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'हम 70 की उम्र में परिपक्वता के स्तर पर पहुंचते हैं'

शोमा चौधरी | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने सेंसर बोर्ड में सुधार के सुझाव देने के लिये एक समिति का गठन किया है. फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल, राकेश ओमप्रकाश मेहरा और एड गुरु पियूष पांडे जैसी नामचीन हस्तियां इस समिति के सदस्य हैं.
  • राकेश मेहरा का मानना है कि देश में किसी भी प्रकार की सेंसरशिप नहीं होनी चाहिये. उनका कहना है कि सेंसर बोर्ड को सिर्फ फिल्मों को उचित आयु वर्ग के आधार पर प्रमाणपत्र देना चाहिये.

पिछला साल रचनात्मकता पर बड़े पैमाने पर हुए कुठाराघात का साल था. जेम्स बांड की फिल्म स्पेक्टर में फिल्माये गए एक चुंबन दृश्य पर सेंसर की कैंची चलना इसका जीता-जागता उदाहरण रहा.

खुशी की बात है कि वर्ष 2016 का प्रारंभ एक नई उम्मीद के साथ हुआ है.

सूचना और प्रसारण विभाग के मंत्रियों, अरुण जेटली और राज्यवर्धन सिंह राठौर ने विवादास्पद सेंसर बोर्ड में सुधार करने के लिये एक समिति के गठन की घोषणा की है. वर्तमान में सेंसर बोर्ड की कमान विवादास्पद छवि वाले निर्माता पहलाज निहलानी के हाथों में है जो स्वयं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बहुत बड़ा प्रशंसक कहते आए हैं.

इस समिति के लिये उनकी पहली पसंद ही अपने आप में बेहद प्रभावशाली है. इसमें श्याम बेनेगल और राकेश ओमप्रकाश मेहरा जैसे दिग्गज निर्देशक और मशहूर एड गुरू पियूष पांडे शामिल हैं. ये तीनों ही नाम न सिर्फ पेशेवर के रूप में स्थापित हैं बल्कि कला की दुनिया में इन्हें उदार और प्रगतिशीलता के प्रति समर्पित माना जाता है. कलात्मक आजादी को लेकर इनकी सोच जगजाहिर है. सरकार की ओर से इस दिशा में एक एक अच्छी पहल की जरूरत थी और निश्चित रूप से यह एक सकारात्मक पहल है.

राकेश ओमप्रकाश मेहरा इस साक्षात्कार में कलात्मक स्वतंत्रता और सेंसरशिप के प्रति अपने नजरिए को सामने रख रहे हैं. उनके विचारों से यह स्पष्ट है कि सरकार का यह कदम कितना महत्वपूर्ण और स्वागतयोग्य है.

बातचीत के अंशः

सेंसरशिप के मुद्दे को आप कैसे देखते हैं? क्या फिल्मों में किसी भी तरह की सेंसरशिप होनी चाहिये या फिर विभिन्न आयु वर्गों के हिसाब से चीजों को प्रमाणित करना चाहिये?

इस बारे में मेरा व्यक्तिगत विचार एकदम साफ है. मैं किसी तरह की सेंसरशिप के खिलाफ हूं. इसको लेकर किसी भी तरह का संंशय नहीं है मेरे मन में.

लेकिन अब, जब मैंने सेंसर बोर्ड के कामकाज की समीक्षा करने वाली एक समिति का हिस्सा बनने के लिये हामी भर दी है तो मैं सिर्फ फिल्म जगत के नजरिये से ही नहीं बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण से और अधिक बेहतर तरीके से चीजों को समझूंगा.

मुझे सबसे पहले तो यह समझना है कि अगर कहीं इस माध्यम का दुरुपयोग हो रहा है तो उसका समाधान और उसपर अंकुश लगाने का तरीका क्या हो सकता है. मुझे इस मुद्दे का हल निकालने की दिशा में मदद करनी है.

दुरुपयोग से आपका क्या आशय है? अगर आपके निजी अनुभवों की बात करें, तो इतने सालों तक फिल्म निर्माण से जुड़े रहने के दौरान, क्या आपके सामने कभी ऐसी स्थिति आई जब आपको लगा हो कि फलां चीज ने सीमा लांघी है और उस पर लगाम लगनी चाहिए?

यह कहना काफी मुश्किल है. यह विचारधारा का प्रश्न है. उदाहरण के लिये मुझे लैंगिक पूर्वाग्रहों या फिर महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में प्रदर्शित करने वाली फिल्में पसंद नहीं हैं लेकिन बाकियों के लिए मैं क्या कर सकता हूं? लेकिन अब मैं उस स्थिति में हूं जहां दूसरों की सोच की कल्पना करके उसके हिसाब से निर्णय लेने होंगे.

जाहिर है कि उस तरह के सिनेमा या कला को भी अनुमति मिलनी चाहिये. चूंकि आपको पसंद नहीं है इसलिये आप यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते, ‘‘मैं सामने वाले को अनुमति ही नहीं दूंगा’’. क्योंकि जो भी इस प्रकार का सिनेमा बना रहा है वह भी इसी समाज का एक हिस्सा है और इस प्रकार वह भी समाज का एक पक्ष प्रदर्शित कर रहा है. चाहे अच्छा हो या बुरा यह पूरी तरह से उनपर निर्भर है. मैं या फिर कोई और इसे सेंसर करने वाले कौन होते हैं?

मेरा मानना है कि इसे एक निश्चित आयु वर्ग समूह के आधार पर प्रमाणित करना चाहिये या फिर माता-पिता के मार्गदर्शन वाली श्रेणी में डाल देना चाहिये. यहां पर मुद्दा यह है कि इस प्रकार का सिनेमा उन लोगों के लिये होना चाहिये जो उम्र के एक पड़ाव पर हैं और समझदार होने के अलावा यह समझें कि क्या दिखाया जा रहा है और उसे सही परिप्रेक्ष्य में लेने में सफल रहें. भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम परिपक्वता के स्तर तक तब पहुंचते हैं जब हम 70 के हो जाते हैं!

यह काफी दिलचस्प है कि सरकार श्याम बेनेगल, पियूष पांडे और आप जैसे लोगों के पास आई. यह उनकी अच्छी मंशा जाहिर करता है. इससे यह भी साफ होता है कि प्रतिरोध का असर होता है. सरकार की ओर से कलात्मक क्षेत्रों पर अंकुश लगाने की कोशिशों के खिलाफ जो विरोध के स्वर उठे उसके बाद सरकार की यह प्रतिक्रिया सराहनीय कही जाएगी.

बिल्कुल, मैं हमेशा से किसी भी प्रकार की सेंसरशिप के विरोध में रहा हूं. मुझे खुशी है कि इस तथ्य को जानने के बावजूद सरकार ने मुझे चुना. अनाधिकारिक रूप से हमने इस बारे में सरकार से बातचीत की और अपने विचारों और चिंताओं को साझा किया, और उन्हें मेरे विचारों की पूरी जानकारी है.

क्या आप धार्मिक भावनाओं को लेकर बिल्कुल अलग तरीके से सोचते हैं? अधिकतर धार्मिक और देशभक्ति की भावना वाले मुद्दों पर सेंसरशिप को लेकर बहस गर्माती है और ऐसे में हैरानी यह देखकर होती है कि धर्म का मामला सामने आते ही खुद को उदारवादी कहने वाले भी पैंतरेबाजी करने लगते हैं.

जी नहीं. मैं फिर भी किसी भी प्रकार की सेंसरशिप के विरोध में हूं और मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं है कि किसकी धार्मिक भावना दांव पर लगी है. वयस्क होने के बाद आपके अंदर चीजों को समाहित करने और आसपास घट रही चीजों की समझने की क्षमता विकसित होनी चाहिए.

किसी भी सिक्के के हमेशा दो पहलू होते हैं. एक को लगता है कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया जा रहा है और दूसरे को लगता है कि उसका नजरिया तर्कसंगत है. यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि हमारे जैसे देश में जहां रचनात्मकता पर पहले से ही इतने पहरे हैं, वहां बिना सेंसरशिप के चीजों को कैसे लिया जाएगा.

जी हां, यह बेहद जटिल मसला है. हमारे देश में किसी की भी भावना बहुत जल्दी आहत हो जाती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध को और स्पष्ट शब्दों में परिभाषित करना चाहिए. वर्तमान में, संविधान का अनुच्छेद 19.2(ए) सरकारों को बचाव का रास्ता प्रदान करता है. इसके जरिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘‘कानून और व्यवस्था’’ या फिर ‘‘भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला’’ जैसे बहानों से आसानी से प्रतिबंधित कर दिया जाता है.

इस विषय की ओर मेरा विशेष ध्यान रहेगा कि किस तरह से इसे (अभिव्यक्ति की आजादी) और स्पष्ट किया जाय. मेरे लिए इसे समझना जरूरी होगा क्योंकि समिति का हिस्सा होने के बाद इससे जुड़ी जिम्मेदारियों और चुनौतियों को स्वीकारना होगा.

मैं इसे स्वीकार करता हूं क्योंकि आप दुविधा में नहीं रह सकते. आपको इससे टकराना होगा और खुलकर बोलना होगा कि चीजें इस प्रकार से नहीं चल सकतीं.

तो आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे? आपके विचार से क्या प्रतिबंध मान्य होने चाहियें?

मेरा मानना है कि अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध होना भी चाहिये तो वह प्रयोग के आधार पर सिद्ध होने के साथ बेहद नपा-तुला और बहुत बारीकी से परिभाषित होना चाहिये. किसी भी प्रकार के प्रतिबंध को सिर्फ भावुकता, भावना जैसे कारणों के चलते या फिर कानून-व्यवस्था के लिये संभावित खतरे के चलते अमल में नहीं लाना चाहिये.

बहुत से उदारवादी समाजों में निंदा करने वाले भाषणों की भी छूट है. यह बात पचाने में थोड़ी मुश्किल है. प्रतिबंध तभी सामने आते हें जब आप किसी के खिलाफ हिंसा की वकालत करते हैं या फिर इस बात की वकालत करते हैं कि किसी भी समुदाय के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाए. ऐसे कृत्य निश्चित रूप से किसी भी दूसरे व्यक्ति को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.

जी हां, हमें इसपर रोक लगानी होगी और अपने कदम आगे बढ़ाने होंगे. हमें हर हाल में संविधान का पालन करना है और अगर कुछ बदलने की आवश्यकता है तो आपको देश का कानून बदलना होगा या फिर संविधान में लिखे शब्दों को बदलना होगा.

एक रचनात्मक व्यक्ति के रूप में सेंसर बोर्ड के साथ आपका अनुभव कैसा रहा है? क्या आपको कोई ऐसा वाकया याद है जब वे अपनी हद से आगे चले गए हों?

व्यक्तिगत रूप से मेरे सामने कभी कोई समस्या नहीं आई. भाग मिल्खा भाग के दौरान मैं यू/ए प्रमाणपत्र मांग रहा था क्योंकि फिल्म के एक दृश्य में मिल्खा आॅस्ट्रेलिया में एक महिला के लिये अपने होश खो देता है. लेकिन सेंसर बोर्ड ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई कारण नहीं दिखता जिसके चलते यह फिल्म किसी भी आठ वर्ष के बच्चे द्वारा न देखी जाए और उन्होंने फिल्म में स्वैच्छिक कटौती करने का फैसला पूरी तरह से मेरे ऊपर छोड़ दिया.

इसके बाद मैं वापस अपने घर आया और अपने बच्चों के साथ इस फिल्म को देखा. जब मैंने उस दृश्य को लेकर उनसे उनके विचार जाने तो उन्होंने कहा कि मैं अपनी बात कहने में कामयाब रहा हूं और शायद इतना आगे जाना आवश्यक नहीं था. इसके बाद मैंने मिल्खा और उस महिला जिसके प्रति वह आसक्त है के बीच के दृश्य में 10 से 15 सेकेंड की कैंची चलाई और इसके बाद वह बिल्कुल सही हो गया.

समिति के सदस्य के रूप में आप फिल्म जगत के कौन से मुद्दों को सामने रखने का प्रयास करेंगे? क्या आपको दूसरों के सामने आने वाली मुश्किलों का अंदाजा हैं? मौजूदा बोर्ड को साधारण अपशब्दों को लेकर भी घोर आपत्ति है.

मेरे ज़हन में सबसे बड़ा प्रसंग उस समय का है जब शेखर कपूर ने बैंडिट क्वीन बनाई थी और सेंसर बोर्ड रोड़ा बनकर खड़ा हो गया था. शेखर कपूर भी अपनी बात पर अडिग रहे. वे सेंसर बोर्ड से उच्च न्यायालय पहुंचे और फिर उच्चतम न्यायालय. यह हम सबके लिये सबसे अधिक प्रेरणादायक प्रसंगों में से एक है.

लेकिन हर कोई ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि अधिकतर मौकों पर फिल्में सेंसर बोर्ड के पास रिलीज होने से एकदम पहले बिल्कुल अंतिम क्षण में जाती हैं और उस समय बहुत मोटी रकम दांव पर लगी होती है. ऐसे में फिल्म निर्माता हमेशा कुछ दृश्यों में कटौती के साथ आगे बढ़ने के लिये मजबूर होते हैं.

लेकिन इसके बावजूद फिल्म निर्माताओं को कड़ा रुख दिखाना होगा. कोई भी ऐसे नहीं कह सकता, ‘‘अगर आप यह दृश्य या शब्द हटाएंगे, तभी मैं आपकी यह फिल्म रिलीज करूंगा.’’ किसी भी बोर्ड के पास ऐसी शक्तियां नहीं होनी चाहियें लेकिन निर्माताओं और निर्देशकों को भी इतनी आसानी से हार नहीं माननी चाहिये.

मुख्य मुद्दा यह है कि कोई भी एक खास दृश्य आपकी फिल्म के लिये इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इसे इतनी आसानी से क्यों छोड़ दिया जाए? अगर यह आपकी फिल्म का अभिन्न भाग नहीं है तो फिर वह वहां क्यों है? कोई भी इसे हमेशा ‘व्यावसायिक दबाव’ के तर्क के नीचे नहीं छिपा सकता.

एक दूसरा पहलू यह भी है कि अब फिल्म निर्माता भी बहुत हद तक जिम्मेदार और ईमानदार हो गए हैं. हम खुलकर द्विअर्थी और यौन आइटम गाने दिखाना चाहते हैं और साथ ही इनके लिये यू प्रमाणपत्र भी चाहते हैं. मेरा कहना है कि आप बेशक ऐसे गाने अपनी फिल्म में रखो लेकिन वयस्क प्रमाणपत्र के लिये अर्जी लगाओ. हमें भी ईमानदार होना चाहिये.

समिति का एक सदस्य होने के चलते आप किन प्रमुख क्षेत्रों और दिशाओं पर अपना ध्यान केंद्रित रखेंगे?

अभी तक हमारी पहली बैठक भी नहीं हुई है इसलिये मैं इसपर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा. लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि ‘‘सेंसर’’ बोर्ड जैसी कोई संस्था या चीज होनी ही नहीं चाहिये. किसी भी चीज को सेंसर करने को लेकर कोई चर्चा ही नहीं होनी चाहिये.

जैसा आपने बिल्कुल ठीक कहा चर्चा सिर्फ एक ही बात आकर टिकती है और वह है संवैधानिक अधिकार और हम कैसे किसी भी फिल्म को प्रमाणित कर सकते हैं? क्या किसी भी फिल्म को अंडर-12, अंडर-15, अंडर-17, माता-पिता के मार्गदर्शन में या फिर व्यस्क के तौर पर प्रमाणित किया जाना चाहिये? और इसे यहीं छोड़ देना चाहिये.

अगर कभी किसी मौके पर आपका सामना वास्तव में किसी ऐसी बड़ी चीज से होता है जो आपके हिसाब से आक्रोश का कारण बन सकती है या फिर हंगामा पैदा कर सकती है तो उसे समय से अदालत के हवाले करके देश के कानून का पालन करने के लिये बाध्य किया जा सकता है.

First published: 4 January 2016, 11:14 IST
 
शोमा चौधरी @shomachaudhury

एडिटर-इन-चीफ़, कैच न्यूज़. तहलका की संस्थापक मैनेजिंग एडिटर रही. इसके अलावा आउटलुक, इंडिया टुडे, द पायनियर आदि संस्थानों में भी काम किया. गोवा में होने वाले 'थिंक' फेस्ट के निदेशकों में रहीं.

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