Home » इंडिया » Projects like Metro can't be placed in the hands of babus: E Sreedharan
 

ई श्रीधरन: बुलेट ट्रेन से ज्यादा जरूरी है रेल यात्राओं को सुरक्षित बनाना

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 16 August 2016, 6:57 IST
QUICK PILL
  • ई श्रीधरन दिल्ली मेट्रो और कोंकण रेलवे के समानार्थी शब्द हैं. उन्होंने इन दोनों बड़ी परियोजनाओं को समय से पहले पूरा किया और इस दौरान कोई भ्रष्टाचार सामने नहीं आया. श्रीधरन एक बार फिर से मिशन मोड में हैं.
  • 84 साल की उम्र में श्रीधरन दिल्ली मेट्रो कॉरपोरेशन के कोच्चि मेट्रो प्रोजेक्ट के मुख्य सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं. वह पांच मुद्दों पर देश को जगाने का काम कर रहे हैं. श्रीधरन प्रशासन, पुलिस, चुनावी सुधार, साफ सफाई औैर मूल्य आधारित शिक्षा पद्धति को लेकर  देशवासियों को जगाने का काम कर रहे हैं.

ई श्रीधरन दिल्ली मेट्रो और कोंकण रेलवे के समानार्थी शब्द हैं. उन्होंने इन दोनों बड़ी परियोजनाओं को समय से पहले पूरा किया और इस दौरान एक रुपये का भ्रष्टाचार सामने नहीं आया. श्रीधरन एक बार फिर से मिशन मोड में हैं.

84 साल की उम्र में श्रीधरन दिल्ली मेट्रो कॉरपोरेशन के कोच्चि मेट्रो प्रोजेक्ट के मुख्य सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं. वह पांच मुद्दों पर देश को जगाने का काम कर रहे हैं. 

श्रीधरन प्रशासन, पुलिस, चुनावी सुधार, साफ सफाई औैर मूल्य आधारित शिक्षा पद्धति को लेकर  देशवासियों को जगाने का काम कर रहे हैं. उन्होंने इस मांग को आगे बढ़ाने के लिए फाउंडेशन फॉर रेस्टोरेशन ऑफ नेशनल वैल्यूज नाम के एक एनजीओ की स्थापना की है. एनजीओ का मुख्यालय दिल्ली में हैं और उन्होंने हाल ही में इसकी दो शाखाएं केरल और कर्नाटक में खोली हैं. वह कहते हैं, 'हमें सिस्टम को साफ करने की जरूरत है और अपने लोगों को बेहतर शिक्षा देने की जरूरत है.'

साक्षात्कार के प्रमुख अंश:

दिल्ली मेट्रो शायद एकमात्र ऐसी परियोजना है जिसे बिना किसी भ्रष्टाचार और पूरी क्षमता के साथ पूरा किया गया. आप यह करने में कैसे सफल रहे और दूसरी ऐसी परियोजनाओं को संभाल रहे लोगों के लिए क्या सबक होना चाहिए?

हालांकि दिल्ली मेट्रो की स्थापना सरकारी कंपनी के तौर पर हुई लेकिन मैंने इसकी काम काज की शैली बिलकुल अलग रखी क्योंंकि यह मेरी एकमात्र शर्त थी. मैंने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए काम करने की आजादी की शर्त की मांग रखी थी. 

इसलिए मैं एक बेहतर संगठन बनाने में सफल रहा जो तेजी में फैसले लेता था और जिसके अपने मूल्य थे. सबसे अहम था फैसले लेना, शक्तियों का बंटवारा और काम करने की संस्कृति.

तो फिर ऐसी ही परियोजनाओं को संभाल रहे अन्य नौकरशाहों के लिए क्या सबक होना चाहिए?

अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि एक नौकरशाह ऐसी परियोजनाओं के लिए सही व्यक्ति नहीं है. 

ऐसी परियोजनाओं की जिम्मेदारी टेक्नोक्रेट को देनी चाहिए जो इससे जुड़े तकनीकी फैसले ले सकें. नौकरशाह ऐसे फैसले नहीं ले पाते क्योेंकि उन्हें इसके लिए किसी और पर निर्भर होना पड़ता है. दूसरा अधिकारी फैसले नहीं  ले पाता क्योंकि उसे पूरा भरोसा नहीं होता और साथ ही उसे अपने बड़े अधिकारियों को समर्थन नहीं मिल पाता.

इसलिए ऐसी परियोजनाओं की जिम्मेदारी वास्तव में  एक बेहतर टेक्नोक्रेट को दी जानी चाहिए, जिसे इस तरह के काम का अनुभव हो. लेकिन अब राज्य सरकारें किसी ऐसे व्यक्ति को जिम्मेदारी दे देती हैं जिसके पास पहले से ही कई तरह की जिम्मेदारियां होती हैं. और वह व्यक्ति भी कम समय के लिए ही परियोजना का प्रभारी होता है.

भारतीय रेलवे बहुत बुरी तरह से सरकार की सब्सिडी पर निर्भर है. इसे कैसे व्यावहारिक ईकाई बनाया जा सकता है?

ऐसा भी नहीं है. यह ब्रेक ईवन में आनेे की क्षमता रखता है. सरकार क्या दे रही है? वास्तव में यह दूसरा तरीका है. रेलवे सरकार को लाभांश दे रहा है. ऐसा क्यों होना चाहिए यह मुझे समझ में नहीं आता. एक फैसले से इसे खत्म किया जा सकता है और रेलवे एक झटके में कम से 10,000 करोड़ रुपये से धनी हो जाएगी.

जरूरत राजस्व बढ़ाने की है. हमें किराया बढ़ाना चाहिए. इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिए. रेलवे को सब्सिडी पर क्यों चलाया जाना चहिए. उन्हें वास्तविक लागत वसूल करनी चाहिए. मैं लगातार रेल मंत्रियों से सेकेंड क्लास के किराए बढ़ाने के बारे में कहता रहा हूं और इससे 95 फीसदी राजस्व आएगा.

अगर वह किराए में 25 फीसदी तक की बढ़ोतरी करते हैं तो इससे 35,000 से 40,000 करोड़ रुपये तक का राजस्व आएगा. इसे चरणबद्ध तरीके से किया जा सकता है. कोई भी निजी कंपनी रेलवे में निवेश करना नहीं चाहती क्योंकि रेलवे का कोई प्रोजेक्ट 10 से 12 फीसदी तक का भी रिटर्न नहीं देता. हमें राजस्व बढ़ाने की कोशिश करना चाहिए.

फ्रेट सेक्टर में रेलवे को सड़क की वजह से भारी नुकसान हो रहा है. समानों की ढुलाई में रेलवे के वर्चस्व को कैसे बनाया जा सकता है?

सबसे बड़ी गलती यह है कि हमने रेलवे को बल्क कैरियर बना दिया है. जैसे अनाज, कोयला और लौह अयस्क की ढुलाई. छोटे समानों की ढुलाई रेलवे से नहीं होती है. अगर कोई 2 या 3 वैगन चाहता है तो उसे इसकी बुकिंग नहीं मिलेगी. उनके पास एक सिस्टम होना चाहिए जिससे छोटी मात्रा में सामानों की ढुलाई हो सके.

मैंने एक योजना का सुझाव दिया था जिसके तहत दिल्ली से चेन्नई हफ्ते में एक बार ट्रेन जानी थी. इससे छोटे सामानों को भेजा जाना था. लेकिन उन्होंने इस योजना को लागू नहीं किया.

बुलेट ट्रेन पर आपका क्या विचार है?

बुलेट ट्रेन में बड़ी मात्रा में पूंजी का निवेश होना है. साथ ही हमारे पास टेक्नोलॉजी नहीं है. हमारा देश बड़ा है और इसमें लोग लंबी दूरी तय करते हैं. लेकिन यह आज प्राथमिकता नहीं है. प्राथमिकता मौजूदा सिस्टम को सुरक्षित बनाने की है. अगर आज आपको एक टिकट खरीदना है तो आपको काफी समय खर्च करना होता है. इसलिए हमें क्षमता निर्माण पर ध्यान देना होगा ताकि मांग बढ़ाई जा सके.

एक प्रस्ताव रेलवे बजट को खत्म करने का है. आप इसे सही कदम मानते हैं?

यह बेहद बुरा और बेवकूफी भरा विचार है. रेलवे को फिर पूरी तरह से सरकार पर निर्भर होना पड़ेगा. वह बाहर से पैसे नहीं जुटा पाएंगे क्योंकि यह एक सरकारी विभाग बन जाएगा.

सरकार का कोई विभाग पैसे नहीं जुटा सकता. यह काम केवल सरकार कर सकती है. आज रेलवे एलआईसी से पैसे जुटा रहा है. यह सभी स्रोत तत्काल खत्म हो जाएंगे. रेलवे पूरी तरह से फंड के लिए सरकार पर निर्भर हो जाएगा. दूसरा रेलवे नौकरशाही ढांचा बनकर रह जाएगा.

नीति आयोग का यह विचार पूरी तरह से बेवकूफाना है. मैं प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस विचार को लागू नहीं करने की अपील करूंगा. 

First published: 16 August 2016, 6:57 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी