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पंजाब सरकार नहीं चाहती, तलवंडी साबो में सरबत खालसा हो, क्या बादल इतने भयभीत हैं?

राजीव खन्ना | Updated on: 10 November 2016, 7:39 IST
(badal)

पंजाब के तलवंडी साबो में 10 नवम्बर को कुछ सिख संगठनों ने सरबत खालसा का आयोजन किया गया है. मगर पंजाब में प्रकाश सिंह बादल की अगुवाई वाली शिरोमणि अकालीदल-भाजपा गठबंधन सरकार नहीं चाहती कि यह आयोजन हो.

राज्य सरकार ने भटिण्डा जिले के तलवंडी साबो में आयोजन के लिए जगह देने से मना कर दिया है. सरबत खालसा से पहले पंजाब में गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया है. पुलिस ने गरमपंथी सिख संगठनों के कई सिख नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया है.

इस सरबत खालसा का आयोजन एक साल बाद हो रहा है. पिछले साल अमृतसर-तरन तारन रोड पर छाबा गांव में यह आयोजन किया गया था. इसमें भारी जन समूह ने भाग लिया था. आयोजन में विचार-विमर्श का मुख्य मुद्दा पवित्र ग्रंथ का अपमान था. कहना न होगा कि सरबत खालसा सरकार के गले की फांस बन गया है और अकाली दल को वोट बैंक का खतरा उत्पन्न हो गया है.

पंजाब की फिजां में यह सवाल तैर रहा है कि क्या बादल और अकाली इतने भयभीत हो गए हैं कि वे आयोजन की अनुमित नहीं दे रहे हैं. आयोजन की अनुमति न मिलने के बाद आयोजकों ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका भी लगाई थी.

तलवंडी साबो में आयोजन करने की रूपरेखा इस साल की शुरुआत में बैशाखी मेले में बनाई गई थी. आयोजकों का कहना है कि इस बात का कोई मतलब नहीं है कि आयोजन गरमपंथी सिख संगठनों ने किया है अथवा मॉडरेट्स ने इस बात पर गरम चर्चा है कि अगर यह आयोजन शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा है. तो सरकार को इसे क्यों रोकना चाहिए.

आयोजक तो सिर्फ यही चाहते हैं कि लोग एकसाथ एकित्रत हों और राज्य के चुनावी माहौल के संदर्भ में आमजन और विशेषकर समुदाय से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करें. आयोजन न होने देने वाले समर्थकों का कहना है कि तकनीकि रूप से केवल अकाल तख्त ही सरबत खालसा का आयोजन कर सकता है क्योंकि अकाल तख्त सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था है. (इसमें विभिन्न सिख संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं) लेकिन उदारवादी लोगों का कहना है कि किसी भी समूह का यह लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह किसी भी मुद्दे पर शांतिपूर्ण तरीके से विचार-विमर्श के लिए कोई भी आयोजन कर सकता है.

आस्था का मामला

पिछले साल जो आयोजन हुआ था, उसमें रेडिकल्स ग्रुप ने पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्या के दोषी जगतार सिंह हवारा को नए अकाल तख्त का जत्थेदार नियुक्त कर दिया था. यह गुरबचन सिंह के स्थान पर समानान्तर नियुक्ति थी.

गरमपंथियों ने अमरीक सिंह अजनाला और बलजीत सिंह दादूवाल को क्रमशः तख्त केसगढ़ साहिब और तख्त दमदमा साहिब का मुखिया नियुक्त कर दिया था. हवारा के जेल में रहने के कारण पूर्व सांसद ध्यान सिंह मंड को वैकल्पिक रूप से काम करने को कहा गया था.विश्लेषकों का कहना है कि समानान्तर नियुक्तियां पूरे राज्य में पवित्र ग्रंथ की बेअदबी की घटनाओं के जारी रहने को लेकर जन भावनाओं को दर्शाती हैं और सरकार की विफलता भी सामने आती है कि वह इस दिशा में कुछ कर नहीं रही है.

समूहों में असंतुष्टि का भाव

लोग शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) पर शिरोमणि अकाली दल के पूरी तरह कब्जे को लेकर आक्रोशित हैं. पिछले साल अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर के मानजी साहिब गुरुद्वारा में आयोजन को अनुमति नहीं दी गई थी. खबरों के अनुसार आयोजन के विकल्प के लिए छाबा गांव में जगह तलाशी गई. इसमें एक लाख से ज्यादा लोगों ने शिरकत की. यहां न केवल समानान्तर जत्थेदार को नियुक्त किया गया बल्कि तत्कालीन एसजीपीसी के मुखिया अवतार सिंह मक्कड़ को –शिरोमणि सेवक- का दिया गया टाइटल भी रद्द कर दिया गया था.

इस धार्मिक सभा ने आपरेशन ब्लू स्टार के कमांडर ले. जन. (रि) केएक बरार और पूर्व पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल को तनखैय्या घोषित कर दिया था और उन्हें अकाल तख्त के सामने पेश होने का निर्देश दिया था.

पिछले साल नवंबर में तरनतारन में सरबत खालसा बुलाया गया था जिसमें अकाल तख्त ने सिरसा डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की एक आपत्तिजनक तस्वीर और गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों को उठाया था. इस समय आयोजकों ने जो आयोजन किया है, उसे सरकार ने अपनी अनुमति नहीं दी है.

सरकार ने नहीं दी अनुमति

यूनाइटेड अकाली दल के वरिष्ठ कार्यकर्ता गुरनाम सिंह सिद्धू कहते हैं कि यह समझे जाने की जरूरत है कि सरकार लोगों की आवाज को दबाना चाहती है. वह नहीं चाहती कि दुनिया भर के लोग यह जानें कि लोग क्यों एकित्रत होना चाहते हैं. लोग शांतिपूर्ण तरीके से विचार-विमर्श करना चाहते हैं. 

सिख आयोजकों को पहले भी हिरासत में लिया गया है. धार्मिक सभा के आयोजकों के साथ काम कर रहे एक वकील ए एस चहल कहते हैं कि यह दूसरा अवसर है जब लोग एकसाथ आ रहे हैं और अपने विचार व्यक्त करने का यह उनका संवैधानिक अधिकार है. सरकार नहीं चाहती कि लोग एकसाथ जुटें और उसकी विफलताओं पर चर्चा करें.

सिद्धू समेत अन्य राजनीतिक विश्लेषकों ने भी रेखांकित किया है कि आयोजन में सरकार की विफलताओं को बताया जाएगा. सिद्धू ने कैच से बातचीत में कहा कि हमारी प्रमुख चिन्ता बरकरार है कि पवित्र ग्रंथ के साथ बेअदबी की घटनाओं का होना जारी है. कोई भी सिख गुरुओं के असम्मान अथवा गुरु ग्रंथ साहिब या किसी भी धार्मिक किताब की बेअदबी को बर्दाश्त नहीं करेगा. इन मामलों में सरकार लोगों को गिरफ्तार करने में विफल रही है. पिछले डेढ़ साल से ऐसी घटनाएं हो रहीं हैं.

हालात नियंत्रण से बाहर

यह सर्वमान्य तथ्य है कि पंजाब में पिछले कुछ माह से ज्यादा समय से धार्मिक हिंसा की घटनाएं हो रही हैं. विभिन्न आस्थाओं की पवित्र पुस्तकों के साथ बेअदबी किए जाने के कई उदाहरण हैं. नामधारी सम्प्रदाय के पूर्व मुखिया स्व. सतगुरु जगजीत सिंह की 88 वर्षीया पत्नी माता चांद कौर की हत्या कर दी गई. उन्हें लुधियाना के निकट सम्प्रदाय के मुख्यालय भैनी साहिब के पास गोली मारी गई.

इसके अलावा रणजीत सिंह धादरियानवाले पर हमला किया या. वह किसी तरह बच निकले, लेकिन उनके सहयोगी भूपिन्दर सिंह की मौत हो गई, लगभग दर्जन भर हमलावरों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी. यह घटना उस समय हुई जब वे लुधियाना के निकट राहगीरों को ठंडा शर्बत बांट रहे थे.

अभी हाल ही में आरएसएस के एक वरिष्ठतम कार्यकर्ता ब्रिगेडियर (रि) जगदीश गगनेजा की जालंधर के निकट गोली मारकर हत्या कर दी गई. इन सभी मामलों में कुछ भी पता नहीं चल सका है. सरकार अपनी विफलता पर कोई भी ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सकी है. उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल राजय में शांति भंग करने का आरोप पाकिस्तान की आईएसआई पर लगाते रहते हैं.

आम आदमी पार्टी के मेहरौली से विधायक नरेश यादव पर इस साल की शुरुआत में मालेरकोटला में कथित रूप से कुरान के साथ बेअदबी करने मामले में आरोपित किया गया है. धार्मिक हिंसा का यह नया रूप है. हालांकि, पंजाब सरकार ने अब  श्री गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान करने वालोंको अब दो साल के बजाय उम्रकैद की सजा का प्रावधान कर दिया है.

इसके साथ ही पूजा स्थान या पवित्र स्थलों की बेअदबी करने वालों को 10 साल की कैद प्रावधान किया गया है. पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने विधानसभा में बिल पेश किया था जिसे सर्वसम्मति से पास कर दिया गया है. अभी इसे अधिसूचित नहीं किया गया है.

बढ़ते मुद्दे

सरबत खालसा के आयोजक आयोजन में किसानों द्वारा लगातार की जाने वाली आत्महत्या की घटनाओं और कृषि में आने वाली समस्याओं को भी उठाना चाहते हैं. यह एक ऐसा अन्य क्षेत्र हैं जहां सरकार इसकी निगरानी करने में विफल रही हैं और अभी तक कोई ठोस जवाब नहीं दे पाई है.

बादल  'पंजाब कृषि ऋणग्रस्तता निपटान विधेयक 2016′ का हवाला दे रहे हैं. मंत्रिमंडल ने इस विधेयक को हरी झंडी दे दी है. बादल ने हाल ही में मूल्य स्थरीकरण फंड की घोषणा की है ताकि किसान मजबूरी में अपनी उपज न बेचें. लेकिन किसान आत्महत्या की घटनाएं रुक नहीं सकी हैं.

सिद्धू कहते हैं कि हम एक अन्य मुद्दा –युवाओं में ड्रग की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चर्चा करना चाहते हैं. यह एक अन्य क्षेत्र है जहां सरकार विफल रही है. कोई भी बादल के कार्यकाल से खुश नहीं है और हम इसे सामने लाना चाहते हैं.  हम धार्मिक आयोजन के करने पर दृढ़ हैं. यदि वे आयोजन स्थल पर जाने से हमें रोकेंगे तो हम वहीं बैठ जाएंगे और तब तक नहीं उठेंगे, जबतक हमें जाने की अनुमति नहीं मिल जाएगी.

खबर है कि प्रशासन ने तंबू उखाड़ दिए हैं ताकि आयोजन न हो सके. विश्लेषकों का कहना है कि सत्तारूढ़ पार्टी में इन रिपोर्ट्स को लेकर भी भय है कि आयोजन से बादल परिवार की नाकामियां सामने आ सकती हैं जिससे कई परेशानियां उठ खड़ी होंगी. आयोजक यह आयोजन करने में सफल हो पाते हैं अथवा सरकार इसे न होने देने में सफल रहती है, यह देखा जाना अभी बाकी है. लेकिन एक बात तो तयशुदा है कि सअद (बादल) आने वाले दिनों में कई तरह के तर्क देने में सक्षम है.

First published: 10 November 2016, 7:39 IST
 
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