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रजत शर्मा ने इंडिया टीवी को दांव पर लगाया है: रामबहादुर राय

रामबहादुर राय | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
डीडीसीए विवाद में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दिल्ली के \r\nमुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर 10 करोड़ का मानहानि का मुकदमा दायर किया \r\nहै. इस मामले में मंगलवार को अदालत में अरुण जेटली का बयान दर्ज हुआ है. इस\r\n बयान के समर्थन में इंडिया टीवी के संपादक रजत शर्मा ने अदालत में अरुण \r\nजेटली की प्रतिष्ठा और ईमानदारी के संबंध में हलफनामा दिया है.
रजत\r\n शर्मा के हलफनामें के बाद एक चर्चा चल निकली है कि एक सत्ताधारी राजनेता \r\nऔर पत्रकार के बीच किस तरह के रिश्ते होने चाहिए? क्या एक पत्रकार को किसी \r\nनेता की ईमानदारी और प्रतिष्ठा की गारंटी लेनी चाहिए?
इन्हीं सवालों पर अपनी राय दे रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय:
एक पत्रकार और एक सत्ताधारी राजनेता के बीच किस तरह का रिश्ता होना चाहिए? यह सवाल लंबे समय से बहस का विषय रहा है. आज जब वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा अरविंद केजरीवाल के खिलाफ डीडीसीए विवाद में मानहानि का मुकदमा दायर किया गया है तब यह सवाल फिर से चर्चा में है.

इस मामले में इंडिया टीवी के संपादक रजत शर्मा ने उनकी ईमानदारी और प्रतिष्ठा का हलफनामा कोर्ट में दिया है. क्या पत्रकार का राजनेताओं से इतना गहरा रिश्ता होना चाहिए? क्या यह पत्रकारीय मर्यादाओं के अनुकूल है? आदि!

पत्रकारिता और राजनीति के संबंधों पर बात करने से पहले मैं इस केस से जुड़े दोनों व्यक्तियों के संबंध को साफ कर दूं. जेटली और रजत पुराने मित्र हैं. 1974-75 में जेटली एबीवीपी से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे जबकि रजत शर्मा महामंत्री थे.

अगर प्रधान संपादक किसी एक लाइन पर जा रहा है तो नीचे के लोगों को कोई दूसरी लाइन ले पाना संभव नहीं है

आपातकाल में जेटली जेल में रहे जबकि रजत भूमिगत हो गए थे. आज अगर रजत शर्मा एक पत्रकार होते हुए भी अपनी तटस्थता को किनारे रखकर जेटली के साथ खड़े हो गए हैं तो हमें उनकी मित्रता को ध्यान में रखना होगा.

इस समय राजनीति में कुछ नई चीजें हो रही हैं. पहली नई बात तो यह है कि एक केंद्रीय मंत्री एक मुख्यमंत्री के खिलाफ पहली बार किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को लेकर अदालती लड़ाई लड़ने को तैयार है. इसका अर्थ यह है कि उसे अपनी ईमानदारी पर पूरा भरोसा है. आमतौर पर राजनेता इस तरह के आरोपों का खंडन करके आगे बढ़ जाते हैं.

दूसरी नई बात एक पत्रकार द्वारा एक राजनेता की ईमानदारी और प्रतिष्ठा की गारंटी देना है. राजनीति में शामिल लोगों का जीवन अक्सर ऐसा होता है जिसमें भ्रष्टाचार आदि के आरोप लगना आम बात है. लिहाजा किसी पत्रकार को इसकी गारंटी लेने के खतरे और भी बढ़ जाते हैं. मैं कहूंगा कि रजत शर्मा ने बहुत साहस दिखाया है. निजी और पेशेगत रिश्तों के बीच उन्होंने निजी रिश्ते को तरजीह दी है जिसे मैं उचित मानता हूं.

अब बात पत्रकारिता की. रजत शर्मा एक बड़े टीवी चैनल के संपादक हैं. उन्होंने तटस्थता को छोड़कर इंडिया टीवी की विश्वसनीयता को दांव पर लगाया है. इसमें कोई शक नहीं कि रजत शर्मा जब जेटली के पक्ष में खड़े होंगे तब इंडिया टीवी के दर्शक इसको लेकर एक राय बनाएंगे.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. पत्रकार कई बार अपनी पक्षधरता साबित करता है. प्रभाष जोशी के बारे में यही बात कह सकता हूं. 1992 में राममंदिर आंदोलन तक वे भाजपा के प्रति लगाव रखते थे, लेकिन बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद उन्होंने भाजपा और संघ के खिलाफ भयंकर मोर्चा खोल दिया. लेकिन साथ ही उन्होंने अपने पूरे स्टाफ को बुलाकर साफ शब्दों में कह दिया कि यह उनके विचार हैं जिस पर वे कायम हैं. बाकी लोगों का इससे सहमत होना जरूरी नहीं है. वे जैसे अपना काम कर रहे हैं वैसे करते रहें.

रजत शर्मा की कही गई बातों को अब लोग उनके जेटली के साथ संबंधों के चश्मे से देखेंगे

प्रभाषजी ने भले ही यह बात साफ कर दी हो लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नही है. अगर आपका प्रधान संपादक किसी के खिलाफ एक लाइन ले रहा है तो नीचे के लोगों को कोई दूसरी लाइन ले पाना संभव नहीं है. वह उसी धारा को मानने के लिए बाध्य होता है.

यही बात यहां रजत शर्मा के साथ भी लागू होती है. वे इंडिया टीवी के प्रधान संपादक हैं. यह प्रश्न हमेशा रहेगा कि कोई उनकी धारा के खिलाफ जा सकता है या नहीं? उनकी कही गई बातों को लोग जेटली के साथ उनके संबंधों के चश्मे से देखेंगे, उसके प्रति एक राय बनाएंगे. जब नेशनल हेरल्ड के संस्थापक संपादक के रामाराव हुआ करते थे तब कई बार ऐसा होता था कि जवाहर लाल नेहरू खुद ही अपने दौरों की रिपोर्ट लिख दिया करते थे. रामाराव ने यह बात अपनी आत्मकथा में लिखी है.

पत्रकारिता और राजनीति के बीच दोस्ती नहीं होनी चाहिए

अगर पत्रकारीय मर्यादा के दायरे से जुड़ा कोई सवाल आप पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि आप अपने विवेक से फैसला स्वयं कीजिए. लेकिन अगर आप मुझसे मेरी राय पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि पत्रकारिता और राजनीति के बीच दोस्ती नहीं होनी चाहिए.

अगर ऐसा होगा तो पत्रकारिता राजनीति की पिछलग्गू बन कर रह जाएगी. जबकि पत्रकारिता राजनीति को राह दिखाने वाली ताकत है. यह उसके आगे-आगे चलती है. विशेषकर अगर राजनेता सत्ता में है तो पत्रकारों को और ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है. सत्ताधारी के प्रति हमारा रवैया सवाल खड़ा करने वाला, आलोचनात्मक होना चाहिए.

हमारे देश की पत्रकारिता का एक अलग स्वरूप है. विदेशों के मुकाबले यह बहुत भिन्न है. 200 से 250 सालों का हमारा इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत में पत्रकारिता हमेशा गहरे राजनीतिक आदर्शों से प्रेरित रही है. यह लगातार सत्ता से उलझती रही है, उस पर सवाल खड़ा करती रही है और समय आने पर उसके खिलाफ खुद भी खड़ा होती रही है. भारतीय पत्रकारिता इस मायने में बेहद भिन्न है.

(अतुल चौरसिया से बातचीत पर आधारित)

First published: 8 January 2016, 3:19 IST
 
रामबहादुर राय @catch_hindi

वरिष्ठ पत्रकार और यथावत पत्रिका के प्रधान संपादक

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