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सीमावर्ती किसानोंं की चिंता युद्ध नहीं उनकी फसल है जिसका नुकसान होना तय है

राजीव खन्ना | Updated on: 2 October 2016, 7:50 IST
QUICK PILL
  • पंजाब में धान की फसल अंतिम चरण में हैं, लेकिन सीमा पर तनाव होने के नाते उन्हें गांव छोड़ना पड़ा है. विशेषज्ञों के मुताबिक किसानों का नुकसान होना तय है. इन खेतों में काम करने वाले मज़दूरों को भी खाने के लाले पड़ने वाले है.

पूरी पंजाब सीमा से सटे किसानों को अब अपनी धान की फसल का चिन्ता सता रही है. इसकी वजह है सीमाई इलाकों में सैन्य और बीएसएफ की चौकसी का बढ़ जाना. भारत-पाकिस्तान सेना के सम्भावित रूप से आमने-सामने आने की अटकलों के कारण पंजाब की सीमा से सटे किसान अपनी धान की फसल के सम्भावित नुकसान को लेकर दहशत में हैं और फसल को कातर निगाहों से देख रहे हैं.

धान की फसल अगले 12 से 14 दिनों में कटने लायक हो जाएगी. अब उन्हें यह डर सता रहा है कि अगर भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तनाव बढ़ता है तो वे अपनी फसल नहीं काट पाएंगे. पंजाब सरकार ने पिछले दो दिन से ज्यादा समय से अंतरराष्ट्रीय सीमा के 10 किमी के दायरे से लोगों को हटाना शुरू कर दिया है.

सूत्रों के अनुसार गांव पूरी तरह से खाली हो गए हैं. पंजाब सरकार का कहना है कि उरी हमले के बाद भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा के पार जाकर सर्जिकल ऑपरेशन किया है. आतंकियों के लांच पैड तबाह करने के चलते सीमा पर तनाव बढ़ गया है. ऐसे में केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को फोन कर अनुरोध किया था कि वे अंतरराष्ट्रीय सीमा से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले गांवों से लोगों को हटाने की प्रक्रिया फौरन शुरू करें.

बादल ने जानकारी दी है कि निर्देश मिलने के बाद सीमा से सटे छह जिलों से लोगों को हटाने का काम शुरू कर दिया गया. गृह और पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अमृतसर में कैम्प कर लोगों के हटाने के अभियान पर नजर रखे हुए हैं. राज्य सरकार ने छह वरिष्ठ अधिकारियों को इस काम के समन्वय और लोगों के हटाने अभियान की चौकसी के लिए नियुक्त किया है.

सात सौ से ज़्यादा गांव प्रभावित

गांवों को खाली करने के कारण फजिल्का जिले में 60, फिरोजपुर में 300, तरन तारण में 135, अमृतसर में 137, गुरदासपुर में 290 और पठानकोट जिले के 65 गांव प्रभावित हुए हैं. लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों के अलावा स्कूल, कम्युनिटी सेन्टर, शादी घर और अन्य जगहों पर बनाए गए पनाहगारों में ठिकाना लेने के लिए चले गए हैं. बादल ने यह भी बताया कि हटाए गए लोगों के लिए बनाए गए विशेष शिविरों में स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, टायलेट, लंगर, सुरक्षा, खाद्यान्न और जेनरेटर के समुचित इंतजाम किए गए हैं.

इस तरह के परिदृश्य के बीच किसान खेतों में खड़ी अपनी धान की फसल को बड़ी वेदना के साथ देख रहे हैं. उन्हें नुकसान का सम्भावित भय सता रहा है. चंडीगढ़ स्थित सेन्टर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट (सीआरआरआईडी) में प्रतिष्ठित कृषि अर्थशास्त्री डॉ. आरएस गुमान ने कैच न्यूज से कहा कि पूरी अंतराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों में धान की विभिन्न वैरायटी की फसल तैयार है.

फसल तबाह हुई तो क्या मिलेगा मुआवज़ा?

वह कहते हैं कि अगले दो हफ्तों में इसके पूरी तरह पक जाने की उम्मीद है. अगर तनाव बढ़ता है तो किसान अपनी फसल को काट पाने में असफल रहेंगे। अगर सेना तैनात होती है तो खेतों में सुरंगें बिछाए जाने से पूरी फसल तबाह हो जाएगी.

वह कहते हैं कि इस तरह के हालात में किसानों को 100 फीसदी की क्षतिपूर्ति दी जानी चाहिए. यह क्षतिपूर्ति केवल पीड़ित किसानों के लिए ही नहीं होनी चाहिए बल्कि उन्हें भी दी जानी चाहिए जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और गैर-कृषि कामों में अपना जीवन-यापन लगकर करते हैं.

डॉ. गुमान कहते हैं कि लोग तीन मोर्चों पर पिट रहे हैं. उन्हें अपने घर से बाहर जाने के लिए बलपूर्वक दबाव डाला जा रहा है. फसल हानि और सैन्य चौकसी के कारण आर्थिक गतिविधियों के सुस्त पड़ जाने से. पंजाब सरकार के कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि अगर तनाव बढ़ता है और किसान अपने खेतों में नहीं जा पाते हैं तो 500 से ज्यादा गांवों की धान की फसल प्रभावित होगी. यह किसानों का बहुत बड़ा नुकसान होगा.

किसानों का नुकसान होकर रहेगा

वह कहते हैं कि अगर एक पखवाड़े में हालात सामान्य नहीं होते हैं तो इससे होने वाला नुकसान दिखने लगेगा. गुमान ने यह भी बताया कि किसान तो नुकसान में ही रहेंगे क्योंकि सरकारी नियमों के अनुसार एक एकड़ पर केवल आठ हजार रुपए का मुआवज़ा दिया जा सकता है.

राज्य में धान की सरकारी खरीद अक्टूबर में शुरू होती है. इस साल सरकार का 160 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने का लक्ष्य है. राज्य के कृषि मंत्री आदेश प्रताप सिंह ने किसानों से कहा है कि वे मंडियों में सूखा, साफ-सुथरा और पका हुआ धान ही लाएं. उन्होंने जिला प्रशासन से भी आग्रह किया है कि वे किसानों को रात में धान की कटाई की इजाज़त न दें क्योंकि रात में आद्रता और नमी बढ़ जाती है.

इस बीच राजनीतिक दलों ने राज्य में 'वार हिस्ट्रीया' में कमी लाने और अन्य मुद्दों की तरफ ध्यान देने पर अपनी आवाज मुखर की है. पत्रकार से आम आदमी पार्टी के नेता बने कंवर संधु ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लगाई है. उन्होंने लिखा है, 'पंजाब, उसके लोगों और अकाली सरकार को केन्द्र की भाजपा सरकार द्वारा पंजाब सीमा पर युद्धोन्माद पैदा किए जाने के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए.

जम्मू-कश्मीर में एनडीए सरकार की गलत नीतियों के कारण पूरी सीमा पर गतिरोध बन गया है. सरकार को तुरन्त ही संसद का विशेष सत्र बुलाकर सीमापार तथाकथित सर्जिकल आपरेशन का ब्यौरा साझा करना चाहिए. इससे युद्ध को बढ़ावा मिल सकता है. पूरे राष्ट्र को विश्वास में लिया जाना चाहिए. यह मेरा विचार है.

चुनाव प्रचार से जुड़ी गतिविधियां रोकी गईं

पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने सीमा के निकट रहने वाले लोगों के साथ एकजुटता दिखाने के उद्देश्य से 7 अक्टूबर से अमृतसर में कैम्प करना निश्चित किया है. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से भी अपील की है कि वे भी सीमा तक जाएं और गुरदासपुर से फिरोजपुर तक रहने वाले लोगों के साथ एकभाव से रहें. उन्होंने यह भी घोषणा की कि सीमा से सटे विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव अभियान से जुड़ी गतिविधियां फिलहाल रोक दी गईं हैं.

अमरिन्दर ने बादल से धान खरीद के समुचित इंतजाम, मंडियों तक धान पहुंचाने, उसकी खरीद करने तथा बिना देरी के उसका भुगतान किए जाने की व्यवस्था करने को कहा है. उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि जब तक धान की कटाई न हो जाए, तब तक पुरुषों को गांवों में लौटने की अनुमति दी जाए. साथ ही, जानवरों की सुरक्षा के इंतज़ाम भी किए जाएं.

अमरिन्दर यह कहने वाले पहले व्यक्ति हैं कि सरकार, चाहे वह राज्य की हो या केन्द्र की, यह गलत सलाह है कि ग्रामीण अपने स्थानों को खालीकर चले जाएं, वह भी तब जबकि उनके अन्यत्र रहने का कोई इंतजाम नहीं किया गया है. उन्होंने सवाल किया है कि ग्रामीण कहां जाएंगे? कहां रहेंगे? वे क्या खाएंगे, उनकी फसल का क्या होगा?

सेेना के लिए घर खाली करने को तैयार

कांग्रेस के पूर्व नेता जगमीत सिंह बरार, जो अब राजनीतिक फोरम पेहला पंजाब लोक हित अभियान की अगुवाई कर रहे हैं, ने शिविर में ग्रामीणों से मुलाकात की है. ये लोग अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों के हैं. उन्होंने कहा कि हम सेना का पूरे दिल से समर्थन करते हैं. हमें अपनी जगह खाली करने से होने वाले असर के लिए भी तैयार रहना चाहिए क्योंकि यह समय और गांवों के आर्थिक हालात ऐसे ही हैं.

सीमा से सटे गांवों के कई लोग कर्ज के बोझ और सरकार की उदासीनता के कारण खुद को बेचने पर मजबूर हैं. अब उन्हें उनकी खड़ी फसल और घरों से भी वंचित किया जा रहा है. ऐसे में तो इन ग्रामीणों का कर्ज का संकट और बढ़ जाएगा और आने वाले सप्ताहों एवं महीनों में आत्महत्याओं की घटनाएं और बढ़ जाएंगी.

वह कहते हैं कि हमारे सैनिक हमारी सीमा की रक्षा करते हैं, हमें भी अपने गांवों को मौत और निराशा से संरक्षित रखना चाहिए. हमें उन परिवारों का संरक्षण करना चाहिए जिनके बच्चे हमारे सुरक्षा के लिए सेना में शामिल हुए हैं.

First published: 2 October 2016, 7:50 IST
 
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