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अब प्रशांत किशोर ले आए हैं राहुल की चने पर चर्चा?

राघवेंद्र प्रताप सिंह | Updated on: 28 April 2016, 12:51 IST
QUICK PILL
  • कांग्रेस उत्तर\r\n प्रदेश के खेत, खलिहानों और गांव की चौपालों पर अब चने पर चर्चा कराने की \r\nरणनीति तैयार कर रही है. जाहिर है यह भाजपा के चाय पर चर्चा की काट के रूप \r\nमें खोजा गया है.
  • उत्तर प्रदेश के चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए करो या मरो\r\n का प्रश्न बन चुका है. प्रशांत किशोर के रूप में पार्टी ने चुनाव जीतने के\r\n सबसे बड़े महारथी को पहले से ही मैदान में उतार रखा है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस चौथे पायदान पर खड़ी है. 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी दो सीटों पर सिमट गई थी. इन नतीजों की रोशनी में अगर हम कांग्रेस के 2017 के अभियान की तैयारियों को देखें तो कहा जा सकता है कि पार्टी करो या मरो की तर्ज पर चुनाव मैदान में उतरने जा रही है.

प्रदेश कांग्रेस कमेटी से जो खबरें आ रही है उन पर यकीन किया जाय तो प्रशांत किशोर (पीके) ने लोकसभा चुनाव में जिस तरह से भाजपा और नरेंद्र मोदी की चाय पर चर्चा करा कर जबर्दस्त लोकप्रियता बटोरी थी उसी तर्ज पर अब वे कांग्रेस की "चने पर चर्चा" करवा कर उसकी बात लोगों के बीच पहुंचाना चाहते हैं.

वापसी की हर संभव कोशिश कर रही कांग्रेस


कांग्रेस के चुनावी सलाहकार प्रशांत किशोर की रणनीति के अलावा पार्टी अपने स्तर पर भी वह हर फार्मूला अपनाएगी जिससे पार्टी के पुराने दिनों की वापसी सुनिश्चित हो सके. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक भाजपा की तरह ही जल्द ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी में संगठनात्मक स्तर पर व्यापक फेरबदल किया जाएगा.

कांग्रेस के जानकारों का कहना है कि 2017 के विधानसभा चुनावों के बेहतर प्रदर्शन से ही 2019 में उसकी संभावनाएं बेहतर हो सकेंगी. इसलिए 2017 में अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए कांग्रेस हर तरह के चने चबाने को तैयार है.

राहुल सोशल मीडिया पर चने पर चर्चा करते हुए दिखेंगे


चाय की तरह ही चना भी भारतीय गंवई समाज का अभिन्न अंग है, बल्कि एक लिहाज से चाय से ज्यादा हिंदुस्तानी भी है. इसे अगर समझना है तो कुछ लोकोक्तियों, कहावतों और मुहावरों को देखना होगा, मसलन, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, थोथा चना बाजे घना, लोहे के चने चबाना, चना-चबैना इत्यादि.

यूपी में प्रशांत की रणनीति कांग्रेस को एकदम निचले स्तर के वोटर से जोड़ने की है

जाहिर है प्रशांत की रणनीति पार्टी को एकदम निचले स्तर के वोटर से जोड़ने की है. यह काम वो नरेंद्र मोदी के लिए चाय पर चर्चा और नीतीश कुमार के लिए घर-घर दस्तक जैसे अभिानों से सफलतापूर्वक अंजाम दे चुके हैं. जाहिर है इस अभियान में एक किस्म की स्थानीयता और भारतीयता भी है जो कि नेताओं से वोटरों को गहराई से जोड़ सकती है.

प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी को सोशल मीडिया के जरिए आम लोगों तक पहुंचने के लिए जो रणनीति बनाई है उसके मुताबिक राहुल गांधी लोगों के बीच चने पर चर्चा करेंगे, और कांग्रेस की सरकार बनने पर जनता के लिए क्या करेंगे इसकी तस्वीर रखेंगे.

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कांग्रेस पिछले ढाई दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर है. पार्टी का वनवास खत्म करने के लिए शीर्ष नेतृत्व किसी भी हद तक जाने को तैयार है. इसी गरज से कांग्रेस के रणनीतिकार चने की चर्चा लेकर गांव-मुहल्ले जाने को तैयार हैं.

चने पर ही चर्चा क्यों?


चना ऐसा अनाज है जो अंकुर फूटने से लेकर पकने तक खाया जाता है. आम-आवाम के बीच चने को बहुत चाव से इस्तेमाल किया जाता है. सियासत से भी चने का पुराना रिश्ता रहा है. जेल जाने वाले नेताओं के बीच यह कहावत काफी लोकप्रिय है "जब तक जेल में चना रहेेगा आना जाना बना रहेगा”.

जाहिर है चने पर चर्चा के जरिए प्रशांत किशोर एक बार फिर से भारतीय गंवई समाज की नब्ज को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं. चाय की चर्चा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया लिहाजा यह देखना अब दिलचस्प होगा कि चने की चर्चा कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की गद्दी दिला पाती है या नहीं.

हवा-हवाई लग रही पीके की रणनीति


कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने सारा दारोमदार प्रशांत किशोर पर छोड़ दिया है लेकिन पार्टी के एक गुट ने दबी जुबान में उनका विरोध भी शुरू कर दिया है. विरोध का सुर राहुल गांधी की कर्मभूमि अमेठी के अलावा उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दो सीनियर लीडरों की तरफ से सुना गया है.

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प्रशांत किशोर का विरोध कर रहे कांग्रेसियों को उनकी रणनीति हवा-हवाई लग रही है. पिछले दिनों उन्होंने लखनऊ में दो दिनों तक रह कर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत की लेकिन उसके कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आए.

प्रशांत किशोर लोगों का कांग्रेस के प्रति रूख जानने के लिए आठ टीमें बनाकर दौरा करने जा रहे हैं

अगले चरण में प्रशांत किशोर आम लोगों का कांग्रेस के प्रति क्या रूख है यह जानने के लिए आठ टीमें बनाकर तीन मंडलों का दौरा करने जा रहे हैं. कांग्रेसी नेता प्रशांत के प्रयोगों को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं हैं. वे अभी से कहने लगे हैं कि बिहार और यूपी की राजनैतिक पृष्ठभूमि में काफी अंतर है यहां उनका फार्मूला काम नहीं करेगा.

दिलचस्प तथ्य यह है कि विरोध करने वाले ये वही नेता हैं जिनके नेतृत्व में पार्टी की पिछले दो दशकों में यह दुर्दशा हो चुकी है कि वह सूबे में चौथे नंबर पर पहुंच गई है.

इस बार कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी पुराने नेताओं पर एक हद से ज्यादा दांव लगाने के मूड में नहीं है. इसका सबूत यह है कि प्रशांत के विरोध मे उतरे कुछ नेताओं को केंद्रीय नेतृत्व ने साफ शब्दों में चेता दिया है कि वह प्रशांत के खिलाफ कुछ भी सुनने कहने को तैयार नहीं है.

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केंद्रीय नेतृत्व ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि प्रशांत को पार्टी की बेहतरी के लिए लखनऊ भेजा गया है, और अब इसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. साथ ही यह संदेश भी प्रसारित कर दिया गया है कि वे जो रणनीति बनाएंगे पार्टी को उसी पर काम करना होगा.

पार्टी नेताओं के एक गुट के असहयोग के कारण अब तक प्रशांत किशोर की जो बैठकें हुई हैं उनका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला है.

पिछले दिनों युवा इकाई के साथ बैठक के दौरान कार्यकर्ताओं ने खुलकर कह दिया सपा-बसपा के पास सीएम का चेहरा है. भाजपा भी जल्द ही सीएम चेहरे को प्रोजेक्ट करने वाली है लेकिन कांग्रेस के पास सीएम का कोई चेहरा नहीं है जिसके चलते जनता के बीच जाना मुश्किल हो गया है.

 चाय और चने के अभियान में एक छोटा सा अंतर है. भाजपा के पास नरेंद्र मोदी के रूप में बड़ा एक चेहरा था. कांग्रेस के लिए वह काम शायद प्रियंका कर सकती हैं.

First published: 28 April 2016, 12:51 IST
 
राघवेंद्र प्रताप सिंह @catchhindi

संवाददाता, पत्रिका ब्यूरो लखनऊ

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