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प्रशांत किशोरः कुछ कही, कुछ अनकही कहानी

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • बिहार चुनाव में नीतीश कुमार के प्रचार अभियान की कमान संभालने वाले प्रशांत किशोर का अब तक का सफ़र.
  • प्रशांत की कोर टीम के सदस्यों ने बताया उनके कामकाज का तरीका और उनके बीजेपी छोड़कर महागठबंधन के साथ जुड़ने की वजह.

आठ नवंबर की दोपहर को जब ये साफ़ हो गया कि बिहार चुनाव में नीतीश कुमार का महागठबंधन बड़ी जीत हासिल कर रहा है तो छोटे बड़े सारे मीडियावाले नीतीश के आवास की तरफ़ दौड़ पड़े. नीतीश ने उन्हें निराश नहीं किया.

मीडियावालों से मिलने के लिए वो मुख्यमंत्री आवास से बाहर निकले लेकिन वो अकेले नहीं थे. उनके साथ एक और नौजवान चेहरा था जिसे नीतीश ने कैमरे के सामने गले से लगाया. इसके साथ ही भारतीय मीडिया को एक राजनीतिक सेलेब्रिटी मिल गया. क़रीब 37 साल के प्रशांत किशोर को देश के सबसे बड़े पॉलिटिकल पंडित की तरह पेश किया जाने लगा.

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मई, 2013 में जब प्रशांत किशोर और उनकी युवा टीम बीजेपी और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के चुनावी प्रचार टीम का हिस्सा बने तो पार्टी के कई बड़े नेताओं ने उनकी युवा टीम को हल्के में लिया. बीजेपी के कई सीनियर लीडर उन्हें 'बच्चा' समझ कर व्यवहार करते थे.

इस टीम के दो अभियान 'चाय पर चर्चा' और 'थ्री-डी नरेद्र मोदी' की बीजेपी के चुनाव प्रचार में अहम भूमिका रही. आखिरकार जब नरेंद्र मोदी मई, 2014 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आए तो इसका काफी कुछ श्रेय प्रशांत किशोर की टीम को भी दिया गया.

नए पाले में पुराने खिलाड़ी


साल 2015, महीना नवंबर, बिहार के चुनावी घमासान में बीजेपी और महागठबंधन आमने-सामने. बीजेपी के चुनाव प्रचार की कमान अमित शाह के हाथ में तो महागठबंधन के प्रचार सारथी बने प्रशांत किशोर. लोक सभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी ने उन्हें सेवा समाप्त की तख्ती पकड़ा दी थी.

इसलिए वो महज डेढ़ साल पहले जिसके साथ थे, बिहार की रणभूमि में उनके सामने आ खड़े हुए. जीत आखिरकार, प्रशांत किशोर और उनकी टीम की हुई. वो भी जबरदस्त तरीके से हुई.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश का प्रशांत को सबके सामने गले लगाने का एक प्रतीकात्मक महत्व था

इस जेस्चर में ये संदेश छिपा था कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की नेतागिरी की स्टाइल में फर्क है. जहां मोदी ने भारी जीत के बाद इस हमसफर को बाहर का रास्ता दिखा दिया, वहीं नीतीश ने उसे पूरी दुनिया के सामने गले लगा लिया.

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साल 2013 में प्रशांत और उनकी टीम ने सिटीजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) नाम से एक एनजीओ बनाकर नरेंद्र मोदी को एक ब्रांड के तौर पर पेश किया और मोदी की जीत में भूमिका निभाई. बिहार चुनाव में उन्होंने इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपैक) बनाकर 'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हों' के नारे के साथ नीतीश को जीत दिलायी.

इन बड़ी राजनीतिक सफलताओं के बाद राजनीति में रुचि रखने वाला हर व्यक्ति जानना चाहता है कि वो कौन हैं और महज चार सालो में भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में कैसे गिने जाने लगे. उनके काम करने का तरीका क्या है? उनके साथ कौन-कौन लोग हैं? कैच हिंदी ने इन्हीं सवालों की पड़ताल करने की कोशिश की.

मध्यमवर्गीय परिवार से सत्ता के गलियारों तक


मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे प्रशांत के पिता श्रीकांत पांडे पेशे से डॉक्टर हैं. बिहार सरकार से रिटायर होने के बाद पिछले 15 साल से वह बक्सर में अपना निजी क्लीनिक चलाते हैं. यहीं उनका निवास भी है. प्रशांत के बड़े भाई अजय किशोर पटना में रहते हैं और खुद का कारोबार करते हैं. इसके अलावा उनके परिवार में उनकी दो बहनें भी है.

प्रशांत मीडिया से अपने निजी जीवन की चर्चा नहीं करना चाहते हैं. कैच न्यूज से बातचीत में उन्होंने बताया कि "उनके बारे में कई तरह की खबरें छप रही हैं लेकिन सभी सही नहीं है.” मीडिया में आईं कुछ ख़बरों में कहा गया कि वो बिहार के बक्सर के रहने वाले हैं. जब कैच न्यूज ने उनसे इस बाबत सवाल किया तो उन्होंने बस इतना ही कहा कि उनके पिता पिछले 15 साल से बक्सर में अपना क्लीनिक चला रहे हैं.

कैच न्यूज को मिली जानकारी के अनुसार प्रशांत ने इंटरमीडिएट (12वीं) की पढ़ाई पटना के प्रतिष्ठित साइंस कालेज से की है. उसके बाद उन्होंने हैदराबाद के एक कॉलेज से इंजिनियरिंग की. इसके बाद उन्होंने अफ्रीका में यूएन हेल्‍थ एक्‍सपर्ट के तौर पर काम किया है. नौकरी छोड़कर प्रशांत चार साल पहले ही 2011 में भारत लौटे हैं.

निजी जीवन पर सबकी चुप्पी


प्रशांत किशोर के साथ पिछले ढाई साल से काम करने वाले लोग भी उनके निजी जीवन के बारे में ज्यादा नहीं जानते. इंटरनेट पर भी प्रशांत के बारे अधिकतर जानकारी 2011 के बाद से मिलती है जब उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए काम शुरू किया.

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आईआईटी कानपुर से ग्रेजुएट महज 26 साल के ऋषि राज सिंह पिछले ढाई साल से प्रशांत किशोर के साथ काम कर रहे हैं.

ऋषि सीएजी के संस्थापक सदस्य और वर्तमान में आईपैक के तीन डायरेक्टरों में एक हैं. उनका कहना है कि प्रशांत और वे खुद सोशियो पॉलिटिकल डोमेन में कुछ करना चाहते थे. इसलिए 15-20 युवाओं ने सीएजी के नाम से एनजीओ को रजिस्टर्ड कराया.

प्रशांत 2012 में गुजरात विधानसभा चुनाव से ही मोदी के साथ जुड़ चुके थे. इसलिए सबसे पहले उनकी टीम मई 2013 में बीजेपी के पास गई.

ऋषि का दावा है कि प्रशांत इस टीम में सिर्फ मेंटर के तौर पर काम करते हैं. आईपैक में प्रशांत का कोई आधिकारिक पद नहीं है. बिहार में काम करने से पहले ही इस संस्था का गठन हुआ था. इसका रजिस्टर्ड ऑफिस पटना में है.

नया चुनाव, नयी चुनौती


यह पूछने पर कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत में अहम भागीदारी निभाने के बाद उनकी टीम ने बिहार में नीतीश के साथ काम क्यों किया, ऋषि कहते हैं, 'आम चुनाव में हमारी टीम बीजेपी के पूरे कैंपेन को लीड नहीं कर रही थी. लेकिन बिहार में हमलोगों ने बूथ-स्तर पर तक काम किया है. दरअसल हमलोग देखना चाहते थे कि क्या हमारी टीम किसी नेता के पूरे चुनावी अभियान को लीड कर सकती है. और इसे हमारी टीम ने साबित करके दिखा दिया.'

प्रशांत के बारे में ऋषि कहते हैं, 'प्रशांत अपने टीम मेंबर से हमेशा 100 फीसदी काम करने की उम्मीद रखते हैं और वह खुद अपनी सीमाओं से बाहर जाकर काम करना पसंद करते हैं. वह टीम से हमेशा चर्चा करते हैं और अपनी सलाह देते हैं. साथ ही, दूसरों की राय को नजरअंदाज नहीं करते हैं.'

ऋषि ने बताया कि पिछले साल नवंबर से ही प्रशांत और टीम के लोगों ने बिहार चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी थी. तैयारियां पूरी करने के बाद उनकी टीम ने इस साल 25 फरवरी को नीतीश कुमार को प्रेजेंटेशन दी थी.

उसके बाद मार्च से ही आईपैक की टीम ने काम करना शुरु कर दिया. ऋषि कहते हैं, 'पिछले छह महीने के दौरान मैंने कोई छुट्टी नहीं ली. 2014 के चुनाव में हमारी टीम ने प्रयोग किया था जबकि 2015 में हमे खुद को साबित करना था.' एक बच्चे के पिता प्रशांत भी मार्च के आखिर में बिहार आ गए थे जबकि पत्नी दिल्ली में ही रहती हैं.

चौबीस घंटे काम


मध्यप्रदेश के उमरिया के रहने वाले आईपैक के दूसरे डायरेक्टर और प्रशांत के करीबी सहयोगी विनेश चंदेल बताते हैं, "चुनाव के चरम पर हमारी टीम में 600-700 लोग काम कर रहे थे. ये टीम पूरे 24 घंटे काम करती थी. जबकि मैंने खुद लगातार 6 महीने 14-15 घंटे काम किया है. खुद प्रशांत किशोर नीतीश के बंगले से काम कर रहे थे जबकि आईपैक की टीम का ऑफिस पटना के एक्जीबिशन रोड पर था."  28 साल के विनेश ने नेशनल लॉ कॉलेज भोपाल से पढ़ाई की है.

पीएम मोदी के अलग होने का कारण बताते हुए विनेश बताते हैं, "शायद जिस तरह का रोल प्रशांत किशोर चाहते थे वो उन्हें मिल नहीं पाया. चुनाव रणनीतिकार के तौर पर खुद को साबित करने के लिए बिहार चुनाव प्रशांत के लिए बड़ा अवसर था. नीतीश की छवि विश्वसनीय है और प्रशांत भी बिहार से आते हैं इसलिए हमारी टीम ने नीतीश के लिए काम करने का फैसला किया."

विनेश ने आगे बताया कि उनकी कोर टीम में 70-80 लोग हैं. इसके अलावा किसी स्टेट में काम करने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोगोंं को शामिल किया जाता है. इसमें जो भी अच्छा काम करता है उसे कोर टीम में शामिल कर लिया जाता है.

जींस-टीशर्ट से पजामा-कुर्ता


विनेश ने बताया कि बिहार आने से पहले प्रशांत जींस -टीशर्ट पहनते थे लेकिन यहां उन्होंने समाजवादी लुक अपनाते हुए पूरे चुनाव के दौरान पैजामा-कुर्ता पहना. प्रशांत टेक फ्रेंडिली है और आईफोन और आईपैड का उपयोग करते हैं.

प्रशांत किशोर की कार्यशैली के बारे में बात करते हुए विनेश कहते हैं, 'प्रशांत वार रुम के आदमी नहीं है. मैं खुद चुनाव के दौरान उनके साथ छह-सात जिलों में गया हूं. वोटिंग से पहले जमीनी हकीकत जानने के लिए प्रशांत अपनी नीली रंग की इनोवा में एक दिन में करीब तीन-चार जिलों का दौरा करते थे.

प्रशांत के पास पटना में सारी सूचना रहती थी लेकिन सूचनाओं के विश्लेषण के लिए वह हर जिले में जाते थे और वहां के जिला कोआर्डिनेटर से बात करते थे. कई बार रात के दो-तीन बजे तक भी मीटिंग चलती रहती थी.'

लंबे समय तक काम करने बाद सभी टीम मेंबर छुट्टी मनाने के लिए घर चले गए. प्रशांत भी फिलहाल अपने माता-पिता के साथ दिल्ली में हैं. प्रशांत के एक अन्य सहयोगी और आईपैक के तीसरे डायरेक्टर प्रतीक जैन कहते हैं, 'प्रशांत की राजनीतिक समझ बहुत तेज है. उनके साथ काम करने के लिए बहुत मेहनती होना पड़ता है.' रांची के रहने वाले 26 साल के प्रतीक आईआईटी बॉम्बे से ग्रेजुएट हैं.

बीजेपी और महागठबंधन में फर्क


बीजेपी और महागठबंधन के लिए काम करते हुए उन्हें क्या फर्क महसूस हुआ, इस सवाल पर प्रतीक कहते हैं कि बीजेपी के लिए काम करने के दौरान उनके साथ बच्चे की तरह ट्रीट किया जाता था. बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को लगता था कि 25-30 सालों के चुनावी अनुभव के सामने ये बच्चे क्या कर लेंगे.

प्रतीक आगे बताते हैं, 'सीएजी मोदी जी के लिए यूज हो गया था. हम नया ब्रांड बनाना चाहते थे. एक दिन ऐसे ही चार-पांच लोग बैठे हुए थे. सामान्य बातचीत के दौरान ही हमें अमेरिका में पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के तर्ज पर इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी जैसी संस्था का विचार आया."

प्रतीक ने बताया, "अमेरिका में पॉवर पैक के नाम से एक संस्था है. वहीं से हमारी टीम को ये आइडिया आया. अमेरिका और इंग्लैंड में यह प्रणाली पहले से चली आ रही है. इंडिया में पहली बार हमने इस तरह का प्रयोग किया. हमारी संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड के नाम से दर्ज है. लेकिन ब्रांड नैम आईपैक है.'

प्रतीक ते मुताबिक किसी भी कैंपेन के लिए बजट का निर्धारण काम के हिसाब से होता है.

आईपैक की टीम ने बिहार में पूरे बूथ स्तर तक मैनेजमेंट किया है लेकिन बिहार में नीतीश का चुनावी बजट पीएम मोदी के लोकसभा चुनाव वाले बजट से काफी कम था. हालांकि, प्रतीक दोनों कैंपेन का बजट बताने के लिए तैयार नहीं हुए.

प्रशांत के तीनों सहयोगगियों ने उनकी निजी जीवन के बारे में बताने से साफ इंकार कर दिया. बक्सर में प्रशांत के पिता श्रीकांत पांडेय एक सहयोगी ने दावा किया कि प्रशांत का जन्म बक्सर में ही हुआ है. जीत के बाद प्रशांत के माता-पिता दिल्ली आ गए हैं. फिलहाल उनकी मां की तबियत ठीक नहीं है.

First published: 7 December 2015, 11:16 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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