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प्रशांत भूषण: सहारा-बिड़ला रिश्वत कांड में हम कोर्ट को नए कागज़ात पेश करेंगे

सादिक़ नक़वी | Updated on: 28 November 2016, 7:58 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अन्य नेताओं को रिश्वत दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है. 
  • वहीं सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि रिश्वत कांड में सुनवाई के पर्याप्त सबूत हैं और वह इस मामले में नए कागज़ात दोबारा पेश करेंगे.  

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आदित्य बिड़ला ग्रुप और सहारा के ऑफिसों में छापेमारी के दौरान मिले दस्तावेजों की जांच के आदेश देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा, न तो ये दस्तावेज आधिकारिक हैं और न ही इन पर भरोसा किया जा सकता है. इनमें से कुछ दस्तावेज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस की शीला दीक्षित सहित बहुत से दूसरे राजनेताओं को रुपए देने का ज़िक्र है.

न्यायाधीश जेएस शेखर और न्यायाधीश अरुण मिश्रा की दो सदस्यों वाली पीठ ने याचिकाकर्ता एनजीओ कॉमन कॉज को कहा कि किसी भी अप्रमाणित दस्तावेज़ के आधार पर जांच के आदेश देना घातक सिद्ध हो सकता है. जेएस शेखर भारत के अगले चीफ जस्टिस की दौड़ में शामिल हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा, ‘अगर हम आपकी बात मान लेते हैं तो कल को कोई भी आएगा और दावा करने लगेगा कि उसने प्रधानमंत्री को इतना पैसा भेजा है... और यह किस हद तक जा सकता है? हमें किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करने से कोई गुरेज नहीं है लेकिन आपके पास किसी भी तरह की गड़बड़ी के पक्ष में प्रथम दृष्टया ठोस आधार होना चाहिए. हम केवल इसलिए तो कार्रवाई नहीं कर सकते कि आपने किसी बड़े आदमी का नाम लिया है. याचिकाकर्ता ने इस संबंध में अतिरिक्त सबूत पेश करने के लिए कुछ समय मांगा है.

कॉमन कॉज एनजीओ के सदस्य और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कैच से बातचीत के दौरान कहा कि उनके पास ऐसे और भी दस्तावेज हैं, जो वे अगली सुनवाई के दौरान पेश करेंगे. साथ ही यह भी कहा कि कोर्ट में पहले से पेश किए जा चुके दस्तावेज़ भी जांच का आदेश देने के लिए पर्याप्त हैं.

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से सहारा और बिड़ला के ऑफिस से मिले कागज़ात की जांच के आदेश देने से पहले और सबूत मांगने पर आपका क्या कहना है?

मुझे नहीं लगता कि वे इन दस्तावेज़ों को पूरी तरह समझ पाए हैं, जो हम पहले ही पेश कर चुके हैं. चूंकि वे कह रहे हैं कि ऐसे तो कोई भी लिख सकता है, लेकिन वे इतने विश्वास के साथ ऐसा कैसे कह सकते हैं. उन्होंने कुछ और दस्तावेज़ भी देखे होंगे जो हमने साथ में नत्थी किए थे. इनमें बिड़ला मामले की समीक्षा रिपोर्ट भी शामिल है, जिसमें बताया गया कि इन दस्तावेजों को लिखने वाले लोगों से आयकर विभाग ने पूछताछ की थी और उन्होंने माना था कि उन्होंने ख़ुद यह भुगतान किया है. 

उन्होंने बताया कि उन्हें हवाला कारोबारियों से नकद में बड़ी राशि मिलती थी और वे अपने समूह के अध्यक्ष शुभेन्दु अमिताभ के निर्देश पर लोकसेवकों को कैश भेज देते थे. अमिताभ ने ख़ुद पूछताछ में स्वीकारा है कि एक दस्तावेज में जहां उन्होंने लिखा है कि 25 करोड़ गुजरात के मुख्यमंत्री को दिए, उनमें से बस 12 ही दिए गए थे, बाकी? यह सब जानकारी उनके कम्प्यूटर से ही जुटाई गई है.

हालांकि उन्होंने कहा, गुजरात सीएम का मतलब यहां गुजरात एल्कलीज़ और कैमिकल से है. जब उनसे पूछा गया कि सीएम का मतलब? तो वो ठीक से कुछ नहीं बता पाए. बस, इतना ही कहा, यह उनके निजी नोट थे. इस तरह कम से कम बिड़ला मामले में तो साफ़ है कि जिन्होंने पैसा दिया, उन्होंने माना भी है. अब तो इस मामले में फोन कॉल रिकॉर्ड वगैरह की जांच होना बाकी है.

क्या गुजरात एल्कैलिज एंड कैमिकल्स को वाकई पैसा दिया गया?, जैसा कि अमिताभ ने कहा और क्या इसके कोई सबूत हैं?

नहीं. इसकी कभी जांच नहीं की गई और इसीलिए इसकी जांच की जरूरत है.

सहारा के कागज़ात के बारे में आपका क्या कहना है?

सहारा के दस्तावेज़ों में कुछ हाथ से लिखे गए थे तो कुछ कम्प्यूटर से प्रिंट किए हुए हैं. जब ये कागज़ात पकड़े गए तो इन पर आयकर अधिकारी, सहारा के एक अधिकारी और दो गवाहों के दस्तख़त थे. हर पेज पर इन चार लोगों के दस्तख़त थे ही. इनमें मिले रुपए, उनकी तारीख़ और यह रुपए किस स्रोत से आए, इसका रिकॉर्ड है, जो कि कुल मिला कर 115 करोड़ है. 

इसके साथ ही नकद भुगतान के बारे में भी विस्तृत ब्यौरा है कि कब किया गया, कितना किया गया और किसे किया गया और पैसा लेकर कौन गया? यह सारी जानकारी कंप्यूटर से प्रिंट हुए कागज़ात में दी गई है और ऐसी 50 एंट्री की गई है, जिनकी कुल राशि 113 करोड़ रुपए है.

इतनी साफ़-साफ़ स्प्रेडशीट शायद ही कोई बनाता हो. यह विवरण सहारा प्रमुख सुब्रतो राय के निजी स्टाफ के काफी सीनियर अधिकारी के कम्प्यूटर से लिया गया है. साथ ही पैसा ले जाने वाले लोग भी सहाराकर्मी ही निकले. इस तरह सहारा के संदर्भ में तो प्रथम दृष्टया से कहीं अधिक सबूत मौजूद हैं कि कुछ पैसा लोकसेवकों को भी दिया गया. इसलिए इस मामले की भी आगे जांच की जरूरत है.

सहारा प्रमुख राय जेल गए और बाहर भी आए, हो सकता है उन्होंने सरकार पर दबाव बनाने के लिए डायरी में फेरबदल किए हों?

ये दस्तावेज़ नवम्बर 2014 में मारे गए एक छापे में बरामद किए गए थे. मुझे नहीं लगता, उस वक्त वे जेल में थे. मुद्दे की बात यह है कि कोई अपने ही कम्प्यूटर से निकले और अपने ही लिखे दस्तावेज में फेरबदल क्यों करेगा? क्योंकि वे कह रहे हैं कि रुपए देने वे ख़ुद गए थे. इसलिए ये दस्तावेज़ उनके हिसाब से तो गलत नहीं है, जिन्होंने इन्हें जारी किया है.

आप कोर्ट के इस आदेश से कहां तक सहमत हैं कि बजाय जांच के आदेश देने के कोर्ट ने आपसे और सबूत पेश करने के लिए कहा है?

मुझे लगता कि कोर्ट को पेश किए गए दस्तावेजों को बेंच ठीक से समझ नहीं पाई है, क्योंकि पेश किए गए कागज़ात दरअसल मूल प्रति है, जो शायद पूरी तरह साफ़ नहीं है. इसीलिए हमसे और स्पष्ट कॉपी मांगी गई है. अब हम इन्हीं कागजात की टाइप की हुई कॉपी पेश करेंगे ताकि वह और साफ़-सुथरी हो. 

बिड़ला और सहारा के दस्तावेज़ जैन हवाला केस से कितने मिलते जुलते हैं, जिस पर जांच बिठाई गई थी?

जैन हवाला केस में जो डायरियां थीं, उनमें लोकसेवकों, मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों के दस्तख़त से मिलते जुलते दस्तख़त थे. इसलिए कोर्ट के लिए इतना सबूत काफी था कि वह यह जांच कर सके कि क्या वाकई यह पैसा उन्हीं लोकसेवकों को दिया गया, जिनके नाम थे. इस मामले में हमारे पास बल्कि ज्यादा सबूत हैं. बिड़ला मामले में लोगों ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने इस पैसे का भुगतान किया है. उन्होंने बताया तो है कि अपने मुखिया शुभेन्दु अमिताभ के कहने पर उन्होंने हवाला का कहीं पड़ा हुआ कैश लोगों को भुगतान के लिए भेजा और खुद अमिताभ ने यह स्वीकारा है.

क्या आप अगली सुनवाई में नए कागजात पेश करेंगे?

हां, हम कुछ और साफ़ कॉपी पेश करेंगे. साथ ही कुछ नए कागजात भी जो यह बता सकें कि भुगतान करने वाले अधिकारी सहारा के ही कर्मचारी थे. उम्मीद है तब कोर्ट को लगेगा कि इस मामले में जैन हवाला केस से कहीं अधिक सबूत हैं, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में अदालत की निगरानी में जांच होनी चाहिए.

चूंकि इन कागजात में बहुत से राजनेताओं के नाम हैं, क्या इसीलिए राजनेता इस मामले में रूचि नहीं ले रहे?

हां, यह एक वजह हो सकती है. इनमें से कुछ कांग्रेसी तो कुछ बीजेपी के लोग हैं. कुछ पार्टियों के नेताओं के नाम हालांकि इसमें नहीं हैं, जैसे वाम दल, टीएमसी, जद (यू) के नेताओं के नाम इसमें शामिल नहीं हैं. 

First published: 28 November 2016, 7:58 IST
 
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