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प्रशांत किशोर: न तो उत्तर प्रदेश, 'बिहार-गुजरात' है न ही कांग्रेस यहां 'जदयू-भाजपा' है

अतुल चौरसिया | Updated on: 5 March 2016, 8:27 IST

राहुल गांधी ने लोकसभा में बुधवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जबर्दस्त भाषण दिया. मोदी सरकार पर जमकर निशाने साधे और भाषण के ठीक बाद वो प्रशांत किशोर के साथ बैठक करने चले गए. सोशल मीडिया में लोगों ने चुटकी लेना शुरू कर दिया कि प्रशांत का साथ मिलते ही राहुल गांधी भी बदल गए.

प्रशांत किशोर ने कांग्रेस पार्टी के उत्तर प्रदेश अभियान की कमान संभालने का फैसला कर लिया है. गौरतलब है कि प्रशांत किशोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चुनाव प्रबंधन सफलतापूर्वक कर चुके हैं.

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प्रशांत किशोर राजनीतिक फलक पर पहली बार 2012 में उभरे थे. तब उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की रणनीति तैयार की थी. नरेंद्र मोदी और प्रशांत का साथ इसके बाद भी बना रहा. 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की टीम ने एक बार फिर से मोदी के सोशल मीडिया का प्रबंधन किया. बहुचर्चित चाय पर चर्चा कार्यक्रम प्रशांत किशोर का ही विचार माना जाता है.

प्रशांत किशोर की चुनावी सफलता की कारवां आगे भी जारी रहा लेकिन साथी बदल गए. 2015 में बिहार के विधानसभा चुनाव में प्रशांत ने नीतीश कुमार का चुनावी प्रबंधन किया. इन तीनों ही चुनावों में मिली बड़ी सफलता के बाद प्रशांत की छवि राजनीति की दुनिया में पारस पत्थर सरीखी हो गई थी.

पीएम मोदी की बहुचर्चित चाय पर चर्चा कार्यक्रम प्रशांत किशोर का ही विचार माना जाता है

अब उन्होंने एक नई जिम्मेदारी स्वीकार की है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नाव पार लगाने की. इससे पहले काफी समय से अटकलें लगाई जा रही थीं कि प्रशांत कांग्रेस के साथ जुड़ सकते हैं. उनके असम चुनाव अभियान से जुड़ने की खबरें भी उड़ी लेकिन बाद में उन्होंने दम तोड़ दिया. प्रशांत की टीम के एक सदस्य कहते हैं, 'असम के साथ बड़ी समस्या यह थी कि वहां कांग्रेस के साथ 15 साल की एंटी इन्कंबेंसी थी और साथ ही समय भी बहुत कम था. जबकि उत्तर प्रदेश में हमारे पास काफी समय है. यहां कांग्रेस के साथ जो दिक्कतें हैं उन्हें समझने और सुधारने का हमारे पास काफी समय है.'

लेकिन अब तक प्रशांत किशोर ने जिन चुनाव अभियानों की बागडोर संभाली है उत्तर प्रदेश की स्थिति उससे बिल्कुल भिन्न है. गुजरात में नरेंद्र मोदी 2002 से लगातार चुनाव जीतते आ रहे थे. वहां उनकी स्थिति बेहद मजबूत थी. लोकसभा चुनावों की बात करें तो भी काफी हद तक स्पष्ट था क्योंकि पूरे देश में यूपीए सरकार के कुशासन को लेकर जबर्दस्त नकारात्मकता का माहौल था.

प्रशांत किशोरः कुछ कही, कुछ अनकही कहानी

अगर प्रशांत किशोर के हालिया बिहार अभियान की बात करें तो यहां भी नीतीश कुमार की स्थिति बेहद मजबूत थी. ऊपर से लालू यादव से गठबंधन के कारण वोटों की गणित पूरी तरह से उनके पक्ष में झुकी हुई थी.

उत्तर प्रदेश की स्थिति इन तमाम सफल अभियानों के उलट है. यहां कांग्रेस की स्थिति दयनीय है. 403 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस के सिर्फ 28 सदस्य हैं. संगठन की हालत बेहद खराब है. 1989 के बाद से ही कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर चल रही है. तो क्या जमीन पर पड़ी कांग्रेस को प्रशांत यहां उठा पाएंगे?

प्रशांत किशोर के हालिया बिहार अभियान की बात करें तो यहां भी नीतीश कुमार की स्थिति बेहद मजबूत थी

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता इशारों में एक कहावत के जरिए अपनी बात रखते हैं, 'घी ने संवारी रोटियां और बड़ी बहू का नाम.' कहावत का अर्थ यह है कि अब तक उन्होंने जो कुछ किया था उसके पीछे पूरा नहीं तो कुछ हद तक हाथ पार्टियों की अपनी मजबूत स्थिति का भी था.

इस लिहाज से प्रशांत के सामने खुद को साबित करने की असली चुनौती अब है. इस बात की ताकीद प्रशांत की कंपनी आईपैक के एक सदस्य भी करते हैं, 'यह बहुत ही कठिन चुनौती है. कह सकते हैं कि दूर की कौड़ी है. बस एक ही चीज हमारे पक्ष में है कि हमारे पास समय है.'

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बुधवार को राहुल गांधी और तमाम दूसरे कांग्रेसी नेताओं की उपस्थिति में प्रसांत किशोर सिर्फ ऑबजर्बर की भूमिका में रहे. उन्होंने किसी से कुछ बातचीत करने की बजाय चुपचाप नोट बनाने मे मशगूल रहे.

बताया जा रहा है कि उन्होंने कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व के सामने चार-पांच शर्तें रखी हैं. इनमें से एक शर्त उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी को किसी महत्वपूर्ण भूमिका में उतारने की है. इस बैठक में ज्यादातर केंद्रीय नेता मौजूद थे. उत्तर प्रदेश कांग्रेस से सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री थे.

प्रशांत किशोर ने कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व के सामने चार-पांच शर्तें रखी हैं

बैठक में मौजूद एक नेता के मुताबिक प्रशांत ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारी संभालने से पहले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जमीनी स्थिति से जुड़ा एक सर्वे किया है. इसके बाद ही उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली है. उनकी टीम के एक सदस्य के अनुसार, 'फिलहाल कांग्रेस की सरकार बनाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं. हमारी कोशिश उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के रिवाइवल की है. अगर हम कांग्रेस की सीटों में आशातीत बढ़ोत्तरी कर पाए तो यह हमारे लिए बड़ी सफलता होगी.'

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इस बयान से टीम के भीतर इस नए असाइनमेंट को लेकर चल रही सोच का एक संकेत मिलता है. यानी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की मौजूदा राजनैतिक हैसियत को देखते हुए प्रशांत और उनकी टीम फिलहाल कोई बड़ा लक्ष्य नहीं रख रही है. जल्द ही कुछ और चीजें साफ हो जाएंगी. मसलन उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेता कैसे इनको लेंगे, किस तरह का उनका समझौता होगा. क्या वे नीतीश कुमार के अभियान की तरह पूरे चुनाव अभियान की बागडोर संभालेंगे या फिर मोदी के अभियान की तर्ज पर कुछ सीमित कामकाज देखेंगे.एक बात पूरी तरह से तय है कि प्रशांत किशोर की उत्तर प्रदेश परीक्षा उनकी असली अग्नि परीक्षा होगी.

First published: 5 March 2016, 8:27 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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