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बिहार में शराबबंदी और नीतीश के बड़े मंसूबे

चारू कार्तिकेय | Updated on: 3 October 2016, 7:47 IST

बिहार हाईकोर्ट ने राज्य के शराबबंदी कानून को एक झटके में खारिज कर दिया है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राष्ट्रीय शराबबंदी अभियान के पहिए अचानक थम गए हैं.

कुमार, जो कि जदयू के अध्यक्ष भी हैं, शराबबंदी के मुद्दे पर अडिग दिखाई दे रहे थे. उन्होंने ‘शराबमुक्त’ व ‘आरएसएसमुक्त’ भारत के नारे को लेकर देशभर का दौरा भी शुरू कर दिया था. अब यदि नीतीश इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बना पाते हैं तो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जागरुकता लाकर एक राष्ट्रीय विकल्प बनाने की उनकी रणनीति की हवा निकल जाएगी.

कमियां

एक रोचक तथ्य यह है कि कोर्ट ने नीतीश कुमार को राहत की एक खिड़की भी दिखा दी है. हालांकि यह कोर्ट के सामने विचारणीय विषयों में नहीं था. शराबबंदी को अधिक उत्साह के साथ लागू करने के लिए नीतीश सरकार ने हाल ही में ज्यादा कड़ा कानून बिहार एक्साइज एंड प्रोहिबिशन एक्ट, 2016 लागू किया था.

राज्य में शराबबंदी को औपचारिक वैधानिक आवरण प्रदान करने वाले इस अधिनियम को विधानसभा ने पारित कर दिया था और उस पर राज्यपाल की मुहर भी लग चुकी है. तीस सितम्बर को अदालत के आदेश के तत्काल बाद बिहार सरकार ने घोषणा कर दी कि वह इस अधिनियम को लेकर दो अक्टूबर को अधिसूचना जारी कर देगी.

जदयू का तर्क है कि हाइकोर्ट के न्यायाधीशों ने आदेश देते समय, अधिनियम के कठोर प्रावधानों के प्रति अपनी असहमति व्यक्त की है, लेकिन अधिनियम के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है, इसलिए सरकार को इस अधिनियम के बारे में अधिसूचना जारी करने का पूरा अधिकार है. यदि ऐसा होता है तो बिहार में शराबबंदी फिर लागू हो जाएगी और वह भी अधिक ताकत के साथ.

इसके साथ ही, कुमार ने दो अक्टूबर को मंत्रिमंडल की आपात बैठक भी बुलाई है जिसमें निर्णय की अनुपालना के लिए अन्य कदमों पर विचार किया जाएगा. इस बैठक में हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील के बारे में भी विचार किया जा सकता है.

जदयू शराबबंदी के प्रति अपनी वचनबद्धता को छिपा नहीं रही है, और साफ तौर पर यह जता रही है कि वह रुकने वाली नहीं है. अदालत का आदेश आने के तत्काल बाद पार्टी का वक्तव्य भी इस बात का पर्याप्त संकेत है.

उद्देश्य के लिए रैलियां

कुमार ने पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को समूचे राज्य में, सभी पंचायतों में रैलियां निकालने का भी आदेश दिया है, ताकि लोगों तक संदेश पहुंचाया जा सके कि पार्टी शराबबंदी के प्रति अपनी वचनबद्धता पर कायम है.

बिहार की महिलाएं हाईकोर्ट के आदेश पर पहले ही व्यथित हैं और यदि कोई इन महिलाओं से बात करे तो उसे कुमार के इस राजनीतिक कदम का अंदाजा हो सकता है. वोटरों के इसी समूह को रिझाने के लिए कुमार ने शराबमुक्त बिहार का सपना बेचा था जो उनकी जिन्दगियों में शांति और समृद्धि लाने वाला था.

कुमार ने तत्काल महसूस कर लिया था कि ये लोग अब नाराज हो जाएंगे और उनकी सोच सही है. हाईकोर्ट के आदेश से चकित कई महिलाओं को यह कहते सुना गया कि अदालत ने एसा क्यों किया.

इस सवाल के पीछे राज्य के अधिकांश हिस्सों में शराबबंदी से पहले जैसे हालात की वापसी की आशंकाएं काम कर रही हैं. लोगों का मानना है कि उन दिनों शराब पीना काफी आम था और ये शराबी अपने परिवार की आमदनी शराब में गंवा देते थे.

ऐसे लोगों के बारे में अक्सर ऐसी कहानियां सुनने में आती थीं कि वे शराब पीकर, नशे की हालत में घर आते हैं, मारपीट करते हैं और माहौल खराब करते हैं. नीतीश का मानना है कि इसी मतदाता वर्ग ने सत्ता वापसी में उनकी बड़ी मदद की है और उनके बीच अपनी इस जगह को वे खोना नहीं चाहते.

एक बड़ी योजना

शराबबंदी में नीतीश को राष्ट्रव्यापी आंदोलन की संभावनाएं भी दिखाई देती हैं. उन्हें लगता है कि इस रास्ते से वे आगामी लोकसभा चुनावों के पहले तक राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनीतिक विकल्प खड़ा कर कते हैं. वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने प्रभावी चुनौती के रूप में उभरने की योजना बना रहे हैं और समझते हैं कि शराबबंदी का आंदोलन उन्हें इस मुकाम तक पहुंचने में मदद कर सकता है.

हाईकोर्ट के निर्णय को लेकर जदयू की ताजा प्रतिक्रिया इस बात की सूचक है कि वे बिहार को मोदी के गृहराज्य के समानांतर पेश करने पर भी विचार कर रहे हैं, जहां शराबबंदी पिछले करीब एक दशक से लागू है. जदयू के अनुसार, बिहार इससे कुछ बेहतर करना चाहता है.

इस आक्रामक मुद्रा से संकेत मिलता है कि नीतीश बिहार में शराबबंदी को सख्ती से लागू करने के अपने प्रयासों को किसी को भी तरह विफल नहीं करने देंगे, क्योंकि इसमें न केवल मुख्यमंत्री के रूप में उनकी प्रतिष्ठा, बल्कि प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना भी दांव पर लगा है.

First published: 3 October 2016, 7:47 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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