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बलूच मामले को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में उठाने से मिली बढ़त

तपन बोस | Updated on: 16 September 2016, 7:50 IST
QUICK PILL
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने स्वतन्त्रता दिवस के भाषण में पाकिस्तान सरकार द्वारा बलूचिस्तान के नागरिकों के मानवाधिकार हनन के मुद्दे का उल्लेख किए जाने के बाद बलूच नागरिक अपनी चिन्ताओं के लिए आशाभरी निगाहों से अंतरराष्ट्रीय समर्थन मांग रहे हैं.
  • गैरसरकारी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वाच, इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स, डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स और क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समूह जैसे ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान, एशियन ह्यूमन राइट्स कमीशन, साउथ एशिया फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स लम्बे समय से बलूच लोगों के मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठा रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने स्वतन्त्रता दिवस के भाषण में पाकिस्तान सरकार द्वारा बलूचिस्तान के नागरिकों के मानवाधिकार हनन के मुद्दे का उल्लेख किए जाने का बलूच नागरिकों के एक वर्ग ने तहेदिल से स्वागत किया है. बलूच नागरिक अपनी चिन्ताओं के लिए आशाभरी निगाहों से अंतरराष्ट्रीय समर्थन मांग रहे हैं.

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि किसी भी विदेशी सरकार ने आज की तारीख तक उनके मुद्दे को छुआ तक नहीं है. गैरसरकारी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वाच, इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स, डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स और क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समूह जैसे ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान, एशियन ह्यूमन राइट्स कमीशन, साउथ एशिया फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स लम्बे समय से बलूच लोगों के मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठा रहे हैं.

मानवाधिकारों का रक्षक होने के नाते मैं भी खुश हूं कि भारत सरकार मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन में शामिल होगी. 

चूंकि भारत सरकार इस क्षेत्र में पहली बार उतर रही है, मानवाधिकारों के लिए अभियान चलाने का पुराना अनुभव होने के नाते मैं अपने अनुभवों बांटना चाहता हूं, इस उम्मीद से कि इससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके अधिकारियों को मानवाधिकार का रक्षक होने की उनकी नई भूमिका में मदद मिलेगी.

सबसे कठिन काम मानवाधिकार के दुरुपयोग को साबित करना है. सरकारें आम तौर पर विदेशी एजेंसियों और मानवाधिकार संगठनों के आरोपों को खारिज कर देती हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को देश-विरोधी तक करार दे दिया जाता है. अपराधियों की पहचान को साबित करना आसान काम नहीं है. किसी भी शिकायत के लिए विश्वसनीय तथ्यों और आंकड़ों, चिकित्सीय प्रमाणपत्रों, फोरेंसिक रिपोर्ट्स, गवाहों के कागजात और अदालती कार्यवाहियों की जरूरत होती है.

उन देशों से, जहां सरकारें और उनके सुरक्षा बल ही उल्लंघनकर्ता हो, वहां से यह सब जुटाना जोखिम भरा काम है. बलूचिस्तान में लोगों के भारी संख्या में लापता होने का मुद्दा पाकिस्तानी मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाया था. वस्तुत: आम बलूची लोगों की दुर्दशा मीडिया के लिए आकर्षण वाला मुद्दा भी नहीं था.

सरकारें आम तौर पर विदेशी एजेंसियों और मानवाधिकार संगठनों के आरोपों को खारिज कर देती हैं.

हालात तब बदलने शुरू हुए जब लाहौर का एक बलूच व्यापारी मसूद जनजुआ 2005 में अकस्मात गायब हो गया. यद्यपि पाकिस्तानी अखबार डॉन ने इस मामले को उठाया लेकिन इस पर थोड़े ही लोगों का ध्यान गया. 

वास्तविक बदलाव तब दिखा जब पाकिस्तान के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी ने इन शिकायतों पर रुचि लेना शुरू कर दिया.

जस्टिस चौधरी के काम से उत्साहित तमाम मानवाधिकार समूहों की सहायता मिलने से गायब हुए लोगों के परिवारों ने दस्तावेजों के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी. 

अक्टूबर 2006 तक लगभग 458 मामले कोर्ट के सामने आ गए. सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों को धन्यवाद कि 186 लोगों का पता लगा लिया गया और उनमें से कुछ को रिहा कर दिया गया, जबकि अन्य को सुधार गृहों में स्थानान्तरित कर दिया गया.

पाकिस्तानी सेना, खुफिया और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने मामले में सहयोग करने से इनकार कर दिया और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सुनवाई बाधित करने की कोशिश की. 

अक्टूबर 2007 में नाराज होते हुए जस्टिस चौधरी ने यहां तक कह दिया कि वह खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों को पेश होने के लिए सम्मन जारी करेंगे और यदि वे पेश नहीं हुए तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे.

लोगों के लापता होने के मुद्दे पर जस्टिस चौधरी ने सरकार को चुनौती दे दी थी. जस्टिस चौधरी ने राष्ट्रीय सुरक्षा के डोमेन में हस्तक्षेप कर दिया था. लोगों के गायब होने के मामले की उनकी आखिरी सुनवाई एक नवम्बर 2007 को थी. इसके तीन दिन बाद ही उन्हें बर्खास्त कर दिया गया.

इसके बाद के घटनाक्रमों से जनरल मुशर्रफ की सरकार भी नहीं चली. जस्टिस चौधरी और मानवाधिकार समूहों के कार्यों को धन्यवाद कहिए कि बलूच लोगों के साथ मानवाधिकार हनन के साक्ष्य पब्लिक डोमेन में उपलब्ध हैं. मुझे भरोसा है कि प्रवासी बलूचियों के कुछ सदस्यों और भारतीय अधिकारियों के सहयोग से मोदी के लोग प्रमाणित दस्तावेजों को तैयार करने में सफल होंगे.

बलोच लोगों के लापता होने के मुद्दे पर जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी ने सरकार को चुनौती दे दी थी.

हालांकि मोदी को भी जागरूक रहने की जरूरत है कि बलूची लोग अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. नवाब अकबर खान बुग्ती के पौत्र, जो आत्म निर्णय के लिए बलूच राष्ट्रीय अभियान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, ने मोदी को धन्यवाद दिया है.

बलूच लोगों का पाकिस्तान की ओर झुकाव नहीं है. बलूचिस्तान की सबसे बड़ी प्रिंसली स्टेट कलात रियासत के खान स्वतंत्र बने रहना चाहते हैं. 

मुस्लिम लीग ने उन पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश की थी. 23 मार्च 1940 के लाहौर प्रस्ताव में कहा गया था कि पाकिस्तानी राज्य एक संघ होगा और केन्द्र सरकार की शक्तियां रक्षा, विदेशी मामलों, विदेशी व्यापार, संचार और मुद्रा तक ही सीमित रहेंगी.

प्रस्ताव में इस बात को लेकर एका थी कि घटक इकाइयां अन्य सभी क्षेत्रों में शक्तियों के मामले में स्वायत्त और स्वतंत्र रहेंगी. यह 1952 के नई दिल्ली समझौते जैसा ही है. इस समझौते पर जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने दस्तखत किए थे. 1953 में नई दिल्ली ने शेख अब्दुल्ला को हटा दिया और लचीले लोगों की सरकार गठित कर दी.

1948 में पाकिस्तान ने कलात रियासत के खान से जब धर्म के आधार पर अपने देश में शामिल होने को कहा तो बलूचिस्तान की लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित संसद ने एकमत से इस विलय के खिलाफ वोट दिया. पाकिस्तान ने 27 मार्च 1948 को बलूचिस्तान पर धावा बोल दिया. बलूची सेना ने इसका सामना किया पर बाद में उसका पाकिस्तान में विलय हो गया.

बगावत पर 1955 में नियंत्रण कर लिया गया और बलूचिस्तान पाकिस्तान के पश्चिमी प्रांत के रूप में उभरा. 1958 में पाकिस्तानी सेना ने एक बार फिर बलूचिस्तान को अपने घेरे में ले लिया. इसकी वजह यह थी कि बलूच लोगों ने जनरल अय्यूब खान की वन यूनिट पॉलिसी के खिलाफ हथियार उठा लिए थे.

1948 से ही बलूच पाकिस्तान के खिलाफ अपनी स्वायतत्ता के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं. इस स्वायतत्ता का वचन उन्हें लाहौर प्रस्ताव में दिया गया था. संघर्ष का वर्तमान चरण 2004 में शुरू हुआ जिसकी अगुवाई नवाब अकबर खान बुग्ती और मीर बलूच मर्री ने की. और यह अभी तक जारी है. 2006 में नवाब बुगती की हत्या कर दी गई.

गैर- सरकारी मानवाधिकार समूह आमतौर पर मानवाधिकार प्रावधान के सार्वभौमिक घोषणापत्र सभी लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार का समर्थन करते हैं. भारत लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को नहीं स्वीकार करता, इसकी अपनी वजहें हैं. यदि भारत बलूच लोगों के मामले में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में जाता है तो इससे कठिन परिस्थितियां उत्पन्न होंगी. मानवाधिकार राजनयिकता का एक तरह से औजार बन गया है. देश जो मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाते हैं, वह लम्बे समय तक मुद्दा नहीं रहता.

अमरीका, जो विश्व में मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघनकर्ता है, वह ही इसका सबसे बड़ा पैरोकार है. हालांकि, अमरीका सुपर पावर है. उसके पड़ोसी अमरीकी सरकार द्वारा अमरीकी नागरिकों के साथ किए जाने वाले मानवाधिकार हनन का मुद्दा नहीं उठाते. भारत सुपर पावर नहीं है. उसके पडो़सी भारत के मानवाधिकार हनन के रिकॉर्ड को उठाने में निश्चित रूप से सक्षम हैं. बहादुरी की नई नीति-का उल्टा असर हम पर नहीं पड़ना चाहिए.

First published: 16 September 2016, 7:50 IST
 
तपन बोस @catchnews

Tapan Bose is Secretary General, South As‎ia Forum for Human Rights.

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