Home » इंडिया » पुणे जातीय हिंसा ने रोकी मायानगरी की रफ़्तार , दलित संगठनों ने किया बंद का ऐलान
 

पुणे जातीय हिंसा ने रोकी मायानगरी की रफ़्तार

कैच ब्यूरो | Updated on: 3 January 2018, 13:11 IST

पुणे के भीमा-कोरेगांव से शुरू हुई जातीय हिंसा का असर अब पूरे महाराष्ट्र में फैलता दिखाई दे रहा है. हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने इस घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को संसद में उठाया है. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने नियम 56, कांग्रेस सांसद रजनी पाटिल ने नियम 267 के तहत इस मुद्दे पर चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है. महाराष्ट्र के जिन 16 जिलों में प्रदर्शन हो रहे हैं उनमे मुंबई, पुणे, औरंगाबाद, अहमदनगर, हड़पसर और फुरसुंगी शामिल हैं.

बुधवार को कई दलित संगठनों ने पूरे महाराष्ट्र में बंद का ऐलान किया. चेम्बूर, पुणे और मुंबई में बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के पोते और एक्टिविस्ट प्रकाश आंबेडकर सहित आठ संगठन इन प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे हैं. प्रकाश अंबेडकर का कहना है कि महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले में जो न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं वह उन्हें मंजूर नहीं हैं.

मुंबई तक फैली चिंगारी

पुणे के बाद मुंबई में भी इसका जोरदार असर दिखाई दे रहा है. मुंबई के मशहूर डिब्बावालों ने भी अपनी सर्विस ठप्प रखी है. आज पूरे मुंबई में करीब 40 हजार स्कूल बंद किये गए हैं. प्रदर्शन का असर मुंबई की ट्रेन और बस सेवाओं पर पड़ा है. नालासोपारा रेलवे स्टेशन पर बड़ी संख्या में प्रदर्शकारी रेलवे ट्रैक पर बैठ गए हैं. जिसके चलते लोगों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. ख़बरों के अनुसार पुणे से बारामती और सतारा के लिए बस सेवाएं रोक दी गई हैं. प्रदर्शनकारी बसों को रोक- रोककर उनकी हवा निकाल रहे हैं.

क्यों शुरू हुई जातीय हिंसा ?

नए साल के मौके पर पुणे के कोरेगांव इलाके में कोरेगांव भीमा घटना के 200 साल पूरे होने पर एक आयोजन के दौरान अचानक हिंसा भड़क गई थी जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. इस दौरान 40 से ज्यादा गाड़ियों को आग लगा दी गई. गौरतलब है कि 1918 में भीमा-कोरेगांव युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तथा तथाकथित सवर्ण पेशवा सैनिकों के बीच हुआ था. कहा जाता है कि इस युद्ध में पेशवाओं की हार हुई, जबकि इस युद्ध में अंग्रेजों की फ़ौज में दलित सैनिक मौजूद थे. इस जीत को दलित 'विजय दिवस' क रूप में मनाया जाता है. इस कार्यक्रम के दौरान हिंसा भड़क गई थी.

First published: 3 January 2018, 13:11 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी