Home » इंडिया » Prashant Kishor have to work hard in Punjab more than UP
 

यूपी से ज्यादा पंजाब में देनी पड़ रही है प्रशांत किशोर को अग्नि परीक्षा

राजीव खन्ना | Updated on: 17 April 2016, 19:50 IST

पंजाब के विधानसभा चुनावों में जीत के मकसद से कांग्रेस ने प्रशांत किशोर को चुनाव रणनीतिकार के रूप में तैनात किया था. लेकिन उनकी नियुक्ति को करीब दो महीने बीतने के बाद भी जमीनी स्तर पर उनके कामकाज और प्रयास राजनीतिक लाभ में परिवर्तित होते नहीं दिख रहे.

ऐसा मानने वालों में पार्टी के प्रेक्षक और कार्यकर्ताओं का एक बड़ा तबका है जो इस बात की ओर इशारा करने से नहीं चूक रहा है कि उनकी रणनीति का प्रभाव अबतक कहीं भी देखने को नहीं मिल रहा है.

साथ ही कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि उन्हें यहां आये हुए अभी कुछ ही समय बीता है और चुनाव होने में अभी 10 महीनों से भी अधिक का समय शेष है. साथ ही कांग्रेसी अभी चुनाव प्रबंधन की इस नई शैली के साथ सामंजस्य बिठाने में भी काफी कठिनाई महसूस कर रहे हैं क्योंकि वे राज्य में ऐसी रणनीति से पहली बार दो-चार हो रहे हैं.

पढ़ें:हरित क्रांति नहीं किसानों की आत्महत्या है पंजाब में चुनावी मुद्दा

किशोर के लिये भी अबतक का सफर इतना आसान नहीं रहा है आने वाले दिनों में उनकी राह में और अधिक मुश्किलें आने की पूरी संभावना है. वे अबतक ऐसे कई अनुभवों से रूबरू हो चुके हैं जो किसी को भी आसानी से इस बात का भान करवा सकती हैं कि एक ऐसी पार्टी जिसके नेता आपस में ही कलह और एक-दूसरे की पीठ में छुरा भोंकने में लगे हों उसके लिये रणनीति बनाना कितना मुश्किल काम है.

किशोर का इस कड़वी सच्चाई से सामना उस समय हुआ जब हाल ही में वे राज्य के माझा नामक क्षेत्र में पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं से रूबरू हुए. यहां पर उनका सामना कांग्रेसियों की आपसी कलह और अनुशासनहीनता से हुआ और एक बैठक में तो स्थितियां इस हद तक बिगड़ गईं कि उन्हें बैठक बीच में ही छोड़कर जाना पड़ा.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि उनके सामने आम आदमी पार्टी (आप) और शिरोमणि अकाली दल को आगे बढ़ने से रोकने की रणनीति बनाने से पहले अपनी ही पार्टी को सुधारने की रणनीति बनानी पड़ेगी. उन्हें पार्टी के भीतर अमरिंदर सिंह के दो बड़े आलोचक नेताओं बीर देविंदर और जगमीत बरार को काबू में करने की बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी. 

पढ़ें:उग्रवाद के उभार की आशंका के बीच पंजाब में सजता चुनावी मंच

हालांकि किशोर की वार्ताओं के दौर और तमाम प्रयासों के बावजूद जब इन दोनों नेताओं ने अमरिंदर पर हमले करने जारी रखे तो उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा.

राजनीतिक विश्लेषक बलजीत बल्ली का मानना है कि इन दोनों का निष्काषन अमरिंदर सिंह के हित में रहा है. वे कहते हैं, ‘‘अब पार्टी पर उनका एकछत्र राज है और यह अच्छी बात है कि पार्टी पर एक ही व्यक्ति का आदेश चले.’’

किशोर का पहला प्रयास, काॅफी विद अमरिंदर, जिसमें युवाओं को उनसे रूबरू होने और बातचीत करने का मौका मिला, आलोचनाओं के घेरे में आ गया है

2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीते वर्ष बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की जीत की सफल रणनीति तैयार करने वाले प्रशांत किशोर पंजाब में चुनाव जिताने वाले रणनीतिकार की एक भारी-भरकम ख्याति के साथ आए हैं. एक नेता कहते हैं, ‘‘कई बार आपकी ताकत और प्रसिद्धि ही आपकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित होती है.’’

इसके अलावा पंजाब में अमरिंदर की छवि बनाने के क्रम में किशोर का पहला प्रयास, ‘‘काॅफी विद अमरिंदर’’, जिसमें युवाओं को उनसे रूबरू होने और बातचीत करने का मौका मिला, आलोचनाओं के घेरे में आ गया है. बल्ली कहते हैं, ‘‘यह काफी विवादास्पद हो गया क्योंकि काफी कभी भी पंजाबियों का पसंदीदा पेय नहीं रहा. हालांकि इसका सकारात्मक पहलू यह रहा कि इस बहाने से अमरिंदर युवाओं तक अपनी पहुंच बनाने में सफल रहे.’’

पढ़ें:दिल्ली की असफलताओं से पंजाब में आप को ठिकाने लगाएंगे कांग्रेस और अकाली

इसके अलावा कई अन्य लोग उनकी पहल को किशोर द्वारा मोदी के लिये चलाई गई ‘‘चाय पर चर्चा’’ की नकल बताकर भी इसका विरोध कर रहे हैं. पंजाब के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक बड़े तबके का कहना है कि यह पहल उनके अपने क्षेत्र में खास फायदा पहुंचाने में असफल रही है.

इसके अलावा किशोर के आलोचकों का यह भी कहना है कि पंजाब के मामले में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे बीजेपी की और बीजेपी उनकी कार्यप्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ है, क्योंकि किशोर उसके साथ और विरोध दोनों ही भूमिकाओं में काम कर चुके हैं. ऐसा उनके साथ पहली बार है कि वे अकाली दल और आप जैसी शक्तियों का सामना कर रहे हैं जो एक बिल्कुल अलग और आक्रामक शैली की राजनीति करती हैं. 

एक तरफ अकाली दल है जो बेहद पेंचीदा धार्मिक मामलों को राजनीति में साने रहती है तो दूसरी तरफ आप है जो लगातार बेहत स्थानीय छोटे-छोटे मुद्दों पर कांग्रेस और अकालियों को खींच रही है.

बल्ली कहते हैं, ‘‘उन्हें अभी पंजाब के तौर-तरीकों को सीखना है. यहां पर मुद्दे जिले के बदलते ही बदल जाते हैं. हम उदाहरण के लिये बैसाखी पर तलवंडी साबू में कांग्रेस के शो को ही लेते हैं. हालांकि शो काफी अच्छा था लेकिन अमरिंदर का भाषण हल्का था. उन्हें अभी पंजाबी भाषा को सीखने और समझने की आवश्यकता है.’’

पढ़ेंः चुनाव से पहले पंजाब में फिर शुरू हुई पानी की विवादित कहानी

साथ ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक खासी संख्या किशोर के जमीनी स्तर पर काम करने के ‘गोपनीय’ तौर-तरीकों से खासा नाराज है. मालवा से ताल्लुक रखने वाले एक कांग्रेस नेता व्यंग्यात्मक लहजे में कहते हैं, ‘‘क्या उन्होंने पंजाब में काम करना प्रारंभ कर दिया है? क्या वे कांग्रेस नेताओं के साथ बातचीत कर रहे हैं? कम से कम मुझे तो इस बारे में कोई जानकारी नहीं.’’

पटियाला के एक कांग्रेस कार्यकर्ता कहते हैं, ‘‘वे अपनी एक अलग टीम के साथ समानांतर रूप से काम कर रहे हैं. हमें अभी तक यह नहीं पता है कि वे क्या चाहते हैं. फिलहाल हमारे और दूसरी पार्टियों के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि हमारे कार्यकर्ता अभी तक चुनावी मनोदशा में नहीं आ पाए हैं.’’

किशोर के सामने अमरिंदर को आम कार्यकर्ताओं और जनता के लिये सुलभ बनाने की भी एक बेहद कठिन चुनौती है

अमरिंदर की एक परिवार के सिर्फ एक सदस्य को चुनाव लड़ने के लिये पार्टी का टिकट देने की घोषणा से भी कांग्रेस के कई नेता नाराज हैं. ऐसा माना जा रहा है कि उन्होंने ऐसा प्रशांत के कहने पर ही किया है जिससे वे वरिष्ठ नेता नाराज हो गए हैं जो आगामी चुनावों में अपने बेटे-बेटियों को राज्य की राजनीति में सक्रिय करने का सपना पाले बैठे थे.

विश्लेषकों का मत है कि ऐसे नेता अब पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने से परहेज कर रहे हैं. हालांकि निचले स्तर के कार्यकर्ता उनकी इस घोषणा से काफी प्रसन्न हैं और साथ ही उन्हें यह वायदा भी काफी पसंद आया है कि चुनाव जीतने वाले किसी भी विधायक को किसी भी बोर्ड या निगम का अध्यक्ष या पदाधिकारी नहीं बनाया जाएगा. अमरिंदर ने घोषणा की है कि अगर उनकी पार्टी चुनाव जीतकर राज्य में सरकार बनाने में कामयाब होती है तो इन पदों पर पार्टी कार्यकर्ताओं को समायोजित किया जाएगा.

पढ़ें: अकाली-बीजेपी गठबंधन दोनों की मजबूरी है

इसके अलावा किशोर के सामने अमरिंदर को आम कार्यकर्ताओं और जनता के लिये सुलभ बनाने की भी एक बेहद कठिन चुनौती है. उनके विरोधी अक्सर उन्हें आम लोगों की परवाह न करने वाला ‘महाराज’ कहते हुए उनपर हमला करते रहे हैं. 

‘काफी विद कैप्टन’ और सोशल मीडिया पर ‘पंजाब द कैप्टन’ जैसी पहल के अलावा आने वाले दिनों में लोगों के साथ उनका सीधा संवाद अमरिंदर की इस बनी हुई छवि को तोड़ने का प्रयास हैं.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘‘यह समझने की आवश्यकता है कि प्रशांत के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाकर वे रातोंरात कोई बहुत बड़ा बदलाव कर सकते हैं. बिहार के मामले में उन्होंने ‘बाहरवाले’ और ‘बिहारवाले’ को लेकर हुई बहस को पहले ही लपककर भुना लिया. उन्हें समय दिये जाने की आवश्यकता है क्योंकि चुनावों में अभी काफी समय शेष है.’’

इसके अलावा उन्होंने बताया कि किशोर ने अमरिंदर को उस महल मंडली से सफलतापूर्वक बाहर निकाला है जो उन्हें हर समय घेरे रहती थी और उन्हें बाहरी लोगों से दूर रखती थी.

पढ़ें: पंजाब कांग्रेस के खिलाफ जगमीत बरार ने खोला मोर्चा

बल्ली कहते हैं, ‘‘यह सच है कि अभी किशोर के नाम कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है लेकिन अभी कोई भी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा.’’

हाल ही में हुए एक चुनाव सर्वेक्षण, जिसमें आप को करीब 100 सीटों पर जीत का दावेदार बताया गया है लेकिन मुख्यमंत्री के पद के लिये अमरिंदर को सबसे मजबूत दावेदार दर्शाया गया है, एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘‘वे कैसे बिना अपनी पार्टी के विधायकों के मुख्यमंत्री बन सकते हैं.’’

यहां तक कि अमरिंदर भी यह कहते आए हैं कि पंजाब में सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही है जो उसे खुद को जीतने से रोक सकती है.

पढ़ेंः एनआरआई को लुभाने के लिए ताबड़तोड़ विदेशी दौरे कर रही हैं पंजाब की पार्टियां

First published: 17 April 2016, 19:50 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी