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क्या ड्रग तस्करी की वजह से हुआ पठानकोट हमला?

राजीव खन्ना | Updated on: 12 January 2016, 8:42 IST
QUICK PILL
  • सूत्रों के मुताबिक पुलिस और सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी ड्रग तस्कारों के साथ मिलीभगत करते हैं. इसके बाद इन इलाकों से गुजरने वाले उन वाहनों की तलाशी नहीं ली जाती है जिनमें ड्रग्स होता है. हो सकता है आतंकियों ने इसी का फायदा उठाया हो.
  • सीमा से सटे गुरदासपुर, तरन तारन, पठानकोट, अमृतसर और फिरोजपुर में अफीम की कीमत 1.20 लाख रुपये प्रति किलो है जबकि पॉपी हस्क 4,000 रुपये किलो बिक रहा है. स्मैक के दो डोज की कीमत करीब 300 रुपये है जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन ड्रग्स की कीमत बेहद अधिक है.

पठानकोट हमले की जांच के आगे बढ़ने के साथ ही पंजाब में कानून-व्यवस्था की पोल खुलती जा रही है. विशेष तौर पर ड्रग्स माफिया, तस्कर, नेता, पुलिस और सीमा सुरक्षा बल और नौकरशाहों के बीच मिलीभगत की वजह से कथित तौर पर पठानकोट में हमला हुआ.

पंजाब के पूर्व डीजीपी एसएस विर्क बताते हैं राज्य में पुलिस और बीएसएफ के कर्मचारी तस्कारों के हाथों 'पुलिस और सुरक्षा चौकियों' को बेच देते हैं और इस वजह से आतंकवादी भारत में घुसने में सफल रहे. पिछले कुछ सालों में पंजाब के सीमाई इलाकों में ड्रग्स तस्करी में जबरदस्त तेजी आई है. 

मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने बताया कि 'पुलिस और नेताओं के संरक्षण में काम करने वाले गठजोड़' के बिना यह संभव ही नहीं है. वास्तव में कुछ नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं और एक बार फिर से ड्रग्स तस्करी में उनकी कथित भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

सूत्रों ने कैच को बताया कि यह जानकारी अब सामने आ चुकी है कि स्थानीय नेताओं की शह पर युवा तेजी से ड्रग्स ले रहे हैं. ड्रग्स पंजाब के युवाओं के लिए आम है और इसकी कीमत भी कम है.

सीमा से सटे गुरदासपुर, तरन तारन, पठानकोट, अमृतसर और फिरोजपुर में अफीम की कीमत 1.20 लाख रुपये प्रति किलो है जबकि पॉपी हस्क 4,000 रुपये किलो बिक रहा है. वहीं हेरोईन की कीमत 10 लाख रुपये प्रति किलोग्राम है. स्मैक के दो डोज की कीमत करीब 300 रुपये है जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन ड्रग्स की कीमत बेहद अधिक है.

सूत्रों ने बताया कि पुलिस ने केवल पिछले दो सालों में नशा करने वालों और ड्रग्स तस्करों के खिलाफ 18,000 से अधिक मामले दर्ज किए हैं. जबकि पुलिस अधिकांश मामलों में तस्कारों का साथ देती है. इसके बावजूद बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए गए हैं.

2013 में पूर्व डीएसपी जगदीश सिंह भोला ने इस बात को स्वीकार किया था कि उसने पिछले विधानसभा चुनाव में स्थानीय नेताओं को चंदा दिया था. भोला पर ड्रग्स का बड़ा रैकेट चलाने का आरोप है.

भोला ने मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया का नाम लेते हुए कहा था कि वह राज्य में ड्रग्स कारोबार के सबसे बड़े 'मास्टर माइंड' हैं. मजीठिया पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की बहू और मंत्री हरसिमरत कौर के भाई हैं. हालांकि मजीठिया ने यह कहते हुए इन आरोपों को खारिज कर दिया था कि राजनीति के तहत उन्हें बदनाम करने के लिए साजिश रची जा रही है.

उसी साल सत्ताधारी अकाली दल के नेता मणिंदर सिंह औलख उर्फ बिट्टू और जगजीत सिंह चहल को ड्रग्स तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया. औलख ने कथित तौर पर जांच कर रहे अधिकारियों को बताया कि वह सरकारी गाड़ियों की मदद से ड्रग्स की तस्करी किया करता था.

दांव पर

भारत और पाकिस्तान के सीमा के आर-पार कई तरीकों से ड्रग्स की तस्करी की जाती है. गुलेल की मदद से 3-4 किलोग्राम तक के पैकेट को सीमा के पार भेजा जाता है. खबरों के मुताबिक सीमा सुरक्षा बल 'चिड़िया समझकर' इन पैकेटों की तस्करी नजरअंदाज कर देती है.

तस्कर पीवीसी के पाइप में ड्रग्स भरकर उसे सीमा पार पहुंचाते हैं. हालांकि सबसे संगठित जरिया पुलिस और सीमा सुरक्षा बलों की तरफ से निगरानी चौकियों को 'बेचा' जाना है. तस्कर कथित तौर पर भारी रकम देकर सीमा सुरक्षा बल के जवानों को मैनेज कर लेते हैं और फिर वह उन वाहनों की चेकिंग नहीं करते हैं जिसमें ड्रग्स भरा होता है.

विर्क ने कहा, 'पुलिस और सीमा सुरक्षा बल में ऐसे कई लोग हैं जो यह काम करते हैं. 2007 के बाद से इन मामलों में तेजी आई है.' आतंकवादियों ने इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए सीमा में सेंध लगाई. उन्होंने कहा, 'बीएसएफ कभी भी आतंकवादियों का घुसपैठ नहीं होने देगी.' 'हो सकता है कि आतंकी ड्रग्स तस्कर के तौर पर भारत में घुसने में सफल रहे.'

विर्क ने करीब छह महीने पहले गुरदासपुर हमले की एनआईए से जांच कराए जाने को लेकर 'दबाव' डाला था 

27 जुलाई को गुरदासपुर में हुए हमले में तीन नागरिकों समेत चार पुलिसवाले मारे गए थे. मरने वाले में एसपी भी शामिल थे. इस आतंकी हमले में कम से कम 15 लोग मारे गए थे. हालांकि पुलिसिया कार्रवाई में तीनों आतंकियों को मार गिराया गया था.

पूर्व डीजपी ने कहा, 'यह कुछ वैसा ही मामला था जैसा कुछ साल पहले मुंबई में हुआ था. अगर दीना नगर हमले की सही तरीके से जांच की गई होती तो इस हमले को टाला जा सकता था.'

सुरक्षा के साथ खिलवाड़

पंजाब में कानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत के लिए सबसे बड़ी वजह महत्वपूर्ण पदों पर आईपीएस अधिकारियों को नियुक्त नहीं किया जाना है. सरकार इन पदों पर राज्य कैडर के अधिकारियों की भर्ती कर रही है. विपक्ष का आरोप है कि यह सब कुछ राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है.

कुछ रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के 27 जिलों में केवल बठिंडा, मुक्तसर और होशियारपुर में ही आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति की गई है. 9 जिलों में एसएसपी की कमान राज्य सरकार के कैडर के हाथों में हैं जिन्हें प्रोमोट कर आईपीएस बनाया गया है. बाकी जगहों पर पंजाब पुलिस सर्विस के अधिकारियों की नियुक्ति की गई है.

वास्तव में पठानकोट हमले के दौरान सीमाई जिलों में एक बतौर एसएसपी एक भी आईपीएस ऑफिसर की तैनाती नहीं की गई थी. विर्क बताते हैं, 'कुछ पीपीएस के अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं का कर्ज उतार रहे हैं.' वहीं अधिकांश आईपीएस अधिकारी अपने काम काज में राजनेताओं की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं करते हैं.

वहीं पंजाब के उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि 'पीपीएस के अधिकारियों की क्षमता पर सवाल उठाना सही नहीं है.' उन्होंने कहा कि दीना नगर और पठानकोट हमले के अलावा 'पिछले आठ सालों में एक भी ऐसा हादसा नहीं हुआ जबकि इन इलाकों में पीपीएस के अधिकारियों की ही नियुक्ति की गई थी.'

वहीं सभी विधानसभा क्षेत्रों में शिरोमणि अकाली दल के नेताओं को हल्का प्रभारी बनाए जाने का फैसला भी विवादों में है. इन नेताओं पर स्थानीय प्रशासन और पुलिस को 'आदेश' देने का आरोप है. कांग्रेस नेता सुनील जाखड़ इस मसले को विधानसभा में भी उठा चुके हैं. उन्होंने कहा, 'उन्होंने राज्य में पुलिस सिस्टम को तबाह कर दिया है और अब वहीं लोग पुलिस थाने चला रहे हैं. डीएसपी रैंक के अधिकारियों को हल्का प्रभारी को जवाब देना पड़ता है. इसके अलाव वह बड़े अधिकारियों को भी आदेश देते हैं.'

First published: 12 January 2016, 8:42 IST
 
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