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छत्तीसगढ़: 'जमीन, भाई और आबरू सब कुछ चला गया'

राजकुमार सोनी | Updated on: 13 April 2016, 8:25 IST

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ क्षेत्र की आदिवासी महिला तारिका की जमीन लूट की कहानी दिल को दहला देने वाली है. रायपुर स्थित हिदायतउल्ला लॉ यूनीवर्सिटी में खुद तारिका ने जिंदल उद्योग समूह और सरकारी नौकरशाहों द्वारा अपने परिवार पर हुए अत्याचार की दास्तां सुनाई है.

उस समय वहां सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एके पटनायक, मानवाधिकार मामलों के वकील कोलिन गोन्जाल्विस और ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन के सचिव शौकत अली भी उपस्थित थे.

तारिका ने बताया कि पिता के देहांत के बाद उनकी मां गांव की जमीन (पूंजीपथरा में) के सहारे परिवार का पेट पालने के लिए मजबूर थीं. साल 2000 में जब जिंदल समूह उनकी जमीन लेने आया था तब तारिका की मां ने जमीन देने से मना कर दिया. परिवार को 2003 में पता चला कि उनकी जमीन का अधिग्रहण हो गया.

नौकरशाहों ने ग्राम सभा की इजाजत के बिना मुआवजा बांटना शुरू कर दिया. जब तारिका की मां ने आपत्ति जताई तो प्रशासनिक हथकंड़ों से तारिका के परिवारर को प्रताड़ित करने का दौर शुरू हो गया.

पहले तारिका के घर के बाड़े को तोड़ दिया गया. तारिका की मां खुद सरकारी मुलाजिम थी. जब वह शिकायत लेकर घरघोड़ा के तत्कालीन एसडीएम सुनील जैन के पास गईं तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. तारिका के अनुसार एसडीएम दफ्तर में मां को धमकी दी जा रही थी कि जमीन नहीं दोगी तो बच्चों पर बुलडोजर चढ़ा देंगे.

तारिका की कहानी खुद उनकी जुबानी

इसके बाद तारिका, उनके पति और भाई को एसडीएम दफ्तर बुला लिया गया. इस बीच उनकी जमीन पर बुलडोजर चला दिया गया जिसे आम-काजू के पेड़ बरबाद हो गए.

भाई की हत्या को दुर्घटना में बदल दिया

इतना होने के बावजूद तारिका की मां ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. जिसके चलते पुलिस वाले उनके भाई प्रवीण पर दबाव बनाने लगे थे. एक अप्रैल 2007 को प्रवीण अपने दोस्तों के साथ तराईमाल गया था. अगले दिन सुबह खबर मिली कि दुर्घटना में उसकी मौत हो गई है.  इस घटना में प्रवीण के दोस्त भी मारे गए थे. तारिका का दावा है कि कहीं से भी नहीं लग रहा था कि यह एक दुर्घटना है.

तारिका ने आरोप लगाया है कि भाई की मौत के आठ साल बाद गुंडों ने उनका रेप करने की कोशिश की थी. तारिका के अनुसार जमीन पर कब्जा करने वाले लोगों ने पहले उसे अगवा किया और धमकी दी. उन्हें निर्वस्त्र करके एक कमरे में कैद करके कहा गया कि डीएम को लिखकर दे कि उनका परिवार जमीन पर कब्जा छोड़ रहा है.

तारिका ने इसकी शिकायत तमनार थाने में की. इसके अगले दिन पुलिसवालों ने तारिका के घर आकर उनके पति को धमकाया कि ज्यादा नेतागिरी करोगे तो नक्सली बनाकर मार देंगे. उनकी शिकायत फाड़ दी गई.

पहली बार 2014 में सुप्रीम कोर्ट में उनका केस रजिस्ट्रार के पास ही खारिज हो गया था. सात अप्रैल 2015 को तारिका का केस फिर सुप्रीम कोर्ट में लगा.

सुप्रीम कोर्ट जाने के चलते डीएम ने उन्हें दोबारा ज्वाइनिंग नहीं दी और उनका ट्रांसफर कर दिया. उन्हें वेतन भी नहीं दिया जा रहा. तारिका ने कहा है कि जब तक जिंदा रहेंगी वह अपनी लड़ाई जारी रखेंगी.

ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन के सचिव शौकत अली कहते हैं, तारिका ह्यूमन राइट लॉ नेटवर्क के माध्यम से कार्यक्रम में पहुंची थी. उसने कानूनविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने जो कुछ बयां किया वह दिल को दहला देने वाला था. उसकी एक-एक बात अकल्पनीय है. तारिका ने सबके सामने जो कुछ कहा, वही पूंजीपथरा का सच है.

First published: 13 April 2016, 8:25 IST
 
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