहनों को या तो क्षतिग्रस्त या आग के हवाले कर दिया गया.

मनोहर लाल खट्टर सरकार ने दबाव में आकर अंततः रिपोर्ट के पहले खंड को सार्वजनिक किया है

30 स्कूलों और काॅलेजों के जला दिया गया, 75 घरों में आग लगाई गई, 53 होटलों और विवाह स्थलों को तबाह किया गया, 23 पेट्रोल पंपों पर हमला हुुआ और 15 धार्मिक स्थलों में तोड़फोड़ की गई. इसके अलावा आंदोलनकारियों ने सड़कें रोकने के लिये कुल मिलाकर 7232 पेड़ों को काट डाला. यहां तक कि पुलिस के प्रतिष्ठानों को भी नहीं बख्शा गया और 29 पुलिस थानों और चौकियों को आग के हवाले कर उनके हथियारों को लूट लिया गया.

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सरकारी कर्मचारियों पर उंगली उठाते हुए इस रिपोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों की तरफ इशारा करते हुए साफ किया है कि उन्होंने के जातिगत पूर्वाग्रहों के चलते दंगाईयों के खिलाफ जानते-बूझते कार्रवाई नहीं की. इसके अलावा समिति ने माना है कि उन्होंने उपद्रवियों का साथ देने के अलावा अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ा और उपद्रवियों को हिंसा के लिये उकसाया.

रिपोर्ट कहती है, ‘एसडीएम, डीएसपी, एसएचओ स्तर के अधिकारियों का पूर्वाग्रह बिल्कुल स्पष्ट है. इनमें से कई सकारात्मक भूमिका निभाते हुए उपलब्ध संसाधनों के बल पर गड़गड़ी को रोक सकते थे लेकिन इसके बजाय उन्होंने अपने सामने हो रही हिंसा को देखकर अपनी आंखें मूंद लीं. कई जिलाधिकारियों तक का इस वायरस से ग्रसित होना वास्तव में बहुत चिंताजनक है. प्रशासन इससे अधिक अयोग्य नहीं हो सकता था और पुलिस इससे और अधिक नकारा और लापरवाह नहीं हो सकती.’

सेना का उपयोग बड़े पैमाने पर करने को लेकर इस रिपोर्ट में अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, ‘यहां तक कि आंदोलनकारी सेना की मौजूदगी तक से झुकने को तैयार नहीं थे.’

समिति का यह मानना है कि हो सकता है कि ऐसा सेना के अधिक प्रयोग के कारण हुआ हो. इसके अलावा समिति का कहना है कि सेना को आंतरिक सुरक्षा के कामों में तभी प्रयुक्त किया जाना चाहिये जब संबंधित राज्य के गृह-विभाग से इस बारे में विस्तृत अनुरोध आए.

वर्तमान में राज्य में जाट एक तरफ हैं और बाकी 35 समुदाय दूसरी तरफ हैं: प्रकाश सिंह

प्रकाश सिंह ने हरियाणा के समाज में बढ़ते हुए ध्रुवीकरण को विस्तार से जिक्र करते हुए कहा है कि वर्तमान में राज्य में जाट एक तरफ हैं और बाकी 35 समुदाय दूसरी तरफ हैं. इसके अलावा उन्होंने जाटों के खिलाफ जहर उगलने के लिये कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद राजकुमार सैनी की तरफ भी इशारा किया है.

समिति ने इस आंदोनल के दौरान प्रशासनिक अर्कमण्यता के लिये शीर्ष स्तर के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है.

रिपोर्ट कहती है, ‘पुलिस महानिदेशक (वाईपी सिंघल) चंडीगढ़ में रहकर सिर्फ कुछ आदेश जारी करने तक ही सीमित रहे. उन्होंने न तो सामने आकर पुलिस प्रशासन का नेतृत्व किया और न ही मैदान में मौजूद अपने कर्मियों को प्रोत्साहित या प्रेरित करने की जहमत उठाई. गृह विभाग पूरी तरह से लचर था. अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) पीके दास पुलिस उपायुक्तों या पुलिस अधीक्षकों को जारी किए गए निर्देशों या आदेशों की एक भी प्रति प्रस्तुत करने में असफल रहे.’

हरियाणा जाट हिंसा में बीजेपी के लोग शामिल थे: बीजेपी सांसद

कहा जाता है कि जिस समय हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं प्रतिबंधित कर दी गई थीं उस समय दास व्हाट्सएप के जरिये निर्देश जारी कर रहे थे.

इसके अलावा रिपोर्ट में जिला स्तर पर बल का प्रयोग करने में झिझक को भी इंगित किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, ‘उस समय आम धारणा थी कि अगर बल-प्रयोग किया जाता है तो एक तो स्थिति के और अधिक बिगड़ने की संभावना थी और दूसरा हो सकता है कि भविष्य में राज्य सरकार उनकी इस कार्रवाई से पल्ला झाड़ ले और साथ न दे.’

समिति ने इसे एक विचार के साथ जोड़ा है, ‘इसके बावजूद सरकार के स्तर पर कोई भी वैध कार्रवाई न करना कानून-व्यवस्था बनाए रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी भूलने या निष्क्रियता के लिये बहाना नहीं माना जा सकता. जब उपद्रवी हिंसा पर उतारू हों, स्कूलों और काॅलेजों में आग लगा रहे हों, चुनिंदा लोगों के समूहों पर हमला कर रहे हों, दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को लूट रहे हों, ऐसे में कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिये जिम्मेदार अधिकारी ऊपरी आदेशों के इंतजार में हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता.

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता उसे तमाम अधिकार और शक्तियां प्रदान करती है और वह नैतिक और कानूनी तौर पर उनका पालन करने को बाध्य है.’

विपक्ष ने कार्रवाई नहीं करने के लिये खट्टर सरकार की आलोचना है

नागरिक प्रशासन और पुलिस तंत्र के बेहद खेदजनक रवैये को लेकर समिति का कहना है कि ऐसी स्थितियां सिर्फ सरकारी अधिकारियों के पूरी तरह से अक्षम या अर्कमण्य होने से नहीं आतीं. ऐसा कई दशकों के राजनीतिकरण और उसके नतीजतन स्थापित संस्थानों के होने वाले क्षरण के फलस्वरूप होता है.

समिति कहती है, ‘राज्य की नौकरशाही अपना जोश खो चुकी है. पुलिय यह भूल चुकी है कि वह राज्य का शक्तिशाली बाजू है जिससे राज्य के अधिकार को चुनौती देने के मामले में उचित बल का प्रयोग करने की उम्मीद की जाती है. कानून द्वारा विशेष शक्तियां और अधिकार मिले होने के बावजूद अधिकारी कार्रवाई के लिये अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह ताकते हैं. यह एक संस्थागत क्षय था जिसमें कोई आगे आने को तैयार नहीं था और अधिकारी अधिकतर समय अपने को बचाने में ही लगे रहे.’

इसके अलावा प्रकाश सिंह समिति ने मुरथल के निकट महिला यात्रियों के साथ हुए कथित सामूहिक बलात्कार के मुद्दे पर भी सरसरी निगाह डाली है. रिपोर्ट के पृष्ठ 141 पर संक्षेप में कहा गया है, ‘22 फरवरी को उपद्रवियों ने मुरथल के सुखदेव ढाबे पर खड़े कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया और बदहवास यात्रियों को परेशान किया. इसके अलावा उन्होंने कथित तौर पर कुछ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार भी किया.’

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राज्य सरकार के 22 फरवरी को मुरथल में किसी भी बलात्कार के न होने के दावे के बावजूद न्यायमित्र अनुपम मित्रा ने कथित तौर पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय को बताया है कि प्रकाश सिंह समिति की रिपोर्ट में इन कथित बलात्कार के मामलों का उल्लेख किया गया है.

उन्होंने कहा है कि मुरथल में एक ढाबा संचालक अमरीक सिंह ने उन्हें बताया कि उसने फटे हुए कपड़ों में कई महिलाओं को देखा था. हालांकि इस मसले पर सरकार की स्टेटस रिपोर्ट कुछ और ही कहती है. विशेष जांच दल (एसआईटी) प्रमुख ममता सिंह ने अदालत को सूचित किया है कि पुलिस ने ढाबा संचालक से विस्तृत पूछताछ की जो 6 घंटे की उस पूछताछ में टूट गया लेकिन उसने बलात्कार की किसी भी घटना से इंकार किया.

एक अधूरी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर कहते हैं, ‘यह सरकार के जनता की आंखों में धूल झोंकने की मंशा साफ करता है. हमने इस समिति का विरोध किया क्योंकि इसकी कोई कानूनी हैसियत नहीं थी लेकिन फिर भी हम यह सोचकर चुप रहे कि कम से कम इस बहाने जो कुछ भी हुआ उसकी कुछ तो सच्चाई सामने आएगी. लेकिन सरकार ने इस दौरान की विफलताओं की ओर नाम के साथ इशारा करते सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं वाले 31 पन्नों को रोककर पूरे प्रयास पर ही पानी फेर दिया है. हम चाहते हैं कि इस पूरे मामले की जांच उच्चतम न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश द्वारा की जाए.’

इंडियन नेशनल लोक दल (आईएनएलडी) नेता अभय चैटाला ने जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं के लिये राज्य सरकार को बराबर का जिम्मेदार बताते हुए कहते हैं कि जो कुछ भी हुआ सरकार को उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिये.

उन्होंने सरकार से रिपोर्ट के दूसरे भाग को सार्वजनिक करने की मांग करते हुए राज्य को ऐसी स्थिति में धकेलने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की भी मांग की है. इसके अलावा उन्होंने शीर्ष स्तर के अधिकारियों को अभयदान देते हुए मध्यम और निचले स्तर के कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिये भी खट्टर सरकार की आलोचना की. उन्होंने कहा, ‘अगर सरकार की मंशा रिपोर्ट के दूसरे खंड को सार्वजनिक करने की नहीं है तो फिर इसे तैयार करवाने का औचित्य ही क्या था.’

First published: 2 June 2016, 23:21 IST
 
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