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मेरे लेट-लतीफ भाई, ऐसी भी क्या जल्दी थी...

राजेश तैलंग | Updated on: 27 February 2016, 8:37 IST

मेरे बड़े भाई कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग अपनी लेट लतीफी के लिए प्रसिद्ध थे. उनकी न जाने कितनी फ्लाइट्स, कितनी ट्रेनें छूटी हैं. दूसरों के कार्यक्रमों की तो छोड़िये अपने खुद के कार्यक्रमों, चाहे प्रदर्शनी हो या कुछ और वे अक्सर लेट ही पहुंचते थे.

मुझे ऐसे कई किस्से याद हैं जब सुधीर भाई के कार्यक्रमों के मुख्य अतिथि उनसे पहले पहुंच जाते थे और उन्हें संभालना मुझे पड़ता था. वे अक्सर मज़ाक में खुद को “लेट सुधीर तैलंग” कह के सम्बोधित करते थे.

ये सम्बोधन आज दुनिया उन्हें दे रही है “लेट सुधीर तैलंग”. चाहे वे लेट हुए या अर्ली चले... उनके लतीफों ने उनका साथ नहीं छोडा. कैंसर के महारोग से ग्रसित होने के बाद भी मस्ती-मज़ाक उनकी शख्सियत का हिस्सा बनी रही. उन्हें GBM-IV नामक ब्रेन कैंसर ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था.

पढ़ें: विख्यात कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग का निधन

राजनैतिक अराजकता के खिलाफ लड़ाई लडने वाले व्यक्ति के दिमाग की कोशिकायें न जाने किस घडी में अराजक हो गईं और उनके ही ख़िलाफ गठबंधन कर ट्यूमर का रूप धारण कर लिया. फिर भी ये कार्टूनिस्ट यही कहता रहा ये ट्यूमर मुझसे मेरा ह्यूमर नहीं छीन सकता है. डॉक्टर्स मेरा ट्यूमर निकाल लेगें लेकिन मेरा ह्यूमर नहीं निकाल सकते. पहले ऑपरेशन के लिये जाते वक़्त उन्होंने सर्जन से मज़ाक में कहा, “डॉक्टर अगर मेरे दिमाग में कुछ न निकले, अगर वो खाली मिले तो प्लीज़ किसी को बताइयेगा नहीं.”

सर्जन ने अगले दिन उनसे कहा, “मिस्टर तैलंग मुझे आपके दिमाग के अन्दर बहुत सी स्माइलीज़ मिलीं.”

सर्जन ने अगले दिन उनसे कहा, “मिस्टर तैलंग मुझे आपके दिमाग के अन्दर बहुत सी स्माइलीज़ मिलीं.”

ट्यूमर अपना दल-बल बढ़ाता रहा. एक से दो, दो से तीन और तीन से सात... जो आखिरी MRI में गिना गया. लेकिन उनके दिमाग की स्माइलीज़ की गिनती कम नहीं हो पाई. एक-एक करके ट्यूमर उनके शरीर के अंगों को स्विच-ऑफ करता गया लेकिन उनकी हज़ार वॉट स्माइल बरकरार रही.

उनके करीबी दोस्त और परिवार वाले जानते हैं वे एक बेहतरीन गायक थे. राजस्थानी लोक गीत और मोहम्मद रफी के गाने वे बड़े मज़े लेकर गाते थे. बीकानेर की सुप्रसिद्ध मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई के “केसरिया बालम” को जब वे गाते थे तो आप राजस्थान के रेत के टीलों में पहुंच जाते थे.

रफी के गाने “रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं...” की फरमाइश उनसे हर महफिल में की जाती थी. महफिल का रंग जम जाता, नूर बढ़ जाता और वे एक के बाद एक गाने गाते जाते थे. लोग सुनते जाते थे और भूल जाते थे कि ये आदमी अभी अपनी कूची से सत्ता के नशे में डूबे कई राजनेताओं के गुरूर को चूर करके आया है.

सुधीर जब गाना गाते थे तो लोग यह भूल जाते थे कि ये आदमी अभी अपनी कूची से सत्ता के नशे में डूबे कई राजनेताओं के गुरूर को चूर करके आया है

बात साल 1984-1985 की है जब वे नवभारत टाइम्स में काम करते थे और मैं बीकानेर में स्कूली पढाई. गर्मी की छुट्टियां बिताने मैं दिल्ली चला आता था. तब उनकी शादी नहीं हुई थी और मैं घर से उनके साथ ही उनके दफ्तर चला आता था. दिनभर उनका भेजा खाता और उन्हें डिस्टर्ब करता.

एक दिन इसका इलाज उन्हें अखबार के पन्नों में ही मिल गया. अखबार में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की बच्चों की ग्रीष्म कालीन वर्कशॉप के बारे में छपा था. उन्होंने मुझे उसमें भर्ती करवा दिया.

मुझे नाटकों का साथ मिल गया और उन्हें मेरे ऊल-जुलूल सवालों से छुटकारा. फिर हर साल ये सिलसिला चलता रहा. बाद में उन्होंने ही मेरे अन्दर ये आत्मविश्वास जगाया कि मैं एक अभिनेता बन सकता हूं और मैंने 1990 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तीन वर्षीय कोर्स में दाखिला पाने में सफलता प्राप्त की.

हालांकि मेरे भी कुछ कार्टून प्रकाशित हो चुके थे. लेकिन उनकी सलाह थी कि घर से एक ही शहीद हो तो बेहतर है. उनका कहना था पॉलिटिकल-कार्टूनिंग एक डाइंग आर्ट है. समाचार-पत्रों के रंगीन चित्र काले-सफेद व्यंग्यचित्रों के स्थान को निगल रहे हैं. देश में टाइगर्स और कार्टूनिस्ट्स को संरक्षण की ज़रूरत है. जो जितने खतरनाक हैं उतने ही नाज़ुक भी.

उनका जन्मदिन 26 फरवरी है और मेरा 10 अक्टूबर, वे मुझसे 10 साल बडे थे. लेकिन जब 9अक्टूबर, 2014 को उनका पहला ऑपरेशन हुआ तो अगले दिन उन्होंने मुझसे कहा “अब मैं तुझसे 10 साल नहीं सिर्फ एक दिन बडा हूं, ये मेरा दूसरा जन्मदिन है.”

सुधीर भाई ने ऑपरेशन के अगले दिन मुझसे कहा “अब मैं तुझसे 10 साल नहीं सिर्फ एक दिन बडा हूं, ये मेरा दूसरा जन्मदिन है.”

वे छह फरवरी 2016 को हमें छोड़कर चले गये, अपने असल जन्मदिन से बस बीस दिन पहले. उनके घर के हर कमरे की घड़ी अलग-अलग वक्त दिखाती थी. कोई घड़ी आगे तो कोई पीछे थी. समय का अन्दाज़ा लगाना मुश्किल होता था.

मैं कहता, “आप कहें तो मैं सबको मिला के सेट कर दूं” तो वे कहते थे, “मैं लेट तो टॉयलेट की वजह से होता हूं, वहां कोई घड़ी नहीं है, उसे कैसे सेट करोगे.” “लेट सुधीर तैलंग” ज़रा अर्ली चले गये. भाई तुम्हें क्या अपनी सारी देरियों की भरपाई का यही एक तरीका मिला?  पर हां एक मामले में वे वक़्त के एकदम पाबन्द थे, वो था कार्टून बनाना.

“लेट सुधीर तैलंग” ज़रा अर्ली चले गये

बिला नागा तीस साल से ज़्यादा वक्त तक डेड लाइन से पहले उनका कार्टून मेल हो जाता था और उसी के लिए तो उन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा. क्योंकि कैंसर भले की एक कार्टूनिस्ट को परास्त कर पाये लेकिन उनके कार्टून्स राजनीति और समाज में फैल रहे कैंसर को हराते रहेगें... हमेशा.

First published: 27 February 2016, 8:37 IST
 
राजेश तैलंग

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