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पंजाब के सियासी आसमान में मनप्रीत बादल की पतंग क्यों नहीं उड़ी?

राजीव खन्ना | Updated on: 18 January 2016, 20:57 IST
QUICK PILL
  • पंजाब की राजनीति में हमेशा से ही तीसरे मोर्चे की जरूरत महसूस की जाती रही है. हालांकि इसके बावजूद मनप्रीत बादल राज्य की सियासत में वह मुकाम हासिल नहीं कर पाए जो कुछ सालों में आम आदमी पार्टी करने में सफल रही है.
  • पिछले लोकसभा चुनाव में 4 सीटें जीतने के बाद अरविंद केजरीवाल की पार्टी आप पंजाब विधानसभा चुनाव के पहले लोगों की पसंद बनकर उभरती नजर आ रही है.

इससे बड़ी विडंबाना क्या हो सकती है कि जिस पार्टी का चुनाव चिह्न पतंग है वह पंजाब के आसमान में फिलहाल उड़ती नजर नहीं आ रही है.

पंजाब में पिछले कुछ सालों से तीसरे राजनीतिक विकल्प की मजबूत संभावनाओं के बावजूद मनप्रीत बादल की पीपल्स पार्टी ऑफ पंजाब (पीपीपी) इस जगह को भरने में विफल रही. करीब साढ़े पांच सालों के संघर्ष के बाद पार्टी का अब कांग्रेस में विलय हो चुका है.

वहीं, पीपीपी के मुकाबले काफी देर से पंजाब की सियासत में दखल देने वाली आम आदमी पार्टी (आप) राज्य में तीसरे विकल्प के तौर पर उभरने में सफल रही है.

पंजाब की राजनीति अभी तक शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस के बीच घूमती रही है. आप के उभार ने कांग्रेस और अकाली दल को गंभीर चुनौती दी है. 

पीपीपी 2011 में अस्तित्व में आई थी और इसका गठन मनप्रीत बादल ने किया था जो अकाली दर की तरफ से चार बार विधायक रह चुके हैं.

बादल पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे हैं और उन्होंने अकाली दल से अलग होते हुए अपनी पार्टी का गठन किया था.

पंजाब की राजनीति कांग्रेस और अकाली के बीच घूमती रही है. अब जाकर आम आदमी पार्टी ने इसमें मजबूत दखल दी है

मनप्रीत को पार्टी ने वित्त मंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया और बाद में उन्हें पार्टी से भी निकाल दिया गया. कांग्रेसनीत केंद्र सरकार और पंजाब सरकार के बीच कर्ज माफी पर बातचीत के मुद्दे को लेकर मनप्रीत और अकाली दल के बीच मतभेद पैदा हुए थे. 

हालांकि पीपीपी ने जबरदस्त तरीके से शुरुआत की लेकिन बाद में वह धीरे-धीरे सिमटती गई. विधानसभा में पार्टी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो पाई. इतना ही नहीं 2014 के आम चुनाव में भी पार्टी को एक भी सीट पर सफलता नहीं मिली.

विफलता के कारण

कांग्रेस और अकाली दल से जनता की नाराजगी के बावजूद पार्टी कई अहम कारणों से राज्य में उभर नहीं पाई. आजादी के बाद से पंजाब में इन्हीं दोनों पार्टियों का दबदबा रहा है. सबसे बड़ा कारण तो यह रहा कि मनप्रीत सांगठनिक ढांचा खड़ा नहीं कर पाए. 

यह सही बात है कि वह बड़ी संख्या में अकाली दल से असंतुष्टों को अपनी तरफ खींचने में सफल रहे लेकिन उनकी पार्टी पूरी तरह से एक आदमी के ईद-गिर्द ही घूमती रही. पीपीपी उनके करिश्माई व्यक्तित्व का इस्तेमाल नहीं कर पाई.

पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक मनजीत सिंह ने कैच को बताया, 'मनप्रीत संगठन के आदमी नहीं हैं. उन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं किया और न ही उन्होंने जमीनी स्तर पर स्वयंसेवकों का संगठन तैयार किया. मैं यह कहना चाहूंगा कि उन्हेें लोगों ने मौका दिया लेकिन उन्होंने जनता को निराश किया.'

चाचा प्रकाश सिंह बादल और चचेरे भाई सुखबीर सिंह बादल से नाराज होकर मनप्रीत ने 2011 में अपनी पार्टी बनाई थी

दूसरा बड़ा कारण यह रहा कि वह खुद बादल परिवार से आते हैं. चूंकि वह सरकार में शामिल रहे थे इसलिए लोग उनसे स्वाभाविक तौर पर नहीं जुड़ पाए. लोग इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए कि वह एक अलग व्यक्ति हैं. 

मनजीत ने कहा, 'बादल होना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रही. वह अपने आप को बादल से अलग साबित नहीं कर पाए.' मनप्रीत भी इस सच को स्वीकार करते हैं कि बादल होना उनके लिए बड़ी चुनौती रही. 

खबरों के मुताबिक मनप्रीत इस बात को मानते हैं कि पंजाब के  लोगों को अब बादल से एलर्जी होने लगी है. उनके पिता गुरदास को प्रकाश सिंह बादल से करीबी रिश्तों के लिए जाना जाता है.

जल्दबाजी में हुआ नुकसान

मनप्रीत राज्य की सियासत में मौजूद खाली जगह को भरने की जल्दबाजी में थे. विश्लेषकों का कहना है कि उन्हें यह काम जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए था बल्कि इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाना चाहिए था.

2012 में तीन दलों के साझा मोर्चा के बावजूद पीपीपी पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई

किसी भी राजनीतिक पार्टी को राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने में समय लगता है. 2012 के विधानसभा चुनावों में बड़े परिणाम की उम्मीद करना बेवकूफी थी क्योंकि पार्टी को अस्तित्व में आए महज 18 महीने ही हुए थे. 

पीपीपी ने सीपीआई, सीपीएम और शिरोमणि अकाली दल (लोंगोवाल) को मिलाकर साझा मोर्चा बनाया था. लेकिन मोर्चा एक भी सीट जीतने में विफल रहा. हालांकि उसे कुल मतों का करीब 6 फीसदी वोट मिला.

इसके बाद एक और बड़ा कदम उठाते हुए उन्होंने लोकसभा चुनाव में सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर बादल के खिलाफ चुनाव लड़ा. हालांकि वह थोडे़ वोटों से ही सही लेकिन हार गए. 

इस बार मनप्रीत ने कांग्रेस से हाथ मिलाया था. कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर लड़ने के फैसले के पीछे का तर्क देते हुए उन्होंने कहा कि वह मतदाताओं को भ्रमित नहीं करना चाहते थे.

पीपीपी ने एक सीट पर लोकसभा चुनाव लड़ा और वह भी कांग्रेस के चुनावी चिह्न पर. इसके बावजूद पार्टी की अपनी अलग पहचान कहीं नहीं दिखी. मनजीत ने कहा, 'शायद उन्हें अपने दम पर चुनाव लड़ने का भरोसा नहीं रहा होगा. जबरदस्त और प्रभावी नेता होने के बावजूद जमीनी स्तर की राजनीति वह नहीं संभाल पाए.'

देश फिलहाल वैसी स्थिति से गुजर रहा है जहां नए तरह की राजनीति आकार ले रही है. मनप्रीत ने जिस तरह से कॉरपोरेट शैली की राजनीति की शुरुआत की, वह नए समय की मांग के मुताबिक नहीं थी. 

मनप्रीत ने वित्तीय प्रबंधन में गड़बड़ी को लेकर इस्तीफा दिया था लेकिन वह इस मुद्दे को लेकर लोगों को उस तरह से अपने पक्ष में नहीं जोड़ पाए जैसे केजरीवाल और उनकी पार्टी करने में सफल रही. केजरीवाल अक्सर वित्तीय मामलों को उछालते रहे हैं.

यह भी कहा जाता है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान वह अपने करीबियों मसलन पूर्व विधायक जगबीर सिंह बरार, हरनेक सिंह घारुन, पूर्व डिप्टी स्पीकर बीर देविंदर सिंह, भगवंत मान और कुशलदीप ढिल्लन को अपने साथ जोड़े रखने में विफल रहे. भगवंत मान फिलहाल आम आदमी पार्टी के संगरुर से सांसद हैं.

अब पीपीपी के आधिकारिक तौर पर कांग्रेस में विलय होने के बाद भी पार्टी के महासचिव गुरप्रीत भट्टी, मुख्य प्रवक्ता नवज्योत दहिया और कपूरथला के प्रमुख गुरप्रीत राजा ने अपने आपको को इससे अलग रखा है. 

जाहिर तौर पर इस विलय की मदद से मनप्रीत अपने आप को पंजाब की राजनीति में फिर से खड़ा करना चाहेंगे. हालांकि इस बार उनकी कोशिश कामयाब हो पाती है या नहीं देखना होगा.

First published: 18 January 2016, 20:57 IST
 
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