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ऐसा रहा तो राहुल गांधी कांग्रेस में पीढ़ीगत बदलाव के इंतजार में ही बूढ़े हो जाएंगे

आकाश बिष्ट | Updated on: 8 April 2016, 7:53 IST
QUICK PILL
  • राहुल गांधी के एक करीबी दावा करते हैं कि राहुल युवा चेहरों को चुनाव \r\nलड़ने का मौका देना चाहते हैं. उनका तो ये भी मानना है कि अगर नए युवा \r\nचुनाव हार भी जाते हैं तो उन्हें क्षेत्र में काम करने का मौका मिलना \r\nचाहिये.
  • वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अगर टिकट बंटवारे में राहुल की \r\nमर्जी चली तो पार्टी के चुनाव हारने पर हार की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी उनकी ही \r\nहोनी चाहिए.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का विधानसभा चुनावों में युवाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने का विचार उनकी अपनी पार्टी में ही उनकी इच्छानुसार लागू नहीं हो पा रहा है. नई पीढ़ी के हाथ में पार्टी का हस्तांतरण राहुल के गले में फंस गया है.  2016 में जारी विधानसभा चुनाव इस बात को पूर्णतः साबित करते हैं.

हालांकि असम में उनकी बात का कुछ हद तक असर दिखा है. लेकिन पश्चिम बंगाल में उनका यह विचार औंधे मुंह गिर गया. यहां कांग्रेस उम्मीदवारों की औसत आयु 65 वर्ष है. पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस ने एक 91 वर्ष के व्यक्ति को भी पार्टी उम्मीदवार बना दिया है.

यही दशा केरल की भी दिख रही है. वहां चुनाव लड़ रहे 83 उम्मीदवारों में से मात्र 22 की उम्र 40 के नीचे है. हालांकि एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष रोजी जाॅन को अंगमाली से पार्टी ने टिकट दिया है.

केरल में चार दागी मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोपी होने और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और आलाकमान के विरोध के बावजूद टिकट दिया जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य में उम्मीदवारों के चयन में मुख्यमंत्री ओमान चांडी की चली है.

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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अतीत में बार-बार साफ छवि वाले युवाओं को चुनाव में उम्मीदवार बनाने की बात करते रहे हैं. लेकिन हर बार जिताऊ उम्मीदवारों का चयन करने की मजबूरी बताकर पार्टी को उनकी इच्छाओं को दबा देती है.

राहुल गांधी के एक करीबी दावा करते हैं कि राहुल युवा चेहरों को चुनाव लड़ने का मौका देना चाहते हैं. उनका तो ये भी मानना है कि अगर नए युवा चुनाव हार भी जाते हैं तो उन्हें क्षेत्र में काम करने का मौका मिलना चाहिये. एक हद तक यह सोच सही है. इससे भविष्य में युवाओं को चुनाव जीतने में मदद मिलेगी.

तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पार्टी किसी भी सूरत मेें सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है. ऐसे में राहुल के समर्थक मानते हैं कि उनके सुझाव को अमल में लाकर नए लोगों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में लोकप्रिय होने का मौका दिया जा सकता था. लेकिन पार्टी ने जो किया है उससे एक ही संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर लोग उनके सुझाव से सहमत नहीं हैं.

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अगर टिकट बंटवारे में राहुल की मर्जी चली तो चुनाव हारने पर हार की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी उनकी ही होगी. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘‘उनकी सहमति के बिना किसी भी चीज को मंजूरी नहीं मिलती है. ऐसा कहना कि वे टिकट बंटवारे की प्रक्रिया से अनजान हैं, बिल्कुल गलत होगा.’’

पश्चिम बंगाल में हाशिए पर राहुल ब्रिगेड

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की राज्य इकाई राहुल के इस फरमान को मानने की स्थिति में नहीं है क्योंकि वहां पर चुनाव लड़ने के लिये कांग्रेस के पास गिनती की ही सीट है. पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, ‘‘ओल्ड इज गोल्ड. वे अनुभवी हैं और लोग उन्हें मानते हैं.’’

अपनी बात के पक्ष में चौधरी 91 वर्षीय ज्ञान सिंह सोहनपाल का उदाहरण देते हैं जिन्होंने 1962 में पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रखा था और वे दस बार कांग्रेस के विधायक चुने जा चुके हैं.

चौधरी कहते हैं, ‘‘वे खड़गपुर में काफी सम्मानित हैं और हम उनकी जगह किसी और को चुनाव नहीं लड़ा सकते क्योंकि उनके इस सीट पर दोबारा जीतने की पूरी संभावना है. इसी प्रकार कई और निर्वाचन क्षेत्र हैं जहां वरिष्ठ नेताओं के जीतने की संभावना है.’’

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इस बीच असम में पार्टी ने करीब 40 प्रतिशत युवा चेहरों को टिकट दिया है और कईयों का कहना है कि पार्टी का यह फैसला राहुल गांधी की सोच से प्रभावित है. लेकिन इसके बावजूद पार्टी दिग्गजों को नहीं भूली है और 20 उम्मीदवारों की औसत आयु 60 वर्ष होने के अलावा 85 वर्ष से अधिक की उम्र वाले तीन उम्मीदवार भी पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं.

असम में कांग्रेस ने करीब 40 प्रतिशत युवा चेहरों को टिकट दिया है

पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता का कहना है कि राहुल गांधी नए चेहरों को समायोजित करने के प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन विभिन्न चुनाव जिताऊ कारणों के चलते राज्यों के नेतृत्व उनके सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं.

राहुल गांधी देश की सबसे पुरानी पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव करने को बेहद तत्पर हैं और वे पार्टी में बदलाव करना चाहते हैं. सोनिया गांधी के बिल्कुल उलट उनकी केंद्रीय टीम में बड़े स्तर पर युवाओं का प्रतिनिधित्व है. वास्तव में युवा चेहरों से राय लेकर आगे बढ़ने के उनके फैसले से पार्टी के अधिकतर बुजुर्ग और दिग्गज खफा हैं.

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2014 के आम चुनावों में पार्टी की करारी शिकस्त के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के एक गुट ने राहुल के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगाने का प्रयास करते हुए उन्हें इस पराजय का दोषी ठहराया.

राहुल के काम करने के तरीके के विरोध में जीके वासन, जयंति नटराजन, नटवर सिंह, भंवर लाल शर्मा, टीएच मुस्तफा, गुरफान आजम, सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी को भी छोड़ दिया.

पार्टी छोड़ते हुए नटवर सिंह का कहना था, ‘‘राजनीति करने के लिये आपके जिगर में आग होनी चाहिये और मेरे विचार से उनके भीतर यह आग नहीं है.’’

वास्तव में पार्टी के भीतर उभर रहे असंतोष की आवाजों को दबाने के लिये ही पार्टी की हार के कारणों पर राय देने वाली एंटनी कमेटी का गठन किया गया था.

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पार्टी में असंतोष के कारणों की पड़ताल के लिए बनी एंटनी कमेटी ने राहुल गांधी को पाकसाफ बताया है

जैसी उम्मीद थी, समिति ने राहुल गांधी को पाकसाफ बताया और कांग्रेस की हार के लिये कुछ अन्य कारणों को जिम्मेदार ठहराया. यहां तक कि अभी भी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि राहुल गांधी 2019 के चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सामना कर पाएंगे.

इस बीच इस बात की संभावना न के बराबर है कि पार्टी में युवा खून को शामिल करने का राहुल गांधी का विचार हाल फिलहाल मेें अमली जामा पहन सकेगा.

ऐसा लगता है कि गांधी परिवार के चश्मे-चिराग को तबतक इंतजार करना होगा जबतक पार्टी इस स्थिति में नहीं आ जाती कि वह कुछ दिग्गजों की नाराजगी की कीमत पर युवाओं के साथ प्रयोग करने का जोखिम उठा सके.

First published: 8 April 2016, 7:53 IST
 
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