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छत्तीसगढ़: गांवों की ज़िंदगियों में ज़हर घोलते बिजलीघर

शिरीष खरे | Updated on: 14 October 2016, 8:28 IST
(Representational Image/Getty Images )
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के मुकाबले कोयले की राख छोडऩे में छत्तीसगढ़ सबसे आगे है, लेकिन खपत के मामले में उतना ही पीछे.
  • यहां के बिजलीघरों से सालाना 2 करोड़ मिट्रिक टन फ्लाई ऐश निकलता है, जिसका 30 फीसदी भी इस्तेमाल नहीं हो पाता.
  • यही फ्लाई ऐश ज़हर बनकर पानी और हवा में इस हद तक घुल चुका है कि देश की \'ऊर्जाधानी\' कहलाने वाले शहर टीबी जैसी बीमारियों से खोखले होते जा रहे हैं. 

बीते दशक में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले का वनक्षेत्र लगभग 40 फ़ीसदी घट गया है. खेतों में हरियाली की जगह कोयले की राख जमी है. राख़ के टीलों और तालाबों के बीच दबे यहां गांव के गांव जैसे 'सैंडविच' हो गए हैं. गांव भेंगारी के किसान सुभाष गुप्ता कहते हैं, 'रायगढ़ हमेशा से ऐसा नहीं था लेकिन अब ज़िंदगी मुश्किल होती जा रही है'.

रायगढ़ के कई इलाकों में बिजलीघरों से निकलने वाली राख इतनी ज़्यादा है कि जगह-जगह टीले बन गए हैं. खेतों में जमा होने से फ़सलें पनप नहीं पा रही हैं. पूरे जिले में करीब 30 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती होती है लेकिन राख को किसानों की उस जमीन पर डंप किया जा रहा है, जो उन्हें पट्टे पर मिली हैं.

रिपोर्ट बताती हैं कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के मुकाबले कोयले की राख छोडऩे में छत्तीसगढ़ सबसे आगे है, लेकिन खपत के मामले में उतना ही पीछे. यहां के बिजलीघरों से सालाना 2 करोड़ मिट्रिक टन फ्लाई ऐश निकलता है, जिसका 30 फीसदी भी इस्तेमाल नहीं हो पाता. यही फ्लाई ऐश ज़हर बनकर पानी और हवा में इस हद तक घुल चुका है कि देश की 'ऊर्जाधानी' कहलाने वाले शहर टीबी जैसी बीमारियों से खोखले होते जा रहे हैं. 

सेंटरक फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट की रिपोर्ट कहती है कि प्रदेश के कोयला बिजलीघर हर साल 2 करोड़ मिट्रिक टन फ्लाई ऐश उगल रहे हैं, लेकिन इसमें एक करोड़ 20 लाख मैट्रिक टन राखड़ की खपत ही नहीं हो पाती. उप्र 50, महाराष्ट्र 60 और पश्चिम बंगाल में 80 फीसदी तक फ्लाई ऐश इस्तेमाल करते हैं, जबकि छत्तीसगढ़ 70 फीसदी से अधिक ऐश इस्तेमाल नहीं करता. कोरबा, रायगढ़ जिले इसका सबसे ज्यादा दंश झेल रहे हैं. 

बढ़ता उत्पादन, घटती मांग

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के मुकाबले छत्तीसगढ़ क्षेत्रफल और आबादी दोनों लिहाज से छोटा राज्य है. यहां हर साल बड़े पैमाने पर राखड़ का उत्पादन तो बढ़ता जा रहा है, लेकिन उस अनुपात में खपत न के बराबर हो रही है. वहीं, केंद्र सरकार ने 2020 तक कोयले का उत्पादन सालाना दो गुना करने का लक्ष्य बनाया है. 

देश के 52 हजार मिलियन टन से ज़्यादा कोयले का भार इसी राज्य में है. लिहाजा सबसे ज़्यादा खतरा यहीं मंडरा रहा है. यह इलाका खनन से पहले ही बुरी तरह प्रभावित है. पावर हब की अंधाधुध दौड़ ने आदिवासियों के फेफड़ों को पहले ही खोखला कर दिया है. आंकड़ों के मुताबिक बीते 5 साल में राखड़ प्रभावित 10 ब्लॉकों के 14 हजार से ज़्यादा लोगों में जांच के दौरान टीबी के लक्षण पाए गए.

एनजीटी ने मांगी रिपोर्ट

खनन मामलों के विशेषज्ञ श्रीधर राममूर्ति राखड़ के रेडिएशन परीक्षण की बात करते हैं. उनके मुताबिक, "शत-प्रतिशत राखड़ डंपिंग कराने की शर्त पर ही किसी कोल प्लांट को क्लियरेंस मिलता है. अक्सर प्लांट प्रबंधन को खुली खदानों में राखड़ डालने को कहा जाता है, लेकिन इसमें यदि सही तरीके से निष्पादन न हुआ तो भूमिगत जल प्रदूषित होने का सबसे ज्यादा खतरा होता है. 

कोयले में रेडिएशन की मात्रा होती है, इसलिए इसके रासायनिक परीक्षण की जरूरत है. अगर राखड़ में रेडिएशन के तत्व निकलते हैं तो प्लांट को आबादी से दूर रखा जाए.'

एनजीटी में राखड़ निष्पादन के मुद्दे पर याचिका डालने वाले लक्ष्मी चौहान कहते हैं, 'कोल इंडिया देश के 20 फीसदी कोयले का उत्पादन इसी राज्य से करती है. इसलिए रेल मंत्रालय कोयले के साथ-साथ यहां के बाशिंदों का भी ध्यान रखे. कोयला परिवहन के लिए प्रस्तावित रेल कोरिडोर के तहत कोरबा आदि से उत्सर्जित राखड़ के उपयोग को भी सुनिश्चित किया जाए.' वहीं एनजीटी ने इस पूरे विवाद से सरकार से रिपोर्ट तलब की है. 

कोयला बढ़ा, कामगार घटे

बीते दिनों सिंघाली खदान में काम के दौरान एक मज़दूर बाबू सिंह की तबीयत बिगड़ गई और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया. वजह यह है कि कोरबा की कोयला खदानों में कर्मचारियों की संख्या लगातार घट रही है और यहां काम करकने वालों की जान का जोखिम बढ़ गया है. ज्यादातर काम ठेका मजदूरों के जरिए कराया जा रहा है. उन्हें न सही मजदूरी मिलती है और न ही मेडिकल सुविधाएं. 

कोयला खान मजदूर फेडरेशन एटक के राष्ट्रीय सचिव दीपेश मिश्रा कहते हैं, "केंद्र ने खदानों में मजदूरों की सुरक्षा और हकों के लिए 'माइन्स एक्ट' बनाया है. कोरबा के मजदूर बताते हैं कि अंडर ग्राउंड माइंस में मशीन का ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो पाता. यहां सुविधाएं नहीं मिलने से कर्मचारियों की जिंदगी खतरे में रहती है.

First published: 14 October 2016, 8:28 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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