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पंजाब में दलितों के खिलाफ हिंसक घटनाओं की बाढ़

राजीव खन्ना | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST

ऐसा समय, जबकि पंजाब चुनाव के मुहाने पर है, राजनीतिक माहौल दूषित होता जा रहा है. चुनावी चौसर बिछाई जाने लगीं हैं. इस सबके बीच राज्य में दलितों के प्रति हिंसा की घटनाओं में तेजी देखने को मिल रही है. पिछले एक सप्ताह में पंजाब में दलितों पर हमले की दो बड़ी घटनाएं हुईं. इन हमलों को बहुत ही दिल दहला देने वाले तरीके से अंजाम दिया गया.

ताजा घटना, पंजाब के मनसा जिले के घरागणा गांव की है. वहां 21 वर्षीय युवक सुखचैन सिंह की बहुत ही नृशंस तरीके से हत्या कर दी गई. युवक की हत्या ही नहीं की गई, बल्कि विरोधी गैंग के लोग उसकी टांग भी काटकर ले गए.

सुखचैन के परिवार का कहना है कि उसका कत्ल इसलिए किया गया क्योंकि वह दलित था. सभी आरोपी ऊंची जातियों से ताल्लुक रखते हैं. खबरों के मुताबिक अभियुक्तों का सत्तारूढ़ दल शिरोमणि अकाली दल से जुड़ाव था और वे मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के ड्राइवर निरंजन सिंह के करीबी हैं.

इस हत्या के बाद जमींदार उच्च जातियों और क्षेत्र के दलितों के बीच तनाव बढ़ गया है. इस नृशंस घटना के बाद पीड़ित के परिवार ने मृतक का कटा पैर नहीं मिलने तक शव का अंतिम नहीं करने का निर्णय किया है. बलबीर सिंह उर्फ काला, हरदीप सिंह उर्फ काला, बिट्टा सिंह, घरागणां गांव के साधु सिंह, छोटे नांगल के बिट्टू सिंह और सीता सिंह समेत उनके 20 अन्य साथियों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई है.

हरदीप और उसका भाई बिट्टा घरागणा के सरपंच सरदूल सिंह के भतीजे हैं. सरदूल सिंह बादल के ड्राइवर के पुत्र हैं. खबरों में यह भी पता चला है कि पीड़ित की आरोपियों के साथ दुश्मनी थी. दोनों समूह अवैध शराब के करोबार में शामिल थे और पहले भी उनके बीच झगड़े हो चुके हैं. आरोपियों को शक था कि सुखचैन शराब की तस्करी की खबर पुलिस को देता है.

राज्य में पिछले साल भी ऐसी ही एक नृशंस घटना हुई थी. फजिल्का के अबोहर में इलाके में शराब कारोबारी और अकाली नेता शिवलाल डोडा के फार्म हाउस पर एक दलित युवक भीम टांक की हाथ-पैर काटकर हत्या कर दी गई थी.

सुखचैन की हत्या संगरूर जिले के झलूर गांव में एक दलित पर हुए हमले की घटना के एक सप्ताह के भीतर ही हुई है. झलूर गांव में दलितों के हिस्से की पंचायती जमीन को लेकर लम्बे समय से दलितों का उच्च जातियों के जमींदारों से विवाद चल रहा था. दलितों का दावा है कि कानून के अनुसार पंचायत को गांव की कॉमन लैंड में से एक-तिहाई जमीन अनुसूचित जातियों को जोतने के लिए देनी चाहिए.

यह अभियान तब से और मजबूती पकड़ रहा है जब से कुछ गांवों में दलितों ने खेत को जोतने का अधिकार हासिल किया है

उनका यह अभियान तब से और मजबूती पकड़ रहा है जब से कुछ गांवों में दलितों ने खेत को जोतने का अधिकार हासिल किया है. लेकिन कहा जा रहा है कि उच्च जाति के लोग इनको खेती करने से रोक रहे हैं.

सूत्रों के अनुसार 5 अक्टूबर को दलितों का एक समूह जब संगरूर के जिला उपायुक्त कार्यालय पर प्रदर्शन करके लौट रहा था तब रास्ते में ही उच्च जाति के लोगों ने घात लगाकर उन पर हमला कर दिया. इससे उपद्रव की स्थिति उत्पन्न हो गई. इसके बाद गांव में दलितों की सम्पत्तियों को निशाना बनाया गया. पुलिस ने दोनों ओर से रिपोर्ट दर्ज की है.

लेकिन एक्टिविस्टों का कहना है कि जो लोग गिरफ्तार किए गए हैं, उनमें ज्यादा संख्या दलितों की है और दलितों पर ही बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए गए हैं. प्रगतिशील छात्र संगठन, स्टूडेन्ट्स ऑफ सोसाइटी, जिसने पंजाब में हाल ही में प्रमुखता से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, के सोना सिंह कहते हैं कि दलितों पर बहुत ही नृशंसता के साथ हमला किया गया. 70 वर्षीय एक महिला पर खेती के काम आने वाले एक धारदार औजार से हमला किया गया.

महिला को चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड रिसर्च के ट्रॉमा सेन्टर में भर्ती कराया गया है. सोना सिंह फैक्ट फाइंडिंग टीम के हिस्सा थे और उन्होंने घटनास्थल का दौरा किया था. वे काफी डरे और सहमे हुए हैं. वह आगे कहते हैं कि ज्यादातर दलित महिलाएं और बच्चे गांव छोड़कर चले गए हैं और जो पुरुष खेती के कामों के चलते गांव में बचे हैं, वे भी अंडरग्राउंड हो गए हैं.

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक वकील अजय कुमार, जो सामाजिक संगठन लोकायत की ओर से फैक्ट फाइंडिंग टीम का हिस्सा थे, बताते हैं कि गांव में दलित सामाजिक बहिष्कार की चुनौती का सामना कर रहे हैं. गांव में केवल वे दलित ही सामान्य जीवन जी पा रहे हैं जो उच्च जाति के लोगों के साथ हां में हां मिलाते हैं.

इस मामले में उच्च जाति के केवल दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है जबकि दलितों की गिरफ्तारी की संख्या 17 थी

वह कहते हैं कि हम गांव में अपमानित और दुखी परिवारों की कुछ प्रौढ़ महिलाओं से ही बात करने में सफल हो सके. इन महिलाओं ने बताया है कि गांव वालों ने किसी भी दलित पर 60,000 रुपए का जुर्माना लगाने की घोषणा की हुई है जो उच्च जाति के लोगों के खेतों पर काम करने का साहस करेगा.

सोना और अजय दोनों लोग कहते हैं कि दुकानदार गांव में दलितों को दूध, आटा या अन्य जरूरी चीजें नहीं दे रहे हैं. 50 फीसदी से ज्यादा दलित गांव से पलायन कर गए हैं.

अजय कुमार कहते हैं कि इस भयावह कथानक का सबसे विडम्बनापूर्ण भाग तो यह है कि हम जब वहां गए तो हमें बताया गया कि इस मामले में उच्च जाति के केवल दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है जबकि दलितों की गिरफ्तारी की संख्या 17 थी.  यह तो पुलिस की एकतरफा कार्रवाई है. अजय कहते हैं कि गांव में 150 से ज्यादा दलित परिवार हैं.

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगत सिंह के भतीजे प्रो. जगमोहन, जो अपने संगठन जम्हूरी अधिकार सभा की ओर से फैक्ट फाइंडिंग मिशन में शामिल थे और झलूर गए थे, ने कैच न्यूज को बताया कि गांव में हंगामे का तांडव मचाया गया. दलित डर के साये में हैं. वह कहते हैं कि झलूर एक ऐसी एकता का मिसाल वाला गांव है जहां दलित उच्च जातियों के साथ पड़ोसी बनकर रहते हैं.

इस घटना से हमलावरों के लिए दलितों के मकानों पर धावा बोलना और आतंक फैलाना आसान हो गया है. वह कहते हैं कि दलित अपने हिस्से की कॉमन भूमि पर पशुओं के लिए चारा बोने की ओर ताक रहे हैं. इससे उनको अपने पशुओं के लिए चारा मिल जाता है और उनका शहरों की ओर पलायन भी रुकता है. शहरों में जाकर उन्हें गंदी और कच्ची बस्तियों में रहने को मजबूर नहीं होना पड़ता.

वह कहते हैं कि दलित पूंजीगत कृषि के लिए भूमि नहीं चाहते. उन्हें कॉमन भूमि पर उनके हिस्से की जमीन पर सामूहिक खेती करने की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि वे सम्मान के साथ जीवन जी सकें.

सोना का दावा है कि गांव में 90 एकड़ कॉमन लैंड है. इसमें से 40 एकड़ को पहले ही जमींदारों ने हड़प लिया है. सामाजिक कार्यकर्ता अब कानूनी कार्रवाई करने की योजना बना रहे हैं और उन्होंने मामले की सीबीआई जांच की भी मांग की है. उन्होंने किसी नौकरशाह द्वारा जांच कराने के सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है.

कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने दलितों के खिलाफ आतंक फैलाए जाने की घटना को न रोक पाने में सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार को आड़े हाथों लिया है. कैप्टन ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से मनसा के पीड़ित परिवारों की मदद करने के लिए आगे आने को कहा है. उन्होंने कार्यकर्ताओं को यह भी निर्देश दिया है कि वह मनसा और संगरूर के दलित परिवारों के साथ एकजुट हों और उनमें फिर से उत्साह का संचार करें.

अमरिन्दर सिंह ने बादल सरकार पर राज्य की धर्म निरपेक्ष छवि और पंजाब के शांत माहौल को काफी एकाग्रता के साथ नष्ट करने का भी आरोप लगाया है. सुखचैन की हत्या को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य के शराब माफियाओं को अकालियों का समर्थन मिला हुआ है. बादल सरकार की दलित-विरोधी नीतियां खुलकर और पूरी तरह उजागर हो गईं है. अब यह स्पष्ट हो गया है कि पंजाब में, विशेषकर मालवा क्षेत्र में, दलितों के खिलाफ अत्याचार और क्रूरता की जा रही है और अकाली दल नेतृत्व ऐसे लोगों को संरक्षण दे रहा है.

उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला शर्मनाक तो है ही, भाजपा के पंजाब अध्यक्ष विजय साम्पला के लिए भी चिन्ताजनक है क्योंकि वे खुद भी दलित हैं. वे लगातार मूकदर्शक बने हुए हैं और वह अपनी ही पार्टी के गठबंधन साझेदार अकाली दल के इस काम के खिलाफ कोई भी टिप्पणी करने से परहेज कर रहे हैं.

अजय कुमार कहते हैं कि अब तक राजनीतिक दल संगरूर में दलितों पर अत्याचार को लेकर चुप्पी साधे रहे हैं. वह कहते हैं कि उच्च जाति के जाट संख्या में उनसे ज्यादा हैं. कदाचित वे भी चुनावी मौसम में राजनीतिक रूप से अपना ठौर-ठिकाना तलाश रहे हों.

First published: 13 October 2016, 1:24 IST
 
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