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हरित क्रांति बीत चुकी, फिलहाल पंजाब के किसान कर्ज के कुचक्र में हैं

राजीव खन्ना | Updated on: 2 February 2016, 7:55 IST
QUICK PILL
  • कृषि लागत में हुई बढ़ोत्तरी और घटते न्यूनतम समर्थन मूल्य की वजह से पंजाब के किसान कर्ज बोझ से इस कदर दब चुके हैं कि उनके सामने आजीविका का संकट गहराने लगा है.
  • पंजाब यूनिवर्सिटी के सर्वे के मुताबिक पंजाब में किसानों पर कुल 69,355 करोड़ रुपये का कर्ज है. इसमें से 56,481 करोड़ रुपये का कर्ज गैर बैंकिंग संस्थानों से लिया गया है.

एक समय था जब पंजाबी खेती किसानी को अपने सूबे का सबसे बड़ा मान समझते थे लेकिन, आज पंजाब को कृषि संकट का सामना करना पड़ रहा है और राज्य के किसान कर्ज के बोझ से कराह रहे हैं. पंजाब विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम का समय बचा है और राज्य में यह मुद्दा राजनीतिक रंग ले चुका है.

पंजाब में कृषि की खराब हालत से उपजे आक्रोश को कम करने के लिए मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल 'पंजाब रिलीफ ऑफ एग्रीकल्चर इनडेटनेस बिल' को मंजूरी दे चुके हैं. उन्होंने किसानों की बदहाली के लिए फसलों की कम होती एमएसपी को जिम्मेदार ठहराया है. इसके अलावा उन्होंने खाद, डीजल, बीज और कीटनाशक जैसे कृषि लागत की बढ़ती कीमत को भी जिम्मेदार ठहराया है.

कृषि लागत में हुई बढ़ोतरी की वजह से मुनाफा में कमी हो रही है. बादल ने कहा कि बिल की मदद से किसानों, मजदूरों और ग्रामीण कामगारों को अपना कर्ज चुकाने में मदद मिलेगी. कांग्रेस प्रेसिडेंट कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि उनकी सरकार ने किसानों को कर्ज से राहत देने के लिए बिल पर काम कर रही थी लेकिन उसे लागू किया जाता उससे पहले ही सरकार सत्ता से बाहर हो गई.

राजनीति भारी

पंजाब यूनिवर्सिटी के ज्ञान सिंह के नेतृत्व में किए गए इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च के 'इनडेटनेस अमन्ग फॉर्मर्स एंड एग्रीकल्चरल लेबर्स इन रूरल पंजाब' नाम से किए गए सर्वे के मुताबिक पंजाब में किसानों पर कुल 69,355 करोड़ रुपये का कर्ज है. इसमें से 56,481 करोड़ रुपये का कर्ज गैर बैंकिंग संस्थानों यानी साहूकारों और निजी संस्थाओं से लिया गया है.

ज्ञान सिंह की टीम में अनुपमा, गुरिंदर कौर, रुपिंदर कौर और सुखबीर कौर शामिल थे और इनकी टीम ने होशियारपुर, लुधियाना और मनसा में सर्वेक्षण किया. 

सर्वे में पाया गया कि छोटे और भूमिहीन किसानों के पास बंधक रखने के लिए कोई भी संपत्ति नहीं थी और वह मुख्य तौर पर गैर-संस्थानिक कर्ज पर निर्भर रहे. 2014-15 के आकलन को यहां देखा जा सकता है.

  • प्रति परिवार औसत कर्ज की रकम 5,52,064 रुपये रही.
  • सीमांत किसानों का औसत कर्ज 2,76,83 रुपया रहा.
  • छोटे किसानों (5 एकड़ तक) पर औसत कर्ज 5,57,338 रुपया रहा.
  • बड़े किसानों पर 16,37,473 रुपये का औसत कर्ज रहा.
  • भूमिहीन मजदूरों पर औसत प्रति परिवार 68,330 रुपये रहा और 80 फीसदी परिवार कर्ज में है. निजी संस्थानों से मिलने वाली कर्ज की राशि 92 फीसदी रही.

वजह

ज्ञान सिंह ने बताया, '1970 के बाद से कृषि कीमत नीति किसानों के माकूल नहीं रही है. 1991 के बाद से केंद्र और राज्य की नीतियों के कारण किसानों को घाटा उठाना पड़ रहा है.'

न्यूनतम समर्थन मूल्य कम हो रहा है और कीमत की पूरी जिम्मेदारी अनियंत्रित बाजार के हाथों में सौंप दी गई है. इसके अलावा पिछले दो सालों में खाद की कीमत में तीन गुणा की बढ़ोतरी हो चुकी है. सभी सरकारों ने शोध और विकास से हाथ पीछे खींच लिया और कृषि में निजी कंपनियों का प्रवेश हुआ. 

आज वह कंपनियां किसानों का शोषण कर रही हैं. इसके अलावा एग्रो प्रॉसेसिंग की पूरी कमान कॉरपोरेट के हाथों में है जो किसानों के साथ मुनाफा साझा नहीं करते हैं.

सबसे ज्यादा नुकसान भूमिहीन किसानों को उठाना पड़ा है और वह शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे से बाहर हो चुके हैं

पिछले साल 1,700 करोड़ रुपये का कीटनाशक घोटाला सामने आया और इससे कपास के किसानों को बड़ा झटका लगा. राज्य के कृषि निदेशक मंगल सिंह संधू को इस मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है. 

विपक्षी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने हालांकि इस मामले में राज्य के कृषि मंत्री तोता सिंह को बर्खास्त किए जाने और उनके खिलाफ आपराधिक मामला चलाए जाने की मांग की है.

कैसे निकलेगा रास्ता

प्रख्यात कृषि अर्थशास्त्री डॉ. एस एस जोहाल की माने तो कृषि समस्या को दूर करने के लिए सरकार को और अधिक व्यावहारिक होने की जरूरत है. उन्होंने कहा, 'कानून को सही तरीके से लागू किया जाना चाहिए. मैं सेवानिवृत्त जज के नेतृत्व में रिकंसिलिएशन एंड सेटलमेंट बोर्ड को बनाए जाने की सलाह देता रहा हूं.'

दूसरा तरीका यह है कि विभाजन के पूर्व किसान नेता रहे सर छोटू राम के फॉर्मूले को लागू किया जाना है जिसके मुताबिक अगर कोई किसान लिए गए कर्ज की 1.5 गुणी रकम चुका देता है तो उसके कर्ज को माफ कर दिया जाना चाहिए. उस किसान से कर्ज पर ब्याज नहीं लिया जाना चाहिए.

उन इलाकों में कर्ज की परेशानी ज्यादा बढ़ी है जहां किसानों ने फसल बदलकर खेती की. उन्होंने ज्यादा मात्रा में कर्ज लिया और उसका वह सही ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाए. इसकी वजह से किसान कर्ज में उलझ गए. 

किसान नेता सुखविंदर शेखन ने स्वामीनाथ आयोग के एमएसपी फॉर्मूले को लागू करने की सिफारिश की है. उन्होंने कहा कि किसानों को उनकी लागत का 50 फीसदी रकम दिया जाना चाहिए. इसके अलावा पंजाब में कोई खरीद एजेंसी नहीं है जिसकी वजह से ट्रेडर्स लगातार किसानों का शोषण कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, 'हम यह मांग करते रहे हैं कि किसानों को दिए जाने वाले कर्ज की दर 4 फीसदी से अधिक नहीं हो. फिलहाल यह ब्याज दर 11-12 फीसदी है.'

उन्होंने कहा कि निजी चीनी मिलों को किसानों को 255 करोड़ रुपये का भुगतान करना है. उन्होंने कहा, 'कानून कहता है कि बकाया रकम में होने वाली देरी पर चीनी मिलों को ब्याज का भुगतान करना चाहिए लेकिन हकीकत तो यह है कि उनकी मूल रकम भी बाकी है.'

दोआब क्षेत्र में बीजों की समस्या एक अलग वजह है. उन्होंने कहा, 'नासपाती किसानों को नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन बीज देती है जिसमें फल नहीं लगता. हम इस मामले में जांच की मांग कर रहे हैं ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कहीं यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश तो नहीं है. किसानों को हाईब्रिड बीजों के बदले होने वाले नुकसान के मामले में मुआवजा दिया जाना चाहिए.'

First published: 2 February 2016, 7:55 IST
 
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