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दलितों-आदिवासियों पर अत्याचार में राजस्थान, उत्तर प्रदेश सबसे आगे

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 22 December 2016, 8:27 IST
(कैच न्यूज़)
QUICK PILL
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एसससी/एसटी) के खिलाफ अत्याचार मामलों में राजस्थान चरम पर है. इसके बाद स्थान उप्र का है जहां जल्द ही चुनाव होने जा रहे हैं. केन्द्र सरकार ने सोमवार को जारी रिपोर्ट में इन मामलों में दोष कम साबित होने पर भी चिन्ता जताई है. हालिया 2013-15 की रिपोर्ट के कुछ आंकड़े इस तरह हैं...
23,861

मामले राजस्थान में संशोधित प्रिवेन्शन ऑफ अट्रोसिटीज़ (पीओए) के तहत दर्ज किए गए. देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य उप्र में 23,556 मामले और इसके बाद बिहार में 21,061 मामले दर्ज किए गए. अन्य राज्यों के हालात इस तरह हैं.

मध्य प्रदेश14,016

आंध्र प्रदेश9,054

ओडिशा8,084

कर्नाटक7,565

महाराष्ट्र6,546

तमिलनाडु 5,131

गुजरात3,969

43.3%

मामले इस अवधि में कोर्ट से निपटाए गए. हालांकि, सिर्फ़ 25.7% मामलों में दोष सिद्धि हुई.

3%

ही अपराध साबित हुआ पश्चिम बंगाल में, देश में सबसे कम

गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा में अपराध साबित होने की प्रतिशत क्रमशः 3.1 %, 3.5% और 4.3% रहा.

केन्द्रीय समाज कल्याण मंत्री थावर चन्द गहलौत ने राज्यों से रिपोर्ट मांगी है कि ताकि मामले का निस्तारण और अपराध साबित होने का प्रतिशत बढ़ाया जाए.

गहलौत ने यह भी कहा कि केवल 14 राज्यों ने पीओए मामलों को फास्ट ट्रेकिंग के आधार पर निपटाने के लिए विशेष अदालतों का गठन किया है.

यहां कुछ और संख्या दी जा रही है जिससे भारत के दलितों और जनजातियों की स्थितियों का पता चलता है. ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए और कड़े कानूनों की जरूरत क्यों है

336,995

अपराध दलितों के खिलाफ दर्ज किए पिछले दस सालों में आधिकारिक रूप से.

पिछले दशक में औसतन हर घंटे 3.9 आपराधिक घटनाएं हुईं.

दलितों के खिलाफ अपराधों में 2005 से 2014 के बीच 80%  की वृद्धि, यह भयावह आंकड़े हैं.

94%

बलात्कार की घटनाएं बढ़ीं दलितों के खिलाफ 2005 से 2014 के बीच. यौन हिंसा की आधे से ज्यादा घटनाएं तीन राज्यों-मप्र. उप्र और राजस्थान में हुईं.

दिलचस्प तो यह है कि मप्र में दलितों के खिलाफ बलात्कार के सर्वाधिक मामले दर्ज, मजे की बात तो यह कि भारत में यह राज्य सबसे कम दलित आबादी वाले राज्यों में शुमार.

दलितों के खिलाफ अत्याचार मामलों में दलित के साथ बलात्कार सबसे घिनौना रूप है. ग्रामीण भारत में भीड़ द्वारा नैतिक न्याय की स्थापना की जाती है और दलितों को पहचान कर उन्हें पीटा जाता है. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में 29 सितम्बर 2006 को भांदरा जिले में खैरलांजी की घटना.

सुरेखा नामक दलित महिला जब अपने घर में अपने परिजनों के लिए खाना बना रही थी, तभी लगभग 60 की संख्या में गांव वालों ने उसके घर पर हमला कर दिया, उसे और उसके तीन बच्चों को घसीट कर बाहर कर दिया. 

उन्हें और उनकी बेटी को नंगा कर दिया गया और उसके लड़कों को आदेश दिया गया कि वे अपनी मां और बहन के साथ बलात्कार करें. इनकार करने पर उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया. उसके बाद दोनों को दूर तक घसीटा गया, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उनके शवों को टुकड़ों में काटा गया.

उसकी गलती यह थी कि वह शिक्षित दलित महिला थीं, औसतन पढ़ी-लिखी और अम्बेडकर के बुद्धिज्म से प्रेरित थी. अपने समुदाय में वह दबंग महिला थी और भूमि विवाद के एक मामले में वह कोर्ट तक गई थी. इसके अलावा वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने में गर्व महसूस करती थी. 

52,399

अपराध की घटनाएं हुईं आदिवासियों के खिलाफ भारत में 2005 से 2013 के बीच. यह संख्या वही है जिसे आईपीसी के तहत दर्ज किया गया है. एलसी-एसटी एक्ट, प्रोटक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट आदि के तहत दर्ज मामले इसमें शामिल नहीं हैं. 

हालांकि, 2014 से सभी अधिनियमों में मामले दर्ज हुए हैं और ऐेसे में हर साल औसतन 40% की वृद्धि देखी गई है.  आदिवासियों के खिलाफ जातिगत और आपराधिक मामले बिना दर्ज हुए ही रह जाते हैं. 

एक बार फिर, आदिवासियों के खिलाफ किए जाने वाले अपराधों में बलात्कार सबसे घिनौना और वीभत्स रूप है. नियामगिरी के आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार का मामला सबसे बड़ा उदाहरण है. उनकी जमीन जबरन ले ली गई और जब उन्होंने विरोध किया तो उन्हें नक्सल उग्रवादी कहकर अवैधानिक रूप से रोक लिया गया. 

26%

दलितों के खिलाफ अपराध मामले औसतन लम्बित है पिछले पांच साल से ज्यादा समय से. इसका मतलब तो यह है कि पुलिस हर साल सभी मामलों में से एक-चौथाई में पूरी तरह से छान-बीन करने में अक्षम है. न्यायिक स्तर पर, लम्बित मामलों का प्रतिशत (ट्रायल पूरी नहीं हुई) ज्यादा अधिक है-हर साल 80% से ज्यादा.

यह संख्या स्पष्ट रूप से इस बात का संकेत है कि विशेष अदालतों की तुरन्त जरूरत है और विशेष पुलिस बल की भी. धन्यवाद कि, संशोधित एससी-एसटी एक्ट ने विशेष अदालतों के गठन और विशेष लोक अभियोजनकों की सिफारिश की है ताकि मामलों को निपटाने में तेजी आए. हालांकि, आपराधिक अत्याचार और कानूनी समस्याएं ही अकेली समस्याएं नहीं हैं. दलितों के सात भेदभाव के अन्य रूप भी हैं. 

27.6%

गांव में रहने वाले दलितों को थाने में प्रवेश करने से रोका जाता है.

एक-तिहाई गांवों में जन स्वास्थ्य अधिकारियों ने उनके घरों में जाने से मना कर दिया. 

गांवों में रहने वाले एक-चौथाई दलितों को अन्य कामगारों से कम मजदूरी मिलती है, इसके अलावा उनसे ज्यादा समय तक काम लिया जाता है, गाली-गलौच की जाती है और मजदूरी भी देरी से दी जाती है. 

29.6%

पंचायत के दफ्तरों में दलितों को अलग से बैठाया जाता है. इन गांवों के लगभग आधे से ज्यादा गांवों के दलितों को सड़कों पर वैवाहिक कार्य नहीं करने दिए जाते. और अधिक कि, कठोर कानून बनाए बिना इस तरह के भेदभाव को रोका नहीं जा सकता. 

First published: 22 December 2016, 8:27 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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