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घमासान के बीच शांतिदूत की भूमिका में राहुल गांधी

आकाश बिष्ट | Updated on: 10 July 2016, 8:14 IST
(कैच)

राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के नए शांतिदूत बन गए हैं. पार्टी उपाध्यक्ष विभिन्न प्रदेशों की कांग्रेस इकाइयों के बीच मतभेद दूर करा रहे हैं. राहुल इसके लिए प्रतिद्वंद्वी गुटों को आमने सामने बिठाकर उनका परस्पर मनमुटाव दूर करा रहे हैं.

गुरुवार को राहुल केरल के 60 नेताओं से मिले ताकि राज्य के कांग्रेसी गुटों के बीच सुलह कराई जा सके. ये बैठक शुक्रवार तक जारी रही. राहुल तमिलनाडु और महाराष्ट्र में भी ऐसी बैठकें करने वाले हैं. गौरतलब है कि इन राज्यों में भी प्रदेश कांग्रेस अंदरूनी गुटबाजी की शिकार है.

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एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कहते हैं, "इसका मकसद अलग अलग गुटों में सौहार्द्रपुर्ण तरीके से समझौता कराना है ताकि पार्टी एकजुट होकर मुश्किल हालात का सामना कर सके."

हाल ही कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी ये कहकर छोड़ दी थी कि राहुल उन्हें मिलने का समय ही नहीं देते.

असम में भारी नुकसान

पार्टी को सबसे बड़ा नुकसान असम में हेमंत बिस्व सर्मा के जाने से हुआ. सर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से मतभेद के बाद पार्टी छोड़ दी थी. सर्मा राज्य विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हो गए और राज्य में पहली बार बीजेपी की सरकार बनाने में उनकी अहम भूमिका रही.

अरुणाचल प्रदेश में भी इसी तरह कांग्रेस अंदरूनी कलह की शिकार हुई. राज्य में बागियों ने कांग्रेस की सरकार गिरा दी और बीजेपी की सरकार बनाने में मदद की. उत्तराखंड में भी अंदरूनी कलह की शिकार हुई पार्टी बहुत मुश्किल से अपनी सरकार बचा सकी.

बदलाव जरूरी है, कांग्रेस के पास अब वक्त नहीं है

जिन राज्यों में कांग्रेस गुटबाजी की शिकार हुई उन सब में बागी नेताओं की शिकायत थी कि राहुल गांधी ने उनकी समस्याओं और शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया था. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के अनुसार ऐसे कई नेताओं ने कुछ पत्रकारों से भी राहुल से मुलाकात कराने के लिए मदद मांगी थी.

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी ऐसे ही कारणों से पार्टी से अलग हो गए. मेघालय के कांग्रेसी नेता भी ऐसी ही कहानियां सुनाते हैं.

केरल में हार की जिम्मेदारी

राहुल केरल में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वीएम सुधीरन और ओमन चांडी तथा रमेश चेन्नीथला के प्रतिनिधियों से मिले. ये नेता प्रदेश कांग्रेस में आमूलचूल बदलाव चाहते हैं. केरल कांग्रेस में दो मजबूत धड़े हैं. दोनों गुटों के नेता हालिया विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ते हैं.

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चांडी और चेन्नीथला सुधीरन को पार्टी से निकालने की मांग करते रहे हैं. केरल प्रदेश कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, "राहुल गांधी का सीधा संदेश था कि गुटबाजी में शामिल लोगों को लिए पार्टी में कोई जगह नहीं."

प्रदेश इकाई के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार राहुल की दो दिवसीय बैठक के बाद पार्टी के दोनों गुटों का आपसी मतभेद सुलझ जाएगा.

तमिलनाडु में आरोप-प्रत्यारोप

तमिलनाडु में प्रदेश कांग्रेस के अंदर कई गुट हैं. इनमें से एक गुट को पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम का संरक्षण हासिल है. तमिलनाडु प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष केवी थांगकबालु और कृष्णस्वामी और दो बार विधायक हो चुके वसंत कुमार इत्यादि राज्य में प्रभावशाली नेता हैं.

राज्य में पार्टी की अदंरूनी गुटबाजी की वजह से ईवीकेएस एलनगोवान को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा. वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के एतराज के बावजूद एलनगोवान दो साल तक राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे. विपक्षी गुटों ने उनपर हालिया विधानसभा चुनाव में डीएमके के संग गुपचुप समझौते का आरोप लगाया.

महाराष्ट्र में मतभेद

महाराष्ट्र में हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता गुरुदास कामत ने इस्तीफा दे दिया था. बाद में उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया. उनका महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस में संजय निरुपम से कामत के मतभेद जगजाहिर हैं.

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पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि इन दोनों नेताओं की आपसी रंजिश नहीं दूर हुई तो प्रदेश में पार्टी का भविष्य उज्जवल नहीं है. पार्टी के एक अंदरूनी सूत्र के अनुसार दोनों के बीच समझौते का मसौदा तैयार है. समझौते के बाद दोनों गुट एकजुट होकर सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभाएंगे.

राहुल की इस सारी कवायद का नतीजा क्या निकलेगा ये तो वक्त बताएगा. कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यालय के एक नेता कहते हैं, "इससे पार्टी में लोगों को अपनी शिकायतें सामने रखने का मौका मिलेगा, पार्टी में पारदर्शिता आएगी जिससे वो मजबूत होगी."

First published: 10 July 2016, 8:14 IST
 
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