Home » इंडिया » Catch Hindi: proposed kumbh in Kashmir is creating rift in valley
 

क्या है कश्मीर में महाकुंभ और अभिनवगुप्त यात्रा की कवायद?

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 June 2016, 22:56 IST
(कैच)

कश्मीर में महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है. ये आयोजन राज्य के गंदरबल जिले में 14 जून को झेलम और सिंधु नदी के संगम पर होगा. इसी के साथ बड़गाम जिले के बीरवाह स्थित अभिनवगुप्त गुफा की यात्रा भी प्रस्तावित है. झेलम को कश्मीर में वितस्ता भी कहते हैं.

इन दोनों कार्यक्रमों से कश्मीर घाटी में गहरी हलचल है. स्थानीय नागरिकों को लग रहा है कि पहले सैनिकों और कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कॉलोनियां और अब ये यात्राएं घाटी के 'मुस्लिम चरित्र में परिवर्तन करने और जनसंख्या के अनुपात को बदलने की कोशिश' का हिस्सा है.

अलगाववादियों की 'चहेती' महबूबा को आने लगा है भारत पर 'प्यार'

महाकुंभ का आयोजक आयोजन कर रही महाकुंभ उत्सव समिति के संयोजक डॉक्टर एके कौल के अनुसार 75 साल से इसका आयोजन हो रहा है. उनके अनुसार आखिरी कुंभ 4 जून 1941 को हुआ था जिसमें पूरे भारत से लाखों हिन्दू शामिल हुए थे.

कौल कहते हैं, "भारत और पाकिस्तान दोनों जगहों से श्रद्धालु आए थे. कराची, लाहौर, गुजरात, दिल्ली और चेन्नई से भी लोग आए थे."

उस कुंभ में एक दुखद हादसा भी हुआ था. कौल बताते हैं, "टिक्कू परिवार के सात सदस्य झेलम-सिंधु के संगम में बह गए थे. उनके शव भी नहीं मिले." संगम स्थल पर एक चिनार है जिसके नीचे शिवलिंग भी है. श्रद्धालु नाव से वहां पूजा करने जाते हैं. ये परिवार शिव लिंग का ही दर्शन करने जा रहा था.

नेहरू और शम्मी कपूर की वसीयत

कौल को उम्मीद है कि इस साल कुंभ में हजारों लोग शामिल होंगे. उनका मानना है कि इस आयोजन में शामिल होने के लिए बड़ मात्रा में कश्मीरी पंडित भी आएंगे जो पास के गांव में होने वाले खीर भवानी मंदिर उत्सव में शामिल होने के लिए आए थे.

कौल कहते हैं, "भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अभिनेता शम्मी कपूर की अस्थियां उनकी वसीयत के अनुसार झेलम-सिंधु के संगम में भी बहाई गई थीं."

कश्मीरी पंडितों की घर वापसी पर फिर गर्म हुई घाटी की राजनीति

कुंभ के आयोजन के समानांतर ही 11 जून को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा संगठन शेषाद्री समारोह समिति आचार्य अभिनवगुप्त यात्रा का आयोजन कर रही है. अभिनवगुप्त गुफा राज्य के बड़गाम जिले के बीवाह में स्थित है.

इस यात्रा के संयोजक अजय भारती ने मीडिया से कहा, "हम गंदरबल स्थित खीर भवानी मंदिर में 10 जून को पूजा करके इस यात्रा की शुरुआत करेंगे. हम अभिनवगुप्त गुफा में पहुंचकर भी पूजा करेंगे."

भारती का दावा है कि समिति का पूरे भारत के विभिन्न संगठनों से गठबंधन है और इसके प्रमुख आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर हैं.

आरएसएस का बयान

इस साल की शुरुआत में आरएसएस ने दसवी शताब्दी के कश्मीरी शैव दार्शनिक अभिनवगुप्त पर  कार्यक्रम करने की घोषणा की थी. आरएसए जनरल सेक्रेटरी सुरेश (भैय्याजी जोशी) ने एक बयान जारी करके कहा था कि यात्रा के जरिए अभिनवगुप्त की आध्यात्मिक और साहित्यिक उपलब्धियों को याद किया जाएगा.

एक मुस्लिम संगठन के अनुसार आरएसएस जिसे अभिनवगुप्त की गुफा बता रही है उसका कोई ऐतिहासिक सुबूत नहीं है

इस बयान में कहा गया, "ये आचार्य अभिनवगुप्त को सच्ची श्रद्धांजलि होगी. जिससे कश्मीरी नौजवानों समेत पूरी दुनिया को प्रकाश मिलेगा."

यात्रा की घोषणा के तत्काल बाद बीरवाह की अंजुमन मजहरूल हक़ नामक संस्था ने धमकी दी कि वो इसके विरोध में सड़कों पर उतरेगी. संस्था के अनुसार उस गुफा का इस्तेमाल मुस्लिम संत मिया शाह साहब इबादत के लिए करते थे. और इस गुफा के अभिनवगुप्त से जुड़े होने का कोई ऐतिहासिक सुबूत नहीं है.

महबूबा मुफ्ती: कश्मीरी पंडितों को वापस लेकर आऊंगी 

अंजुमन के संरक्षक मौलाना सैयद अब्दुल लतीफ बुखारी ने श्रीनगर में मीडिया से कहा, "हमारी मांग है कि इस यात्रा को जबरदस्ती न थोपा जाए. अगर इसे फिर भी आयोजित किया जाएगा तो इससे परांपगत सामुदायिक भाईचारे को धक्का लग सकता है." 

बुखारी ने साल 2014 का अदालत का एक फैसला कोट किया जिसके अनुसार, "अभिनवगुप्त की कहानी ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है कि याची ने अपने मन से ये कहानी गढ़ ली है." 

हालांकि पर्यावरण कार्यकर्ता तनवीर अहमद ने गुफा के करीब होने वाली खुदाई को रोकने का आदेश जारी करने की अपील की. अहमद ने अदालत से कहा कि इस गुफा का हिंदुओं के लिए धार्मिक महत्व है.

मुस्लिम और सांस्कृतिक पहचान

इन दोनों कार्यक्रमों को लेकर घाटी में आंतरिक हलचल है. लोगों को लोग रहा है इसके पीछे केंद्र की बीजेपी सरकार की सोची-समझी योजना है.

2015 में कश्मीरी पंडितों के समूह ऑल इंडिया माइग्रेंट कोऑर्डिनेशन कमिटी ने कौसरनाग और गंगबल की यात्रा करने की घोषणा से घाटी में अशांति मच गई थी.

कौसरनाग की यात्रा पिछले पांच सालों से जम्मू के रास्ते होती थी लेकिन पंडित इस बार यात्रा कश्मीर के कुलगाम के रास्ते करना चाहते थे. विरोध के बाद राज्य सरकार ने इसकी अनुमति वापस ले ली. वहीं कश्मीरी पंडितों ने इसे अपने धार्मिक अधिकार का हनन बताया. जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया. 

ज्ञान का टापू: कश्मीर में खुली किताबों वाली कॉफी शॉप

सरकार द्वारा सेवानिवृत्त सैनिकों और कश्मीरी पंडितों के लिए अस्थाई आवास की योजना पर भी तीखी प्रतिक्रिया हुई. जिसके बाद राज्य सरकार ने आश्वासन दिया कि इन कॉलोनियों से राज्य को धारा 370 के तहत मिला विशेषाधिकार का उल्लंघन नहीं होगा. लेकिन इससे असंतुष्ट शांत नहीं हुए. 

हुर्रियत के चेयरमैन सैयद अली गिलानी ने कहा, "कश्मीरी भारतीयों या उनके धर्म के खिलाफ नहीं है लेकिन वो अपने अस्तित्व और मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हमने भारत से आने वाले यात्रियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों का हमेशा स्वागत किया है. लेकिन हम अपनी मुस्लिम और सांस्कृतिक पहचान से समझौता नहीं कर सकते."

First published: 10 June 2016, 22:56 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी