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कांग्रेस के अस्तित्व की लड़ाई होंगे पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव

राजीव खन्ना | Updated on: 21 May 2016, 15:01 IST
QUICK PILL
  • पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के लिए पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव बेहद अहम है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर है. ले-देकर इन दोनों राज्यों में ही कांग्रेस के लिए उम्मीद है.
  • पंजाब में कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व पर भरोसा जताया है. सिंह प्रशांत किशोर के साथ मिलकर पार्टी की रणनीति को आगे बढ़ा रहे हैं.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक रहे हैं. ऐसे में अगर कांग्रेस बीजेपी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' की योजना को वाकई में रोकना चाहती है तो उसे अगले साल पंजाब और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना ही होगा.

उत्तराखंड और पंजाब के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति बहुत कमजोर है. वहीं उत्तराखंड और पंजाब में कांग्रेस की स्थिति थोड़ी बेहतर है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के लिए जीतना मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं क्योंकि यहां कांग्रेस मुख्य विपक्षी या सत्ताधारी है.

पंजाब कांग्रेस के लिए अहम राज्य है जहां कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़ रही है. राज्य में कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि 2019 के पहले पार्टी को बदलने का काम पंजाब से ही शुरू होगा.

राज्य की सत्ताधारी पार्टी शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है

राज्य की सत्ताधारी पार्टी शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है जो कांग्रेस के लिए वरदान साबित हो सकता है. आम आदमी पार्टी राज्य में पहली बार चुनाव लड़ रही है और यह चुनाव के समीकरणों को बदल सकती है.

आम आदमी पार्टी अकाली सरकार के खिलाफ पनप रहे जमीनी आक्रोश को भुनाने के साथ स्थानीय मुद्दों को बेहद तेजी से उठा रही है. मसलन पार्टी किसानी समस्या, ड्रग्स समस्या और राज्य में खराब होती कानून व्यवस्था को मुद्दा बना रही है. 

विश्लेषकों की माने तो अगर कांग्रेस पंजाब में आम आदमी पार्टी को नहीं रोक सकी तो उसे हर राज्य में आम आदमी पार्टी की चुनौती का सामना करना होगा. अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व वाली पार्टी पूरे भारत में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए काम कर रही है.

हालांकि आम आदमी पार्टी के साथ पंजाब में एक बड़ी समस्या मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नहीं होना है. पार्टी इसके अलावा जनता की भावना से जुड़े मुद्दों पर भी ठोस राय रखने में विफल रही है.

आम आदमी पार्टी पंजाब के लोगों की भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट राय रखने में विफल रहे हैं

वहीं अमरिंदर सिंह लगातार कड़ी मेहनत करते हुए प्रशांत किशोर की रणनीति को आगे बढ़ा रहे हैं. प्रशांत किशोर पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी और बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के साथ काम कर चुके हैं. दोनों ही चुनाव में वह अपने उम्मीदवारों को जिताने में सफल रहे. किशोर फिलहाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की कोशिशों में लगे हुए हैं.

अमरिंदर सिंह मनप्रीत बादल की पार्टी पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब (लोंगोवाल) का विलय कराने में सफल रहे हैं. किशोर कैप्टन अमरिंदर सिंह की छवि को जनता के बीच पहुंचाने के लिए कई कार्यक्रम कर रहे हैं. मसलन कॉफी विद कैप्टन और पंजाब दा कैप्टन जैसे कार्यक्रमों की मदद से वह सिंह को जनता के बीच पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.

राज्य कार्यकारिण की भारी भरकम टीम बनाने के बाद पार्टी की योजना जून से आक्रामक कैंपेन करने की है और इसके निशाने पर आम आदमी पार्टी होगी. 

असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु के चुनावी नतीजों पर अमरिंदर ने कहा, 'जीत या हार सेे कोई फर्क नहीं पड़ता. सबसे ज्यादा फर्क प्रदर्शन और भागीदारी से पड़ता है और इस मामले में पार्टी की स्थिति ठीक रही. कांग्रेस कमजोर हो सकती है लेकिन वह खत्म नहीं हुई है. मुझे यह समझ में नहीं आता कि बीजेपी वाले इस मामले में इतने उत्साहित क्यों हैं?'

सिंह ने कहा कि असम जीतने के अलावा बीजेपी अभी तक कोई बड़ा मुकाम नहीं हासिल कर पाई है. दूसरे राज्यों की बात तो छोड़ दीजिए.

आम आदमी पार्टी कांग्रेस पर निशाना साधने से चूक नहीं रही है. पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि कांग्रेस देश में अपना राजनीतिक वजूद खो चुकी है और लोगों का इस पार्टी पर भरोसा नहीं रहा.  पंजाब में कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना होगा.

मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि पंजाब चुनाव 'कांग्रेस की अंतिम यात्रा होगी.' हालांकि पंजाब में अकाली और बीजेपी की सरकार को जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए स्थिति अपेक्षाकृत मुश्किल है. विश्लेषकों का कहना है कि हरीश रावत के लिए उत्तराखंड में वापसी उतनी आसान नहीं होगी. विश्लेषकों के मुताबिक सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी लहर और पार्टी से निष्कासित 10 बागी विधायक हैं जिन्हें पार्टी ने राष्ट्रपति शासन के दौरान सत्ता से बेदखल कर दिया था. 

इनमें से 9 विधायकों ने पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के साथ मिलकर पार्टी से बगावत कर दिया था. जबकि 10वीं विधायक रेखा आर्या शक्ति परीक्षण के दिन बीजेपी के खेमे में चली गई थीं.

देहरादून के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, 'इन 10 जीत हुए विधायकों में पार्टी उन्हीें को टिकट देगी जिनके जीतने की संभावना ज्यादा है. बीजेपी वोट के स्थानांतरण के लिए आरएसएस पर निर्भर करेगी जो उनके लिए बड़ा फायदा होता है.'

पत्रकार ने कहा कि स्टिंग के सामने आने के बाद रावत के खिलाफ लोगों में गुस्सा है. रावत स्टिंग में कथित तौर पर अपनी सरकार बचाने के लिए विधायकों को खरीदते हुए दिखाई रहे थे.

कांग्रेस पंजाब में आम आदमी पार्टी को नहीं रोक सकी तो उसे हर राज्य में आप की चुनौती का सामना करना होगा

उन्होंने कहा, 'हालांकि इसके बावजूद उनके पक्ष में कई चीजें हैं. कांग्रेस को लगता है कि जिस तरह से उसकी सरकार को उत्तराखंड में बर्खास्त किया गया, उससे लोगों के मन में उसके प्रति सहानुभूति पैदा होगी. दूसरा वह लगाातार दूसरी बार ठाकुर नेता को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ाने में सफल रही है. ठाकुर समुदाय के विधायकों की संख्या उत्तराखंड विधानसभा में बहुत ज्यादा है. इसके साथ ही उन्हें मुस्लिम मतदाताओं का भी समर्थन मिल रहा है जिनकी राज्य में करीब 15 फीसदी आबादी है.'

रावत के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि वह कड़ी मेहनत करने वाले नेता हैं. विश्लेषकों का कहना है कि 18 मार्च को जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा तब वह इस लड़ाई को कांग्रेस के बागी विधायकों के चुनाव क्षेत्र तक ले गए. 

विश्लेषकों के मुताबिक, 'रावत ने सफलतापूर्वक लोकतंत्र बचाओ यात्रा का आयोजन किया. उन्होंने विधानसभा चुनाव के पहले तक 70 विधानसभा क्षेत्र का दौरा करने की योजना बनाई है. सेवा दल की पृष्ठभूमि होने और बेहतरीन राजनीतिक प्रबंधन होने के कारण उनमें स्थितियों को अपने मुताबिक बदलने का हुनर है.' 

First published: 21 May 2016, 15:01 IST
 
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