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खूब जमेगा रंग, जब मिल बैठेंगे मुलायम-मुख्तार संग

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 21 June 2016, 14:21 IST

चुनावी साल में नए समीकरण, नए जोड़तोड़ और नए गठबंधनों का सिलसिला शुरू हो गया है. राज्यसभा चुनावोंं से पहले अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा समेत पुराने साथियों को बटोर कर मुलायम सिंह ने जातीय गुणा-भाग दुरुस्त किया था. अब खबर है कि वे अपने ऊपर लग रहे मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के आरोपों को भी धोना चाहते हैं. सपा और पूर्वांचल के बाहुबली मुख्तार अंसारी की सियासी तंजीम कौमी एकता दल चुनाव से पहले एक हो गई है..

शनिवार को गाजीपुर जिले के मुहम्‍मदाबाद स्थित अफजाल अंसारी के आवास पर हुई कौमी एकता दल की बैठक में यह निर्णय लिया गया. गाजीपुर अंसारी का गृह जिला है. इस बैठक में कौमी एकता दल के सभी पदाधिकारी राष्‍ट्रीय व प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्‍य शामिल थे.

लंबे समय से सपा और कौमी एकता दल के बीच विलय या फिर विधायकों के सपा में शामिल होने को लेकर बहस चल रही थी. चर्चा यह भी थी कि कौमी एकता दल विलय की बजाय सपा से गठबंधन की कोशिश कर रही थी. हालांकि इस विचार को अखिलेश यादव ने सीधे नकार दिया था.

विलय की पूरी शर्तें तो सामने नहीं आ सकी हैं लेकिन खबर है कि पार्टी के दो विधायकों में से एक और मुख्तार अंसारी के भाई सिबगतुल्लाह अंसारी को अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में मंत्री पद से नवाजा जाएगा. पार्टी के दूसरे विधायक खुद मुख्तार अंसारी हैं. संभवत: इसी कारण से बीते 18 जून को प्रस्तावित अखिलेश यादव मंत्रिमंडल के विस्तार को टाल दिया गया था.

अखिलेश उन्हीं फार्मूलों की ओर लौट रहे हैं जिसे उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने ईजाद किया था

इसके अलावा अगले चुनाव में सपा मुख्तार कुनबे के कई सदस्यों को टिकट देगी. इनमें मुख्तार और अफजाल के दोनों बेटे भी शामिल हैं.

बहरहाल शनिवार को मुहम्मदाबाद में हुई बैठक के बाद कौमी एकता दल के पदाधिकारियों ने निर्णय लिया कि पार्टी के संस्‍थापक और अध्यक्ष अफजाल अंसारी जो फैसला लेंगे वह पूरी पार्टी को मान्य होगा.

मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी ने बताया कि पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की भावनाओं के अनुरुप वह समझौते की योजना बनाकर लखनऊ जा रहे हैं. शीघ्र ही सपा के बड़े नेताओं के साथ बैठक कर विलय की घोषणा कर दी जाएगी. किस तारीख को विलय हो सकता है, इस सवाल को अफजाल अंसारी टाल गए. उन्‍होंने कहा कि यह कहना अभी बहुत ही जल्‍दबाजी होगी. हम सपा के नेताओं के साथ बातचीत कर कोई निर्णय लेंगे.

शनिवार को अंसारी स्कूल में कौमी एकता दल की बैठक को लेकर सरगर्मियां तेज थी. दल के राष्ट्रीय, प्रदेश सहित कई जिलों के पदाधिकारियों ने शिरकत की. सबने एक स्वर से कहा कि वक्त का तकाजा है कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए सारे राग-द्वेष भुला कर उनके खिलाफ लामबंद हुआ जाए.

सभा में मौजूद वक्ताओं ने एकसुर से कहा कि सपा ही वह पार्टी है जो सांप्रदायिक ताकतों को करारा जवाब दे सकती है. उसकी मजबूती के लिए उसका साथ दिया जाए.

अफजाल अंसारी ने कौमी एकता दल के सपा में विलय को बिहार के प्रयोग से सही ठहराने की कोशिश भी की. उन्होंने कहा, सांप्रदायिक ताकतों से देश को बचाने के लिए बिहार में नीतीश-लालू अपना सारा विरोध भूल कर एक हो गए. इस सूबे में भी वक्त की यही मांग है. लिहाजा दल इसको लेकर गंभीर है.

अंसारी और उनकी पार्टी के सपा में आगमन के कुछ और भी संदेश हैं. मसलन अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी 2012 से बहुत आगे बढ़ चुके हैं. गोमती का पानी साफ हुआ हो या नहीं लेकिन बह बहुत चुका है. अखिलेश यादव 2012 के विधानसभा चुनाव के पहले एक चमकता हुआ ताजातरीन चेहरा थे. उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव की सपा में एंट्री रोक दी थी और मीडिया की आंखो का तारा बन गए थे.

पांच साल सत्ता में रहने के बाद अब शायद अखिलेश यादव बहुत कुछ सीख चुके हैं. इस फैसले का दूसरा संदेश यह हैै कि बीते पांच सालों में अखिलेश अपनी कोई मौलिक शैली विकसित नहीं कर सके हैं, वे उन्हीं फार्मूलों की ओर लौट रहे हैं जिसे उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने ईजाद किया था. इस लिहाज से 2017 का अखिलेश 2012 के मुकाबले अलग है, समझौतापरस्त है और उल्टी दिशा में चल रहा है.

मुख्तार अंसारी का राजनीतिक इतिहास

मुख्तार अंसारी वर्ष 1996 में मऊ सीट से बसपा के टिकट पर विधायक चुने गये थे. इसके बाद वे 2002 व 2007 में वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे और जीत हासिल की. 2007 में मुख्तार अंसारी और उनके भाई अफजाल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में शामिल हो गए.

2010 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने अंसारी बंधुओं को अपनी पार्टी से निकाल दिया था.

बसपा प्रमुख मायावती ने रॉबिनहुड के रूप में मुख्तार अंसारी को प्रस्तुत किया और उन्हें गरीबों का मसीहा भी कहा था. मुख्तार अंसारी ने जेल में रहते हुए बसपा के टिकट पर वाराणसी से 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वह बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी से 17,211 मतों के अंतर से हार गए. उन्हें जोशी के 30.52% मतों की तुलना में 27.94% वोट हासिल हुए थे.

दोनों भाइयों को 2010 में बसपा से निष्कासित कर दिया गया. 2012 के विधानसभा चुनाव के पूर्व मुख्तार ने कौमी एकता दल का गठन किया. इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व सांसद अफजाल अंसारी हैं. इस पार्टी को विधानसभा चुनाव में सिर्फ दो सीटें मिली जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी कोई भी सीट जीतने में असफल रही.

सपा की मजबूरी

पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी सिर्फ पांच जीतने में कामयाब रही. ये सभी सीटें मुलायम परिवार के सदस्यों ने जीती है. बीजेपी गठबंधन को 73 सीटें मिली थी. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सपा पिछले लोकसभा में मिली चुनावी हार से सहमी हुई है. इसलिए सपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल और पूर्वांचल में कौमी एकता दल से विलय या गठबंधन करने के लिए आतुर नजर आ रही है.

जानकारों का मानना है कि अंसारी बंधुओं के पार्टी में आने से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की साफ-सुथरी छवि का नुकसान होना तय है. अखिलेश अक्सर यूपी के बाहुबली नेताओं से दूरी बनाकर चलते रहते हैं. पिछले महीने अखिलेश  कौशाम्बी जिले में सरकारी कार्यक्रम में पहुंचे थे.

उस कार्यक्रम का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था, जिसमें हजारों लोगों के सामने अखिलेश पूर्व सांसद और बाहुबली नेता अतीक अहमद से कोई बात करने के बजाय उन्हें हाथ से पीछे ढकेलते हुए दिखाई दिए. उस समय कहा गया कि अखिलेश यादव यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी पार्टी में अब दागी नेताओं को पहले जितनी तवज्जों नहीं मिल सकेगी.

पूर्वांचल में ओवैसी-योगी की चुनौती

हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी यूपी चुनाव 2017 के लिए अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं. वे मुसलमान और दलित वोटों के सहारे अपनी चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश कर रहे हैं. ओवैसी का पूरा ध्यान पूर्वांचल पर है. अप्रैल महीने में ओवैसी मुलायम के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में रैली करने की कोशिश में थे, लेकिन उन्हें प्रशासन से इजाजत नहीं मिली.

अगर ओवैसी पूर्वांचल के सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारते हैं, तो सपा को मुस्लिम वोटों का नुकसान हो सकता है. कहा जा रहा है कि ओवैसी की काट के लिए सपा अंसारी बंधुओं पर लगे आरोपों को भूलकर उन्हें पार्टी में शामिल कर रही है, जिससे वोटों के नुकसान को रोका जा सके.

वहीं गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ और मुख्तार अंसारी की राजनीतिक दुश्मनी पुरानी है. 2005 में मऊ में दंगे हुए थे. मऊ दंगों के दौरान विधायक मुख्तार अंसारी ने भी योगी आदित्यनाथ पर आरोप लगाया था कि उन्हीं के कारण  दंगा भड़का, जबकि योगी का आरोप था कि सपा सरकार के संरक्षण में अंसारी ने दंगे करवाए.

उम्मीद जताई जा रही कि जल्द ही बीजेपी में लोकसभा में दो सीट जीतने वाली अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल का विलय हो सकता है. पूर्वांचल में पटेल की पार्टी का कुछ सीटों पर खासा प्रभाव हैं. अब यह देखने वाली बात होगी कि अंसारी बंधु पूर्वांचल में सपा को नुकसान पहुंचाते या फायदा?

(ये कॉपी मंगलवार दो बजे संशोधित की गई है)

First published: 21 June 2016, 14:21 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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