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इन 'चिरइया' की उड़ान और आसमान अभी बाकी है

अमित कुमार बाजपेयी | Updated on: 25 June 2016, 14:59 IST
(अमित कुमार बाजपेयी/कैचहिंदी)

चाहे लाख लगा दो अड़चनें मेरी राहों में, मैं 'चिरइया' हूं उड़ूंगी खुले आसमान में... 14 साल की काजल अपनी नीली आंखों में सुनहरे भविष्य के कुछ ऐसे ही ख्वाब संजोए हुए है. वो चाहती है कि खूब पढ़ लिखकर अपने पैरो पर खड़ी हों और अपने परिवार-गांव के लिए कुछ कर सके. काजल के साथ ही सुजाता, निधि, ललिता, रुबीना, प्रीति, नैंसी समेत 30 किशोरियां भी अपनी आंखों में ऐसे ही तमाम सपने पाले हुए हैं.

देश की राजधानी दिल्ली से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर है उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर की विधानसभा और तहसील जेवर. देश के सबसे लंबे, तेज रफ्तार और स्मार्ट यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे बसे इस कस्बे के तमाम गांवों में से एक का नाम नीमका शाहजहांपुर है. इसकी उस वक्त एक पहचान और हो गई जब इसे गौतमबुद्ध नगर के सांसद और केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया.

एक वक्त यहां आनेे वाली किशोरियों को बोलना नहीं आता था और आज चप्पलें भी लाइन से लगाती हैं. (सभी फोटोः अमित कुमार बाजपेयी/कैच हिंदी)

लेकिन इस गांव में दलितों की स्थिति काफी दयनीय है. मजदूरी, किसानी जैसे अन्य काम करने वाले परिवार अपने बच्चों को नहीं पढ़ा पाते. पर पिछले तीन माह से यहां 'प्रोत्साहन चिरइया' उड़ने लगी है जिसने यहां के दलित, मुस्लिम व गरीब परिवारों की किशोरियों की आंखों में नए सपने बुने हैं.

नीमका गांव से करीब 40 किलोमीटर दूर एजुकेशन हब के नाम से मशहूर ग्रेटर नोएडा के नॉलेज पार्क स्थित बिमटेक इंस्टीट्यूट और इसकी गैर सरकारी संस्था रंगनाथन सोसाइटी फॉर सोशल वेलफेयर एंड लाइब्रेरी डेवलपमेंट ने 28 मार्च 2016 को 'प्रोत्साहन चिरइया' नाम का एक प्रोजेक्ट शुरू किया.

यह है जेवर के नीमका गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय और इसी परिसर में है उच्च प्राथमिक विद्यालय.

नीमका गांव स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय की एक क्लास में तब से हर शनिवार यहां कई प्रशिक्षक और विशेषज्ञ पहुंचते हैं. बिना बिजली, पंखे, रोशनी वाले इस विद्यालय में यूं तो कहने को सोलर पैनल लगे हैं लेकिन कक्षाओं के अंदर पंखा-बिजली जैसा कुछ भी नहीं हैं.

किशोरियों द्वारा क्लासरूम में लगाया गया अपने हौसले बताता पोस्टर.

चार माह तक चलने वाले इस विशेष कार्यक्रम के लिए 30 किशोरियों का चयन किया गया. इनमें अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, मुसलमान और गरीब परिवारों की उन किशोरियों को चुना गया जो या तो स्कूल-कॉलेज जा रही हैं या फिर जाना छोड़ चुकी थीं. क्लास में आने के लिए कई किशोरियों के परिवारों को समझाना पड़ा और फिर क्लास में बच्चियों की तादाद बढ़ी. 

आज यहां आने वाली हर चिरइया के जीवन का एक मकसद है और यहां की दीवारों पर लगे पोस्टरों पर उन्होंने अपने ख्वाब लिख रखे हैं. कोई ब्यूटीशियन बनना  चाहती है तो कोई टीचर. किसी का सपना है वो फैशन डिजाइनिंग करे तो कोई इंजीनियर बनना चाहती है. इन्हें प्रशिक्षण देने वाले इनके मौजूदा हालात और क्षमता से अच्छी तरह वाकिफ होने के साथ ही इनके सपने पूरे करने के लिए क्या करना चाहिए यह भी बताते रहते हैं.

क्या है 'प्रोत्साहन चिरइया'

प्रोत्साहन चिरइया एक कार्यक्रम है ग्रामीण किशोरियों के हौसलों को उड़ान देने का.

शिक्षाविद् और बिमटेक इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. हरिवंश चतुर्वेदी कहते हैं कि एक बिटिया को पढ़ाना यानी पूरे परिवार को पढ़ाने के समान होता है. अधिकांश ग्रामीण भारत में आज भी बेटियों को पढ़ाने, आगे लाने और उन्हें सम्मान देने की परंपरा नहीं है. इस स्थिति को बदलना होगा. वैश्वीकरण के दौर में जब हर जानकारी पलक झपकते ही मौजूद है और अवसरों की भरमार है, तो गांवों में छिपी प्रतिभाओं का सामने लाने के लिए मजबूत प्रयासों की जरूरत है. शुरुआत भले ही छोटी हो लेकिन एक शुरुआत काफी बड़ा बदलाव करने के काबिल होती है.

प्रोत्साहन चिरइया कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर संबोधित करते बिमटेक के निदेशक डॉ. हरिवंश चतुर्वेदी

वहीं, रंगनाथन सोसाइटी के महासचिव डॉ. ऋषि तिवारी कहते हैं कि 'प्रोत्साहन चिरइया' एक मॉडल है जिसके जरिये किशोरियों के साथ जानकारी साझा कर और उन्हें मजबूत पहचान देकर उनके सुनहरे भविष्य की राह तैयार की जाए.

इसके अंतर्गत गांव की किशोरियों को स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण, आपसी संबंध, सरकारी योजनाएं, कम्यूनिकेशन की आधारभूत जानकारी देकर उन्हें इस योग्य बनाया जा रहा है ताकि उनमें आत्मविश्वास पैदा हो, वे सोचने-समझने के काबिल बन सकें, सही फैसले ले सकें, अपनी बात मजबूती से कह सकें, स्वयं, परिवार और समाज के लिए लाभकारी सरकारी योजनाओं का फायदा उठा सकें और अपनी पसंद के क्षेत्र में अपना भविष्य संवार सकें.

आजाद चिरइयां हैं सभी

क्लास की दीवारों पर चिपके पोस्टर बताते हैं कि यह चिरइया क्या लक्ष्य साधें है और किसे आदर्श मानती हैं.

प्रशिक्षिका रेनू सिंह कहती हैं कि इन किशोरियों के ऊपर आने-जाने के वक्त को लेकर कोई पाबंदी नहीं है. कई के माता-पिता मजदूरी-किसानी या ऐसे ही कोई काम करते हैं तो वे किशोरियां कैसे भी करके भले ही थोड़ी देर से ही सही लेकिन क्लास में पहुंचती हैं. पहले दिन क्लास में जो लड़कियां बोलने और खड़े होने में हिचकिचा रही थीं, अब अधिकांश में यह डर खत्म हो गया है. दो-चार ऐसी अभी भी हैं जिनके अंदर से डर खत्म करना है और वो यह बैच खत्म होने से पहले ही हो जाएगा. 

क्लास के दौरान प्रशिक्षिकाओं की बातों को बड़े गौर से सुनती हैं सभी किशोरियां.

इसके अलावा इन किशोरियों को पढ़ने और याद करने नहीं बल्कि चीजों को समझने के लिए प्रेरित किया जाता है ताकि वे अपनी खुद की सोच पैदा कर सकें. इन 30 किशोरियों के बैच की हर बच्ची को समाज में सुधार की रोशनी देने वाली एक मशाल के रूप में तैयार किया जा रहा है. इन चिरइयों के पंख ऊंची उड़ान के काबिल थे, लेकिन बस अब उन्हें यह बताया जा रहा है कि 'उड़ो, तुममें उड़ने की पूरी ताकत और तुम्हारे आगे खुला आसमान है.'

क्लास में हर चिरइया स्वच्छंद उड़ने को स्वतंत्र होती है.

क्या होता है प्रोत्साहन चिरइया की क्लास में

समूह की भावना विकसित करने के लिए कई बार गेम भी खिलवाएं जाते हैं.

इस प्रोजेक्ट से जुड़ी सहगल फाउंडेशन की दो प्रशिक्षिकाएं करीब 110 किलोमीटर दूर हरियाणा के मेवात से आती हैं. प्रशिक्षिका शाहीन कहती हैं कि हम क्लास नहीं कराते हैं बल्कि चर्चा और गतिविधियों के जरिये किशोरियों को सिखाते हैं. 

शनिवार 18 जून को क्लास में पहुंची सभी किशोरियां, दिखा रही हैं कि कैसे उड़ती है चिरइया.

इन बच्चियों को कोई होमवर्क नहीं दिया जाता केवल क्लास में होने वाली चर्चा को ही समझने और उन्हें रोजमर्रा के जीवन में कैसे इस्तेमाल किया जाए, इस बारे में पूछा जाता है. यहां पर कोई भी 'फेल' नहीं होता और सब 'पास' होते हैं. क्लास में आना ही इन किशोरियों का जीवन बदलने के लिए सक्षम है.

क्लास के दौरान अलग-अलग गतिविधियों में सभी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं.

वहीं, दूसरी ट्रेनर उर्मिला के मुताबिक इन बच्चियों को केवल सही दिशा, जरूरी जानकारी देने के साथ ही थोड़ी सी मुखरता सिखानी है बाकि इनमें बहुत दम है. फाउंडेशन के रेडीमेड मॉड्यूल के मुताबिक इन बच्चियों को किताबी ज्ञान न देकर इनके लिए फायदेमंद जानकारी दी जाती है और इन्हें भविष्य संवारने के लिए जरूरी बातों को समझाया भर जाता है.

कभी-कभार क्या याद रहा और क्या भूल गईं यह जानने के लिए कुछ पूछ भी लिया जाता है.

आगे की क्या योजना है

प्रोजेक्ट से जुड़ी बिमटेक की सलोनी कहती हैं, "17 सप्ताह या करीब चार माह में एक प्रोजेक्ट पूरा होगा. इन 17 मॉड्यूल्स में इन किशोरियों को लाइफ स्किल्स देकर उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा. इनमें से ज्यादा होनहार को अगले बैच में को-ट्रेनर के रूप में भी शामिल किया जा सकता है जबकि बाकी की जिम्मेदारी अपने घर, पड़ोस में इन स्किल्स का प्रचार करना होगा."

वे कहती हैं, "इन बच्चियों के ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं होती. लेकिन पहला बैच खत्म होने के बाद पूरा एनालिसिस किया जाएगा और देखा जाएगा कि इनके लिए कौन सा ट्रेनिंग स्किल सही रहेगा. फिर तमाम संस्थाओं, उद्योगों आदि से संपर्क कर वहां पर इनके प्रशिक्षण और रोजगार के इंतजाम किए जाएंगे."

इस खिड़की से झांकती हर चिरइया की आंखों में सुनहरे भविष्य के ख्वाब हैं.

अभिभावक भी चाहते हैं कि उनकी चिरइया भरें उड़ान

नीमका गांव की पुष्पलता, राजरानी और सुंदरी ने बताया कि वे खुद अनपढ़ हैं और उन्हें इसका अफसोस है. लेकिन अब वे चाहती हैं कि उनकी चिरइयां पढ़ें, लिखें और अपने पैरों पर खड़ी हों. इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को यहां भेजा. 

प्रोत्साहन चिरइया की किशोरियां अपनी माताओं के साथ.

हालांकि समाज को देखते हुए उन्हें डर तो है लेकिन वे अपनी बच्चियों को हर तरह से सपोर्ट करना चाहती हैं. सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाने का मलाल रखने वाली यह तीनों मां कहती हैं कि उनकी बच्चियों को इनकी जानकारी हो रही है और वे अब खुद से अपना हक हासिल कर सकती हैं.

सांसद महोदय थोड़ा ध्यान दें

लगता है सांसद महोदय गांव को गोद लेने, यहां पर जरा सी सड़क बनवाने और कुछ स्ट्रीट लाइटें लगवाने के बाद भूल गए. ग्रामीणों का कहना है कि सांसद महोदय ने वादे तो बहुत बड़े-बड़े किए थे लेकिन शायद इतने व्यस्त हो गए हैं कि अब इसे भूल ही गए.

सांसद महोदय के मुताबिक ही इस गांव की कुल आबादी 3,559 हैं जिसमें 1,804 पुरुष, 1,755 महिलाएं और 1197 अनुसूचित जाति व अन्य जाति के लोग हैं. गांव में दलितों के पास रहने के लिए अपना घर नहीं है, दो छोटी प्राथमिक पाठशाला हैं और यहां तीन से चार घंटे ही बिजली आती है.

गौतमबुद्ध नगर के सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. महेश शर्मा.

लेकिन सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत करने के लिए वे एक बार यहां आए और बड़ी-बड़ी बातें कहकर गायब हो गए. अब इंतजार है उनके वादे पूरे होने का.

First published: 25 June 2016, 14:59 IST
 
अमित कुमार बाजपेयी @amit_bajpai2000

पत्रकारिता में एक दशक से ज्यादा का अनुभव. ऑनलाइन और ऑफलाइन कारोबार, गैज़ेट वर्ल्ड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, एजुकेशन पर पैनी नज़र रखते हैं. ग्रेटर नोएडा में हुई फार्मूला वन रेसिंग को लगातार दो साल कवर किया. एक्सपो मार्ट की शुरुआत से लेकर वहां होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों-संगोष्ठियों की रिपोर्टिंग.

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