Home » इंडिया » Rafale: how the "mother of all deals" ended up like an "unplanned child"
 

रफेल की राह में बहुत रोड़े रहे हैं

सुहास मुंशी | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • शुरुआत में रफेल डील को लेकर भारत की स्थिति मजबूत थी, वह अपनी शर्तों पर बातचीत करने के लिए फ्रांस को बाध्य कर सकता था. लेकिन कतर और मिस्र से ऑर्डर मिलने के बाद फ्रांस का रुख अड़ियल दिखने लगा है.
  • शुरुआत में 36 जेट की कीमत करीब 4 अरब डॉलर रहने की उम्मीद थी और मीडिया में आई कई खबरों की माने तो यह कीमत अब करीब दोगुनी हो चुकी है. हालिया आकलन के मुताबिक यह कीमत 9 अरब डॉलर यानी करीब 60,000  करोड़ रुपये हो चुकी है.

इसकी शुरुआत 126 लड़ाकू विमानों को खरीदे जाने के विचार से हुई थी और इसके लिए 2012 में फ्रांसीसी कंपनी रफेल का चयन किया गया. 2014 के आस-पास यह बातचीत पटरी से उतर गई. अप्रैल 2015 तक इस बारे में कहीं कोई खबर नहीं आई और कुछ दिनों बाद ही जब प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस का दौरा किया तब फ्रांस से 36 रफेल लड़ाकू विमानों को खरीदने की खबर सामने आई. 

लेकिन कई सालों की बातचीत के बाद भी अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि इस नई डील के लिए भारत को कितनी कीमत चुकानी होगी. यही वजह है कि दोनों देशों के बीच सरकारी समझौता होने के बावजूद कोई उत्साह नजर नहीं आ रहा है. सोमवार को भारत और फ्रांस के बीच इस समझौते पर हस्ताक्षर हुआ.

रफेल डील अब तक का सबसे बड़ा समझौता है लेकिन इसके बावजूद एक बड़े विशेषज्ञ के मुताबिक 'यह कुछ वैसे बच्चे की कहानी है जो दुर्घटनावश पैदा हो गया.' अगर रफेल डील को लेकर कुछ मतलब निकलता है तो यह कि फ्रांस के लिए यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है. भारत ने बातचीत के बाद रफेल जेट खरीदे जाने को मंजूरी दे दी है. यह ऐसा कुछ है जिसे फ्रांस लंबे समय से पूरा करने की कोशिश कर रहा था. फ्रांस की कोशिश इस डील को पूरा करने की थी ताकि राष्ट्रपति फ्रांसुवा ओलांद के भारत दौरे के दौरान संयुक्त बयान जारी किया जा सके.

फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था के लिए यह सौदा बेहद अहम है. भारत के नजरिये से यह सौदा इसलिए भी अहम है क्योंकि उसका लड़ाकू विमानों का जखीरा तेजी से पुराना पड़ रहा है और उसे नए विमान बेड़े की सख्त जरूरत है. हालांकि हमें यह समझने की जरूरत है कि किस तरह से फ्रांसीसी लड़ाकू विमान की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है और यह भी समझने की जरूरत है कि भारत को क्यों इस डील को जल्द ही अमल में लाने की जरूरत है.

भारत को लड़ाकू विमानों की जरूरत क्यों है?

Modi

भारतीय वायु सेना 2001 से ही मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) खरीदने की इच्छुक रही है. वायु सेना को पता है कि अगले कुछ दशकों में उसका लड़ाकू विमानों का बेड़ा नई जरूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम नहीं रहेगा.

वायु सेना को 44 स्क्वाड्रंस की जरूरत है जबकि वह मौजूदा 32 स्क्वाड्रंस से काम चला रही है. इसमें से 14 स्क्वाड्रंस पुराने पड़ चुके मिग-21 और मिग-27 का है जिसे 2017 के बाद से हटाना शुरू कर दिया जाएगा. अन्य स्क्वाड्रन में मिराज-2000 और जगुआर है जिसे अपग्रेड किया जा रहा है.

इस समय भारत के पड़ोसी देश अपनी वायु सेना का आधुनिकीकरण करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं. वहीं चीन पश्चिम देशों के प्रतिबंध की वजह से रूस के साथ मिलकर लड़ाकू विमानों को बनाने में लगा हुआ है. जेएफ-17 इसी का नतीजा है और इसके अलावा कई अन्य परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है.

पाकिस्तान भी अमेरिका की मदद से अपनी वायु सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है. एफ-16 की बिक्री को अस्थायी तौर पर रोक दिया गया था लेकिन अब खबरों के मुताबिक इस दिशा में बातचीत शुरू की जा चुकी है.

36 रफेल की मदद से भारतीय वायु सेना को दो स्क्वाड्रन बनाने में मदद मिलेगी और इनकी मदद से वह पूरे उपमहाद्वीप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकेगा.

तो फिर भारत क्यों नहीं खरीद रहा है लड़ाकू विमान?

हालांकि डील से जुड़ी अन्य बातों पर सहमति बन चुकी है लेकिन पिछले डेढ़ सालों की बातचीत के दौरान वित्तीय लेन-देन को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई है. यही वजह है कि दोनों देशों ने एक बार फिर से बाचतीत शुरू की है.

2012 में भारत मजबूत स्थिति में था जब वह 126 लड़ाकू विमानों के बदले में 12 अरब डॉलर का भुगतान करने को तैयार था और इस दौरान अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, यूरोप और स्वीडन इस कॉन्ट्रैक्ट के लिए हाथ पांव मार रहे थे. 

उस वक्त भारत फ्रांस को अपनी शर्तों पर बातचीत के लिए राजी कर सकता था क्योंकि उसके लिए इस कॉन्ट्रैक्ट का मतलब 7,000  लोगों की नौकरी होती. इतना ही नहीं दसां एविएशन के 500 कॉन्ट्रैक्टर्स को काम मिलता जिन्हें उस वक्त जबरदस्त मंदी का सामना करना पड़ रहा था.

हालांकि 22 अरब डॉलर की रकम की वजह से दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत टूट गई. बाद में भारत ने बने बनाए 36 रफेल का ऑर्डर दिया. भारत दबाव बनाने की हालत में इसलिए भी नहीं रहा क्योंकि मिस्र और कतर ने 24 रफेल विमानों का ऑर्डर फ्रांस को दिया और फिर इसके बाद रफेल को भारत के साथ अपनी शर्तों पर बातचीत करने की ताकत मिली.

शुरुआत में 36 जेट की कीमत करीब 4 अरब डॉलर पड़ने की उम्मीद थी और मीडिया में आई खबरों की माने तो यह कीमत अब करीब दोगुनी हो चुकी है. हालिया आकलन के मुताबिक यह कीमत 9 अरब डॉलर यानी करीब 60,000  करोड़ रुपये हो चुकी है. यह केवल एयरक्राफ्ट के बारे में नहीं है बल्कि भारत और फ्रांस ऑफसेट प्रावधानों को लेकर भी बातचीत कर रहे हैं.

क्या है ऑफसेट

पूरी दुनिया में होने वाले डिफेंस डील में ऑफसेट का प्रावधान होता है. यह एक तरह से शर्त होती है जिसे विक्रेता को पूरा करना होता है. मसलन भारत रफेल समझौते के बदले में फ्रांस से कुछ क्षेत्र विशेष में निवेश करने को कह सकता है. भारत में 300 करोड़ रुपये से ऊपर के समझौते में ऑफसेट की लागत 30 फीसदी होती है.

अभी तक फ्रांस भारत के ऑफसेट प्रावधानों का विरोध कर रही है क्योंकि उसका कहना है कि वह उसी कीमत पर भारत को रफेल बेच रही है जिस कीमत पर वह फ्रांसीसी वायु सेना को इसकी बिक्री करती है. हालांकि इस बीच फ्रांस ने आने वाले सालों में 10 अरब डॉलर का निवेश किए जाने की घोषणा की है.

तो क्या 36 लड़ाकू विमान भारतीय वायु सेना के लिए काफी है?

जवाब है नहीं. शुरुआती126 ऑर्डर के साथ भारत की योजना 6 स्क्वाड्रन बनाने की थी. हालांकि अब यह योजना खत्म हो चुकी है तो भारत की योजना मौजूदा ऑर्डर के साथ 2 नए स्क्वाड्रन बनाने की है. संभव है कि आने वाले दिनों में भारत अपने यहां संयंत्र बना कर या दसॉ और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के साथ करार कर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर और अधिक रफेल विमानों को अपने बेड़े में शामिल करेगा.

First published: 27 January 2016, 8:02 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

प्रिंसिपल कॉरेसपॉडेंट, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में आने से पहले इंजीनियर के रूप में कम्प्यूटर कोड लिखा करते थे. शुरुआत साल 2010 में मिंट में इंटर्न के रूप में की. उसके बाद मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मेल टुडे में बाइलाइन मिली.

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