Home » इंडिया » Rajyasabha tickets will spark infighting in SP
 

राज्यसभा की रेवड़ियां सपाई कुनबे में शीतयुद्ध का कारण बनेंगी

गोविंद पंत राजू | Updated on: 18 May 2016, 12:10 IST
QUICK PILL

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा और विधान परिषद के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान करके एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है मगर यह तीर उसके खुद के लिए बूमरेंग भी बन सकता है.

नामों की घोषणा दो दिन चली बैठकों के बाद हुई और दिखाने के लिए पार्टी के संसदीय बोर्ड ने पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को अंतिम फैसले के लिए अधिकृत भी किया लेकिन हक़ीक़त यह है कि नामों का चयन मुलायम सिंह ने पहले ही कर लिया था.

इसीलिए अमर सिंह को पहले से ही पारिवारिक समारोहों में ख़ास तवज्जो दी जाने लगी थी और इसीलिए समाजवादी पार्टी में अमर सिंह के खिलाफ सबसे पहली बगावत को हवा देने वाले बेनी प्रसाद वर्मा की पार्टी में वापसी पहले ही हो गयी थी. 

पढ़ें: अमर 'वि'चित्र कथा

अमर सिंह को राज्यसभा भेजे जाने के मुद्दे पर पार्टी में रामगोपाल यादव और आजम खान के तेवर बहुत तीखे रहे. रामगोपाल यादव जानते हैं कि अमर सिंह के राज्यसभा आने के बाद उनके लिए मीडिया से रूबरू होने के अवसर बहुत कम हो जाएंगे और पार्टी में उनका कद और सिकुड़ जाएगा.

अमर सिंह को राज्यसभा भेजने के मुद्दे पर पार्टी में रामगोपाल यादव और आजम खान के तेवर बहुत तीखे रहे

आजम खान का अमर सिंह से बैर बहुत पुराना और खुला सच है. रामपुर और जयाप्रदा को लेकर उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा है. ऐसे में अभी भले ही विधानसभा चुनाव का हवाला देकर मुलायम ने इन दोनों की बोलती बंद कर दी हो लेकिन ये तय है कि आजम अपनी कड़वाहट किसी भी हालत में भुला नहीं पाएंगे. यानि पार्टी में भीतर शीत युद्ध का छिड़ना तय है.

लेकिन समाजवादी पार्टी में आजम खान की स्थिति इन दिनों बहुत महत्वपूर्ण नहीं है. अमर सिंह को आजम की हर किस्म की मुखालफत के बाद भी राज्यसभा भेजना उनकी पार्टी में कमजोर हो चली हैसियत का भी इशारा है. 

काला धन: क्या वास्तव में मोदीजी ने जुमला ही दिया था?

लोकसभा चुनावों के दौरान सार्वजनिक सभाओं में मुलायम सिंह मुख्यमंत्री के प्रोटोकॉल को नजर अंदाज करके आजम को अखिलेश यादव के बाद भाषण देने का मौक़ा देते थे. मगर अब हालात बदल गए हैं और आजम खान का दबदबा कम होता जा रहा है. जाहिर है कि आजम अब अमर सिंह की वापसी को मुद्दा बनाकर अपना रुतबा फिर से बढ़ाने की कोशिश जरूर करेंगे.

हर किस्म की मुखालफत के बाद भी अमर को राज्यसभा भेजना आजम की कमजोर हो चली हैसियत का इशारा है

आजम को अखिलेश से भी इस बात की शिकायत है कि राज्यपाल राम नाईक के साथ चली उनकी एकतरफा जुबानी जंग में अखिलेश ने कभी भी खुलकर उनके रुख का समर्थन नहीं किया.

फिलहाल आजम के लिए परेशान करने वाली बात यह है कि राज्य के कई मुस्लिम समाजवादी नेता उनके विरोध में दिखते हैं. जामा मस्जिद के शाही इमाम और लखनऊ के प्रमुख शिया मौलाना कल्बे जव्वाद तो उनके खिलाफ सड़कों पर भी उतर चुके हैं.

इन स्थितियों में आजम-अमर के बीच वर्चस्व की लड़ाई एक बार फिर से शुरू होना तय है. फिलहाल तो पलड़ा अमर सिंह का ही भारी दिखता है क्योंकि बकौल शिवपाल यादव "अमर सिंह तो दिल में रहते हैं और दिल से बड़ी कोई चीज नहीं होती है.

सपा की राज्यसभा सूची में एक नाम लखनऊ के चर्चित बिल्डर संजय सेठ का भी है

 सपा की राज्यसभा सूची में एक नाम लखनऊ के चर्चित बिल्डर संजय सेठ का भी है. संजय सेठ को सपा पहले मनोनीत कर विधान परिषद भेजना चाहती थी मगर राज्यपाल द्वारा मंजूरी न दिए जाने से ऐसा हो नहीं पाया. अब मुलायम ने उनके सांसद बनने की राह तैयार कर दी है और एक तरह से राज्यपाल राम नाईक को जवाब भी देने का काम किया है.

सेठ के साथ नामंजूर हुए दो अन्य नामों कमलेश पाठक और रणविजय सिंह को सपा की विधान परिषद वाली सूची में जगह देकर भी सपा ने राज्यपाल की नामंजूरी को अंगूठा दिखा दिया है. 

दो साल भगवाराज: संघ अब मोदी के पीछे नहीं, साथ-साथ चल रहा है

हालांकि अभी इस बात की भी संभावनाएं हैं कि राज्यसभा और विधानपरिषद के उम्मीदवारों की इन सूचियों में बदलाव हो सकता है मगर आज जारी इन दोनों सूचियों ने बहुत सारे संभावित उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. पिछले कई दिनों से जो लोग किसी भी तरह अपना नाम शामिल करवाने के लिए लगे थे वे लोग अभी भी अपने प्रयासों में लगे हैं. इसलिए अभी कुछ दिन उम्मीदवारी को लेकर मारामारी चलनी ही है.

जोड़तोड़ से राज्यसभा और विधान परिषद पहुंचने की जुगत बिठाने वालों में एक टीवी चैनल के मालिक और एक स्थानीय पत्रकार का नाम भी शामिल था. चूंकि लोकदल और बीजेपी के शेष वोट हासिल कर एक व्यक्ति के लिए राज्यसभा की राह खुल सकती है इसलिए इस सीट के लिये जोड़तोड़ तेज होना तय माना जा रहा है.

बहरहाल समाजवादी पार्टी ने अपना दांव चल दिया है. पार्टी के भीतर इसके बाद किस तरह के दांवपेंच चलते हैं यह भी जल्द ही दिखने लगेगा. अभी तो जो दिख रहा है वह यह है कि जिन नेताओं को कभी पार्टी ने बोझ समझ कर किनारे कर दिया था, उनका बोझ उठाने को अब पार्टी बैचैन हो रही है.

First published: 18 May 2016, 12:10 IST
 
गोविंद पंत राजू @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

पिछली कहानी
अगली कहानी