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जल्लीकट्टू का आयोजन लगभग तय, अध्यादेश को मिली मंज़ूरी

एस मुरारी | Updated on: 21 January 2017, 3:26 IST
(पीटीआई)

तमिलनाडु में पांच दिन से जारी विरोध प्रदर्शन के बादल अब छंटने लगे हैं. केंद्र सरकार ने तमिलनाडु सरकार के अध्यादेश मंजूरी दे दी है जिसके बाद राज्य में जल्लीकट्टू मनाए जाने का रास्ता साफ हो गया है. केंद्र सरकार ने इस अध्यादेश को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेज दिया है. यहां से मंज़री मिलने के बाद अध्यादेश तमिलनाडु के राज्यपाल विद्यासागर राव के पास भेजा जाएगा. राज्यपाल की मंज़ूरी मिलते ही राज्य में जलीकट्टू का आयोजन किया जा सकेगा. 

वहीं प्रदर्शनकारी अभी भी मैदान में डटे हुए हैं. वह कह रहे हैं कि जब तक राज्य में जल्लीकट्टू को मनाने की अनुमति नहीं मिल जाती और सुप्रीम कोर्ट द्वारा सांडों के इस खेल पर लगाए गए प्रतिबंध को नहीं हटाया जाता, तब तक प्रदर्शन जारी रहेगा. 

इससे पहले गुरुवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुलाकात में अध्यादेश लाने का आग्रह किया था ताकि जल्लीकट्टू का आयोजन कराया जा सके. 

मगर मोदी ने नई दिल्ली में पन्नीरसेल्वम के साथ हुई बैठक में कहा था कि इस संदर्भ में लाए गए अध्यादेश का वही हश्र होगा जो केन्द्र सरकार द्वारा 8 जनवरी 2016 को जारी अधिसूचना का हुआ था. इस अधिसूचना पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी.

इससे पहले कन्याकुमारी से भाजपा सांसद पी राधाकृष्णन, जो जहाजरानी, सड़क परिवहन, हाईवे मंत्रालय में राज्यमंत्री हैं, ने कहा था कि केन्द्र राज्य के लोगों की भावनाओं को समझता है, पर यह मामला सुप्रीम कोर्ट के पास विचाराधीन है. इस मामले में सावधानी के साथ आगे बढऩा होगा. वहीं मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम ने कहा है कि वह जलीकट्टू पर अध्यादेश लाकर इसका उद्घाटन करेंगे. 

जल्लीकट्टू

जल्लीकट्टू तमिलनाडु में पोंगल पर्व के दौरान सांडों को काबू में करने वाला खेल है. 2016 की अधिसूचना में सांड़ों को 'परफॉर्मिंग एनीमल्स' की सूची से हटा दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस एनवी रमन की दो सदस्यीय पीठ ने इस अधिसूचना पर रोक लगा दी थी. 

केन्द्र सरकार की अधिसूचना को पशु कल्याण बोर्ड सहित विभिन्न संगठनों ने याचिका दाखिल कर चुनौती दी थी. याचिका में तर्क दिया गया था कि पशुओं पर अत्याचार रोक अधिनियम-1960 की धारा 22 के अलावा पशुओं पर अत्याचार रोकने के लिए बने अन्य कानूनों के तहत इस अधिसूचना को निरस्त किया जाना चाहिए.

इस बीच, इसी महीने की शुरुआत में केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और तमिलनाडु सरकार द्वारा इसी पीठ में दाखिल याचिकाएं लम्बित पड़ी हुई हैं. उच्चतम न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया है. कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार द्वारा पिछले साल नवम्बर में दाखिल पुनर्विचार याचिका को भी खारिज कर दिया है.

रोक के खिलाफ तर्क

जल्लीकट्टू के पक्ष में प्रदर्शन करने वालों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने पेटा जैसे संगठनों के पशु अत्याचार को लेकर लगाए गए अतिरंजित आरोप के चलते रोक लगाई है. यही वजह है कि जल्लीकट्टू खेल को हर जगह प्रतिबंधित कर दिया गया है. और अब शीर्षस्थ कोर्ट इस पर पुनर्विचार करने से भी इनकार कर रही है. 

उधर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्केण्डेय काटजू का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लम्बित रहने से अध्यादेश लाने पर कोई रोक नहीं है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को लिखे पत्र में जस्टिस काटजू ने लिखा है कि इस तरह के मामलों में संतुलन बरता जाना चाहिए. पशुओं को मनुष्य की तरह से नहीं रखा जा सकता.

उदाहरण के लिए, मछली को लीजिए. मछली को पानी से निकालते ही वह मर जाती है. वह हवा में सांस नहीं ले सकती. क्या यह मछली के प्रति अत्याचार नहीं है? और क्या ऐसे में मछली को मारने और उसे खाने पर रोक लगा दी जानी चाहिए? बैलों को बैलगाड़ी में जोता जाता है. क्या बैलगाड़ी पर भी रोक लगा दी जानी चाहिए? क्या हलाल मांस को भी प्रतिबंधित करना चाहिए?

आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर का कहना है कि जल्लीकट्टू तमिल संस्कृति का अहम भाग है. ठीक उसी तरह का जैसे कि सूमो पहलवानों की कुश्ती जापानी संस्कृति का अंग है. पशु अत्याचार के नाम पर इसे रोकना ठीक नहीं है. इसके विपरीत तो पशु तमिल संस्कृति में पूज्य हैं.

क्या प्रदर्शन शांतिपूर्ण रह पाएगा

हजारों छात्र चेन्नई के मरीना बीच, मदुराई के तमुक्कम मैदान के साथ ही कोयम्बूटर और इरोड में प्रदर्शन कर रहे हैं. अब ये युवा शोल मीडिया पर भी एकजुट हो रहे हैं कि ताकि वाट्सएप जैसे प्लेटफार्म के जरिए जनता का ध्यान आकर्षित कराया जा सके. जल्लीकट्टू पर लोगों की भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा है.

इरोड के एक सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि धन्यवाद है पेटा और सुप्रीम कोर्ट को, यहां तक कि पश्चिमी तमिलनाडु के लोगों ने भी आंदोलनकारियों के पक्ष में रैली निकाली है. जल्लीकट्टी को लेकर इन क्षेत्रों में पहले रैलियां बहुत कम निकलती थीं और यह केवल मदुराई के निकट अलंगनुल्लूर तक ही केन्द्रित रहती थीं.

मदुराई में पिछले चार दिनों से प्रदर्शन करने वाले एक अन्य कार्यकर्ता का कहना है कि उन्होंने अपने साथी प्रदर्शनकारियों के लिए निकट के गांव से खाना और पानी का इंतजाम किया हुआ है. चेन्नई में भी ऐसे ही हाल हैं. यहां भी कार्यकर्ता मरीना बीच पर प्रदर्शनकारियों के लिए खाना-पानी पहुंचा रहे हैं.

तमिलनाडु के जागरूक और शिक्षित छात्र, जिनकी पहचान शालीन युवकों के रूप में आमतौर पर है, वे अभी तक अपना प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखे हैं. अनुशासित प्रदर्शनकारियों को पी. राधाकृष्णन जैसे ख्यातिलब्ध लोगों का व्यापक समर्थन मिला हुआ है. सलेम में कुछ युवकों ने ट्रेने रोक दी थीं लेकिन जब एक एम्बुलेंस आई तो उन्होंने रेलवे क्रासिंग खोल दी.

शुक्रवार बंद

पूरे तमिलनाडु में शुक्रवार को बंद किया गया है. व्यापारिक संगठनों ने अपनी दुकानें नहीं खोलीं, परिवहन से जुड़े संगठनों ने बसें नहीं चलाई. वहीं सरकार किसी भी तरह के बंद में हिस्सा नहीं ले सकती. लिहाज़ा, वह एआईएडीएमके यूनियन से जुड़े परिवहन कर्मचारियों के सहयोग से जरूरी कामों के लिए बस संचालन में मदद कर रही है. सिनेमा हॉल भी बंद रखे गए और किसी भी फिल्म की शूटिंग नहीं हुई.

First published: 21 January 2017, 3:26 IST
 
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