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अमृता प्रीतम के बाद ज्ञानपीठ पाने वाले दूसरे पंजाबी लेखक गुरदयाल सिंह नहीं रहे

कैच ब्यूरो | Updated on: 17 August 2016, 12:40 IST
(एजेंसी)

पंजाबी लेखक और सुप्रसिद्ध उपन्यासकार गुरदयाल सिंह का 83 साल की उम्र में मंगलवार को बठिंडा में निधन हो गया. बताया जा रहा है कि गुरदयाल सिंह लंबे समय से बीमार चल रहे थे.

मंगलवार को फरीदकोट के मैक्स अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन पर साहित्य जगत ने गहरी शोक संवेदना जताई है.अमृता प्रीतम के बाद वह दूसरे पंजाबी साहित्यकार थे, जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

सिंह के निधन पर शोक जताते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा,  "वे सर्वाधिक नामचीन पंजाबी लेखकों में शामिल थे और उन्होंने हमेशा अपने उपन्यासों और लघु कहानियों के माध्यम से ग्रामीण पंजाब में रहने वाले आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित लोगों का चित्रण किया."

जैतो में 1933 में जन्म

गुरदयाल सिंह का जन्म 10 जनवरी, 1933 को पंजाब के जैतो में हुआ था. 12-13 वर्ष की आयु में उन्हें पारिवार की खराब आर्थिक परिस्थितियों के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा और पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाना पड़ा.

उनके पिता पेशे से बढ़ई थे, लेकिन गुरदयाल सिंह ने स्कूल छोड़ देने के बाद भी अपने स्कूल के प्रधानाध्यापक से संपर्क बनाए रखा, जिन्होंने गुरदयाल की प्रतिभा को पहचाना और अपना अध्ययन निजी तौर पर जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया.

गुरदयाल सिंह ने स्कूल छोड़ने के करीब 10 वर्ष बाद स्वतंत्र छात्र के रूप में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की. उसके बाद उन्हें एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गई.

पटियाला यूनिवर्सिटी में रीडर

उसके बाद उच्च शिक्षा लेकर वे लेक्चरर बने और 15 साल बाद पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में रीडर बने और फिर प्रोफेसर के पद से सेवामुक्त हुए. 

1966 में गुरदयाल सिंह पहला उपन्यास "मढ़ी दा दीवा" प्रकाशित हुआ, जिससे उन्हें पूरे देश में ख्याति मिली. इस उपन्यास में एक दलित और एक विवाहित जाट महिला के मौन प्रेम की नाटकीय प्रस्तुति थी.

यह एक दुखांत प्रेम कहानी थी. यह कहानी इतनी सहजता और सरलता से अभिव्यक्त की गई कि पाठक कथाशिल्प पर उनकी अद्भुत पकड़ और अपने पात्रों व सामाजिक परिवेश की उनकी गहरी समझ से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके.

इसमें दलित वर्ग की ग़रीबी और उनके भावात्मक असंतोष का वर्णन अत्यंत सहजता से किया गया. इसी कारण पूरे लेखकीय जीवन में उन्हें मित्रहीन के मित्र की तरह जाना जाता रहा है.

कई उपन्यासों की रचना

गुरदयाल सिंह के लिखे उपन्यासों में मढ़ी दा दीवा (1966), अणहोए (1966), रेत दी इक्क मुट्ठी (1967), कुवेला (1968), अध चानणी रात (1972) प्रमुख हैं.

उन्हेंने सग्गी फुल्ल (1962), चान्न दा बूटा (1964), रूखे मिस्से बंदे (1984), बेगाना पिंड (1985) और करीर दी ढींगरी (1991) जैसी कहानियां भी बेहद चर्चित थीं.

1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार

साहित्य में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने साल 1998 में पद्मश्री से नवाजा था. इसके अलावा साल 1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया.

उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, नानक सिंह उपन्यासकार पुरस्कार (1975), सोवियत नेहरू पुरस्कार (1986) आदि से भी सम्मानित किया गया. उनके उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘मढ़ी दा दीवा’ को 1989 में पंजाबी भाषा की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया था.

सिंह के उपन्यास ‘अन्ने घोड़े दा दान’ पर आधारित एक अन्य फिल्म को ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर चुना गया था. गुरदयाल सिंह का अंतिम संस्कार 18 अगस्त को सुबह 10 बजे उनके पैतृक गांव जैतो में किया जाएगा.

First published: 17 August 2016, 12:40 IST
 
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