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रेल बजट की 92 साल पुरानी वह परंपरा, जिसे मोदी सरकार ने कर दिया खत्म

कैच ब्यूरो | Updated on: 5 July 2019, 8:41 IST

साल 2017 में मोदी सरकार ने 92 साल से चली आ रही रेलवे बजट की परंपरा को खत्म कर दिया था. साल 1924 से शुरु हुए रेल बजट का साल 2017 में 'द एंड' हो गया था. मोदी सरकार ने तब रेल बजट को अलग पेश न करने व आम बजट का हिस्सा बना दिया था.

वित्त मंत्रालय ने इसके लिए पांच सदस्यों की टीम बनाई थी. टीम की रिपोर्ट आने के बाद अंतिम रूप से यह निर्णय लिया गया था. तब तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से रेल बजट को खत्म करने की राज्यसभा में सिफारिश की थी. प्रभु ने कहा था कि इससे आने वाले समय में देश को आर्थिक फायदा होगा. 

इसके बाद नीति आयोग की सिफारिश पर मोदी सरकार ने रेल बजट को खत्म कर आम बजट में मिला दिया था. मोदी सरकार का तर्क था कि इससे बजट के राजनीतिक इस्तेमाल से बचा जा सकता है और समय तथा पैसे की बर्बादी रोकी जा सकती है.

इसके साथ ही रेल बजट अब इतिहास बन चुका है. रेल बजट पेश करने की शुरुआत साल 1924 से हुई थी. तब ब्रिटिश राजनेता विलियम्स एक्वर्थ ने इसकी शुरुआत की थी. रेल बजट का मकसद रेल को अलग से बढ़ावा देना था. वहीं आजादी के बाद देश का पहला रेल बजट नवंबर, 1947 में जॉन मथाई ने पेश किया था. 

रेल बजट का इतिहास

भारत में 1859 से पहले ब्रिटिश शासन में बजट नाम की कोई चीज अस्तित्व में नहीं था. ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड केनिंग ने उसी साल अपनी कार्यकारिणी में जेम्स विल्सन को बतौर वित्त सदस्य नियुक्त किया था. विल्सन की पहल पर 18 फरवरी 1860 को पहली बार वायसराय की परिषद में बजट पेश किया गया.

हालांकि इसी बजट में रेलवे का भी लेखा-जोखा शामिल था. भारत में बजट प्रणाली का जन्मदाता जेम्स विल्सन को ही कहा जाता है. रेल बजट का लंबा इतिहास रहा है. रेल बजट को पेश करने की परंपरा अंग्रेजों के जमाने से ही शुरू हो गई थी. भारतीय रेल बजट एक विशेष बजट था जो आम बजट से बिलकुल अलग है. सबसे पहले 10 सदस्यीय एकवर्थ समिति की अनुशंसा पर साल 1924 में इसे पेश किया गया था.

साल 1921 में ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एक्वर्थ ने यह देखा कि पूरे रेलवे सिस्टम को एक बेहतर मैनेजमेंट की जरूरत है. 1924 में उन्होंने आम बजट से रेल बजट को अलग करने का प्रस्ताव रखा. साल 1920-21 में एक दस सदस्यों वाली समिति बनाई गई. ब्रिटिश अर्थशास्त्री विलियम एम एक्वर्थ के नेतृत्व में यह समिति बनी.

इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में रेल बजट को सामान्य बजट से अलग पेश करने का सुझाव दिया. समिति ने सुझाव दिया कि अकेला रेल विभाग भारत की सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधियों का संचालन करता है. साल 1924 में पूरे देश के बजट में रेल बजट की हिस्सेदारी 70 फीसदी थी. देश के बजट में रेल बजट की इतनी अधिक हिस्सेदारी देखकर रेल बजट को आम बजट से अलग करने का विलियम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया.

साल 1924 में जब रेल बजट को आम बजट से अलग किया गया तो उस समय रेलवे का प्रयोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट में 75 फीसदी और माल ढुलाई में 90 फीसदी होता था. भारतीय संविधान में हालांकि कहीं भी रेल बजट नामक शब्द का वर्णन नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 112 और 204 के अंतर्गत ही इसे लोकसभा में पेश और पास किया जाता रहा था. रेल बजट आम तौर पर आम बजट से कुछ दिन पहले पेश किया जाता था.

भारतीय रेल, भारत में एक सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (पीएसयू) है. यह लगभग 13.6 लाख लोगों को रोजगार प्रदान करती है. बिहार के भूतपूर्व मुख्य मंत्री लालू प्रसाद यादव के नाम लगातार 6 बार रेल बजट प्रस्तुत करने का रिकॉर्ड है. वे सं यूपीए सरकार में 2004 से 2009 के बीच रेल मंत्री थे. वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी रेल बजट पेश करने वाली पहली महिला थीं. उन्होंने साल 2002 में रेल बजट पेश किया था.

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First published: 15 June 2019, 16:11 IST
 
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