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पैसे की किल्लत में फंसे स्वदेशी पनडुब्बी निर्माण से जुड़े दो शिपयार्ड

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 5 May 2016, 8:22 IST

2015 में नौकरशाहों और भारतीय नौसेेना के अधिकारियों द्वारा प्रोजेक्ट 75 के लिए निजी क्षेत्र के चार शिपयार्ड का चयन किया गया था. प्रोजेक्ट 75 के तहत भारत अगली पीढ़ी के स्वदेशी पनडुब्बी का निर्माण कर रहा है. अब दो निजी शिपयार्ड को पनडुब्बी बनाने में समस्या हो रही है. इन दोनों शिपयार्ड का दावा है कि उनके पास पनडुब्बी निर्माण के बुनियादी ढांचे में निवेश करने के लिए पैसे की कमी है.

यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि ना तो अनिल धीरूभााई अंबानी समूह (एडीएजी) की पीपावाव और ना ही लार्सन एंड टर्बो के पास आधारभूत संरचना के लिए जरूरी दो से तीन हजार करोड़ रुपये हैं. सूत्रों के मुताबिक दोनों कंपनियां निजी तौर पर कह रही है कि वे तभी पैसा लगाएंगे जब उन्हें परंपरागत पनडुब्बी बनाने का ठेका मिल जाएगा.

एडीएजी के केस में सूत्रों का कहना है कि कंपनी पहले ही कर्जों से दबी हुई है और अधिक ऋण जुटाने में उसे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

भारत के 'प्रोजेक्‍ट 75' का हाल उतना अच्‍छा नहीं है और यह परियोजना अपने तय समय से पीछे चल रही

अब दोनों शिपयार्ड पर रक्षा मंत्रालय की नजर है. बहुत संभव है कि दोनों पनडुब्बी निर्माण के अवसर से चूक जाएं.

जिस गति से भारत के पड़ोसी अपने पनडुब्‍बी कार्यक्रम का उन्‍नयन कर रहे थे, उसी को ध्‍यान में रखते हुए भारत की सुरक्षा मामलों पर कैबिनेट समिति ने 1998 के आरंभ में देसी पनडुब्‍बी के निर्माण के लिए 30 साल तक की एक परियोजना को मंजूरी दी थी. परियोजना के अनुसार 2028 तक 24 परंपरागत पनडुब्बी का निर्माण किया जाना है. प्रोजेक्‍ट 75 इसी कार्यकम का हिस्‍सा है और इसके तहत छह स्‍कॉर्पीन पनडुब्बी का निर्माण किया जा रहा है.

पढ़ें:भारत की पहली स्‍कॉर्पीन पनडुब्‍बी नौसेना में शामिल होने के लिए तैयार

ये सभी छह पनडुब्बियां मौजूदा सबसे उन्नत और स्टेट ऑफ द आर्ट तकनीक से लैस हैं. इनमें नवीनतम एंटीशिप लैंड अटैक मिसाइलें लगी हुए हैं जो सीधे वर्टिकल  लांच की जा सकती हैं. इनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्‍शन (एआईपी) सिस्‍टम जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी लगी हुई है जो यह सुनिश्चित करती है कि पनडुब्‍बी लंबे समय तक पानी के नीचे छिपी रहकर वार कर सके. इसका मतलब यह है कि यह नाभिकीय पनडुब्बी की तरह ही पानी के नीचे काफी वक्त तक बनी रह सकती है. यह बहुत कम आवाज भी करती हैं.

इंडियन मेरीटाइम फाउंडेशन के उपाध्यक्ष और रिटायर्ड कप्तान अनिल जय सिंह कहते हैं, 'दोनों तरफ से देखें तो मुझे लगता है कि इसमें मेक इन इंडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होगी. डीआरडीओ एआईपी से जुड़ी समस्याएं सुलझाने के लिए तैयार हैं. ऐसे संकेत हैं कि इस साल सितंबर तक एआईपी तकनीक को और उन्नत कर लिया जाएगा.'

सिंह बताते हैं, 'पनडुब्बी में भारतीय में निर्मित मिसाइलों को लगाने की तैयारी की जा रही है. ब्रह्मोस एयरोस्पेस जमीन से लंबी दूरी तक मार करने वाले मिसाइल का निर्माण कर रहे हैं.'

पनडुब्बी परियोजना के अनुसार 2028 तक 24 परंपरागत पनडुब्बी का निर्माण किया जाना है

भारत के 'प्रोजेक्‍ट 75' का हाल हालांकि उतना अच्‍छा नहीं है. यह परियोजना अपने तय समय से पीछे चल रही है. वर्तमान में समस्या रणनीतिक साझीदारों की पहचान करने की है. डिफेन्स प्रोक्योरमेंट पॉलिसी के तहत सामरिक साझीदारों के चयन के बाद भी इसे डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) और रक्षा मामलों की स्थायी संसदीय समिति (सीसीएस) से मंजूरी लेनी होगी.

भारतीय नौसेना फिलहाल 13 परंपरागत और पुरानी हो चुकी पनडुब्बियों के सहारे अपना काम चला रही है जिनमें दस 1990 से पहले के बैच की हैं. इसके अलावा एक नाभिकीय ऊर्जा चालित एसएसएन अकुला-2 पनडुब्‍बी है जो रूस से किराये पर ली गई है.

First published: 5 May 2016, 8:22 IST
 
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