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प्रणब सेन: 'मच्छर मारने के लिए तोप का गोला दागा गया है'

श्रिया मोहन | Updated on: 19 November 2016, 7:45 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • भारतीय सांख्यिकी संस्थान का अनुमान है कि हमारी अर्थव्यवस्था में महज चार सौ करोड़ का कालाधन बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन जब यही आतंक का मददगार बनता है तो उसे और मजबूत बना देता है. 
  • वहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वव़िद्यालय के प्रो.अरूण कुमार का अनुमान है कि केवल तीन फीसदी कालाधन नकदी में है शेष अवैध संपत्तियों के रूप में है. 

विमुद्रीकरण (नोटबंदी) की कार्रवाई घनी आबादी में चतुराई तलाशना जैसा है. मगर इसके लिए कितनी मानवीय और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए कैच न्यूज़ ने भारत के पहले सांख्यिकीविद प्रणब सेन से लंबी बात की. योजना आयोग के पूर्व सलाहकार और भारत में अन्तररार्ष्ट्रीय विकास केन्द्र के निदेशक सेन महसूस करते हैं कि देश के किसानों और ग़रीबों के लिए यह कदम विनाशकारी साबित होगा.

साक्षात्कार

अर्थशास्त्री के तौर पर आपका अनुमान है कि विमुद्रीकरण से अर्थव्यवस्था में 86 फीसदी मुद्रा आपूर्ति को झटका लगेगा. अल्पावधि में इसके क्या नुकसान हैं?

हमारे आर्थिक लेन-देन की कड़ी में तीन चौथाई हिस्सा चाहे वह कच्चा माल खरीदने वाला निर्माता हो, निर्माता से ख़रीदारी करने वाला थोक विक्रेता हो या फिर विक्रेता से लेन-देन करने वाला खुदरा ग्राहक हो, नकदी में है. विमुद्रीकरण इस नगदी के 86 फीसदी हिस्से को सीधेतौर पर प्रभावित कर रहा है. मतलब कि इस अर्थव्यवस्था में सभी तरह के लेन-देन के 65 फ़ीसदी हिस्से को पंगु बना रहा है जोकि मज़ाक नहीं है. 

सरकार के फैसले के 9 दिन बाद इससे रोजाना हो रहे नुकसान मालूम हो सकते हैं? उदाहरण के तौर पर सकल घरेलू उत्पाद पर क्या असर पड़ रहा है?

हम ठीक-ठीक तो नहीं बता सकते. यह इस पर निर्भर है कि लोग अपने पैसे का क्या कर रहे हैं? अगर बैंक से निकाली गई रकम मैं तुरंत खर्च कर देता हूं तो यह अर्थव्यवस्था के लिए कम नुकसानदायक है और अगर मैं इसे दबा कर बैठ जाता हूं तो ज्यादा नुकसान होगा. 

ऐसे अनिश्चितता के माहौल में लोग जरूर पैसा रोक लेंगे और बड़ी मात्रा में अपने घरों में काफी नकदी जमा कर लेंगे. 

यह स्वाभाविक है. अधिकांश लोग अपनी रोज़मर्रे की जरूरतों में कटौती कर मुसीबत के समय काम आने वाला धन जमा कर लेंगे. अगर मुद्रा का प्रवाह रुक गया तो श्रृंखला सूख जाएगी. रोजाना कितना नुकसान हो रहा है अभी यह पता लगाना कठिन है क्योंकि हम यह नहीं जानते कि लोग पैसे का क्या कर रहे हैं? 

मोटे तौर पर यह मान लें कि वे धन संग्रह नहीं कर रहे हैं तो मेरे अनुमान के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में विकास दर में 0.3 से 0.4 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. अगर यह 7.6 से 7.7 की बजाय 7.1 से 7.2 के बीच रहती है तो बड़ा नुकसान होगा. इसका खमियाजा ज्यादातर गरीबों और कृषि क्षेत्र को उठाना पड़ेगा.

क्या आप सोचते हैं कि 50 दिन के सरकारी वादे के विपरीत हम इस कार्रवाई के असर से डगमगा जाएंगे?

लोग अभी यह हिसाब लगा रहे हैं कि कितनी नकदी छप सकती है. इसमें 50 दिन नहीं करीब तीन महीने लग जाएंगे. इसलिए इसका असर भी लंबा चलेगा. 

कुछ अर्थशास्त्री इस फैसले की तुलना अमरीका को वर्ष 1930 में पहुंचे तीव्र आघात से कर रहे हैं. क्या यह डर उचित है?

यह संभवत: भय उत्पन्न करने के नजरिए से सोचा जा रहा हो. अमरीका में इस तरह का विमुद्रीकरण का दौर तीन साल तक चला. सरकार ने जितना जल्दी हो सके, नोट बदलने के प्रयास किए. लेकिन अपने यहां नई नकदी की भौतिक उपलब्धता और उसे सिस्टम में डालने की प्रक्रिया धीमी है. असली चिंता कृषि पर दूरगामी असर पड़ने की है. अगर रबी की बुआई प्रभावित हुई तो इसके दूरगामी घातक परिणाम होंगे. ऐसे में जब आपूर्ति सुचारू नहीं हो तो वस्तु विनिमय प्रणाली भी नहीं चल सकती.

तब आप क्या अंदाज लगाते हैं?

यह मानसून फेल होने से भी बदतर है. क्योंकि मानसून के धोखा दे जाने पर गरीब अगली फसल तक अपना काम चलाने के लिए औरों से उधार ले लेंगे लेकिन आज वे ऐसा नहीं कर सकते. रबी की बुआई बर्बाद होने की कीमत इंसान को चुकानी पड़ सकती है. किसान अवसाद में आकर खुदकशी कर सकते हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देशभक्ति परखने की मंशा से इस फैसले के लिए जन समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. क्या आप सोचते हैं कि इस तरह अर्थतंत्र और नैतिकता को परस्पर जोड़ना बेतुका है?

यह पूरी तरह असंगत है. नैतिकता और सदाचार अच्छी बात है, होना भी चाहिए लेकिन विशेष मामले में इन्हें परिभाषित करना गलत है. 

क्या आप सोचते हैं, काले धन की सफाई के लिए इससे कम नुकसानदायक तरीका, मेरा मतलब है इंसान की कीमत पर और नहीं हो सकता था?

हां वे इसके लिए पुराने नोटों को 31 दिसंबर से अमान्य कर ऐसा कदम उठा सकते थे. इससे लेन-देन भी जारी रहता और पुरानी मुद्रा के चरणबद्ध बाहर निकलने को पूरा समय मिल जाता. साथ ही, नई मुद्रा भी तब तक प्रचलन में आ जाती.

लेकिन कालेधन के जमाखोरों का क्या होता?

इसे जैसे चाहें उपयोग करें? इसे परिसंपत्तियां खरीदने में खर्च कर सकते हैं जैसा कि वे अब भी कर रहे हैं. अभी हमने मान लिया है कि पुराने बड़े नोट 31 दिसंबर तक वैध हैं. यह सोचना कि लोगों को अपना पैसा खर्च करने के लिए ज्यादा समय मिले. निसंदेह यह मान लेना है कि पुराने नोट लेने वाला बुद्धू है. जब उसे मालूम है कि यह जल्दी ही प्रचलन से बाहर हो जाएगी तो वह उसे क्यों लेगा. छोटी रकम को हां, बड़ी को ना. अंतत: बड़ी तादात में कालाधन निष्प्रभावी हो जाएगा.

अर्थव्यवस्था से कालेधन की सफाई के लिए क्या विमुद्रीकरण ही एकमात्र तरीका है?

जाली मुद्रा से निपटने के लिए विश्व भर में विमुद्रीकरण किया जाता रहा है. जालसाजी से बचने के लिए यही तरीका अपनाया जा सकता है. प्राय: कराधान अधिकारी अपनी जांच-पड़ताल से कालेधन से निपट सकते हैं.

मगर भारत के लिए बड़ी समस्या क्या है? जाली मुद्रा या कालाधन!

यह कई बातों पर निर्भर करता है. जाली मुद्रा से पनप रहे आतंकवाद की समस्या खत्म करनी होगी. भारतीय सांख्यिकी संस्थान का अनुमान है कि हमारी अर्थव्यवस्था में महज चार सौ करोड़ का कालाधन बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन जब यही आतंक का मददगार बनता है तो उसे और मजबूत बना देता है. देश में कालाधन भी है और काली संपत्तियां भी हैं. 

जवाहरलाल नेहरू विश्वव़िद्यालय के प्रो.अरूण कुमार का अनुमान है कि केवल तीन फीसदी कालाधन नकदी में है शेष अवैध संपत्तियों के रूप में. सो बेनामी संपत्ति के लिए अन्य सुधारों की बात अच्छी पहल है. कालेधन के स्रोतों का पता लगाने के लिए विधि विज्ञान अंकेक्षण का तरीका अपनाना आज की परम आवश्यकता है. मेरे विचार में यह मच्छर को मारने के लिए तोप चलाना होगा.

इस तरह जैसा कि आप कह रहे हैं, स्विस और पनामा खातों में कालाधन रखने वालों से नहीं निपटा जा सकता तो इसका और क्या उपाय हो सकता है? 

नहीं, उन्हें छुओ मत. सख्त कार्रवाई से अवैध रकम रखने वालों को दंडित करो. आयकर विभाग का अनुमान है कि ऐसा कालाधन 6 प्रतिशत हो सकता है जबकि अरूण कुमार 3 प्रतिशत ही मानते हैं. इसमें ज्यादा फर्क नहीं है.

क्या आप इसे राजनीतिक हमला मानते हैं?

इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा विमुद्रीकरण को व्यापक समर्थन मिलने से बहुत खुश है. अगर कल चुनाव कराए जाते हैं तो यह उसके लिए अचूक अस्त्र साबित होगा लेकिन कुछ राज्यों में चुनाव तीन माह बाद होने वाले हैं. तब तक लोगों को काफी ठेस पहुंच चुकी होगी. अभी मिल रहा ऐसा जन समर्थन तब कहीं प्रतिधातक न बन जाए!   

First published: 19 November 2016, 7:45 IST
 
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